अंग्रेज़ – पियक्कड़, व्यभिचारी, पर बड़े शिष्टाचारी

अगस्त का महीना था और मौसम गर्म था। हालांकि भारतीय गर्मियों की तुलना में वह शायद वसंत ऋतु का मौसम ही लगे, मगर कड़क सर्दी के आदी अंग्रेज़ों के लिये वह गर्मी ही थी। इंग्लॅन्ड में उन दिनो गर्मियों का मौसम वैसे भी उतना गर्म नहीं हुआ करता था जितना आजकल होने लगा है। शायद यह ग्लोबल वॉरमिंग का ही असर है कि आजकल कभी गर्मियों में लन्दन दिल्ली से अधिक गर्म हो जाता है, तो कभी सर्दियों में दिल्ली लन्दन से अधिक सर्द।

लन्दन में वह मेरा काम का पहला दिन था। हमारी कंपनी के क्लाइंट यानि कि लन्दन इलेक्ट्रिसिटी के दफ्तर में मैं लंच करके बैठा ही था कि मेरे सामने वाली डेस्क से काले सूट में सजे स्मार्ट और लम्बे गोरे व्यक्ति ने अपनी टाई ढीली करते हुए आवाज़ लगाई, “एनी वन वांट्स आइस्क्रीम?”

मैने झटपट अपना हाथ उपर कर दिया। गर्मी की दोपहर में लंच के बाद आइस्क्रीम से बेहतर और क्या हो सकता था.

“विच फ्लेवर?”

मुझे पता न था कि लन्दन में किन-किन फ्लेवर की आइस्क्रीम मिला करती थीं। परंपरागत चॉक्लेट या वनीला फ्लेवर मुझे कुछ खास पसंद नहीं हैं, सो मैने कुछ सोचते हुए कहा, “मैंगो”

लगभग आधे घंटे बाद वह व्यक्ति पसीने से भीगते हुए आया और मुस्कुराते हुए मेरे सामने मैंगो कुल्फ़ी का एक कुल्हड़ रखा।

“इतनी देर कहाँ लग गई?” मैने बेतकल्लुफी से पूछा।

“कुछ ख़ास नहीं, बस पांच दुकाने ढूंढनी पड़ीं पर मैंगो आइसक्रीम मिल गई” उसने हंसते हुए कहा।

कुछ दिनों बाद पता चला कि वह व्यक्ति लन्दन इलेक्ट्रिसिटी का कोई डाइरेक्टर था। अंग्रेज़ी शिष्टाचार से यह मेरा पहला परिचय था।

पियक्कड़, व्यभिचारी, पर बड़े शिष्टाचारी। एक आम भारतीय अंग्रेज़ों के बारे में यह राय बड़ी सहजता से बना सकता है। हालांकि परंपरागत भारतीय दृष्टिकोण जिसे व्यभिचार या चरित्रहीनता समझता है, आधुनिक भारतीय नज़रिया उसे खुलेपन के रूप में देखता है। मगर अंग्रेज़ों के पियक्कड़पन और शिष्टाचार पर कोई दो राय नहीं हो सकतीं। अंग्रेज़ों के पियक्कड़पन के नमूने आपको लन्दन पहुंचते ही मिल जाएंगे। लन्दन की सड़कों पर घूमते हुए आपको किसी किनारे ‘चेंज, चेंज’ की आवाज़ लगाता कोई भिखारी बैठा मिल जाएगा। किसी गोरे भिखारी को एक पौंड का सिक्का भीख में देकर शायद आप दो सौ वर्षों के खोए हुए भारतीय अभिमान को पुनः अर्जित करने की कोशिश भी करेंगे। मगर आपके चेहरे का सारा अभिमान तब जाता रहेगा जब आप देखेंगे कि वह गोरा भिखारी उस सिक्के को लेकर पास की दुकान में जाएगा और हाथ में बियर का एक कैन लिए बाहर निकलेगा।

शराब की दीवानगी के मामले में अंग्रेज़ मिर्ज़ा ग़ालिब को भी मात दे दें। मेरे एक अंग्रेज़ मित्र जॉर्ज स्मिथ के शब्दों में, “वी वर्क टू ड्रिंक एंड ड्रिंक टू वर्क”

शराब को लेकर अंग्रेज़ों की सोच भी नायाब है। एक बार बर्मिंघम शहर के एजबेस्टन क्रिकेट मैदान में भारत और इंग्लैंड के बीच एक दिवसीय क्रिकेट मैच चल रहा था। मैं अपने कुछ भारतीय और अँगरेज़ मित्रों के साथ दर्शक दीर्घा में मौजूद था। सुबह से ही अंग्रेज़ मित्र एक के बाद एक बियर के गिलास अपने भीतर उड़ेलने में लगे थे, कुछ इस तरह जैसे कि हम किसी क्रिकेट स्टेडियम में नहीं बल्कि बियर पीने की किसी स्पर्धा में बैठे हों। उनकी संगति में दो तीन गिलास बियर मैं भी पी चुका था। हाफ टाइम तक भूख ज़ोरों से लग आई थी। हाफ टाइम होते ही हम स्टेडियम में बने रेस्टोरेंट की ओर लपके और मैंने तुरंत ही एक चिकन बर्गर आर्डर किया। मेरे साथ ही खड़े अंग्रेज़ साथी जॉन ने एक बियर आर्डर की। मैंने आश्चर्य से जॉन की ओर देखते हुए पूछा, “तुम खाना नहीं खाओगे?”

जॉन ने मुस्कुराते हुए कहा, “पांच पौंड का एक बर्गर? इतने में तो दो बियर आ जाएंगी”

शराब की दीवानगी ने कई प्रतिभावान और विख्यात अंग्रेज़ों के व्यावसायिक और विवाहित जीवन भी तबाह किये हैं। मशहूर फिल्म अभिनेत्री एलिज़ाबेथ टेलर और उनके पांचवे पति और प्रसिद्द अभिनेता रिचर्ड बर्टन धुरंधर पियक्कड़ थे। कौन उन्नीस था और कौन बीस यह कहना तो मुश्किल है, मगर उनके कुछ अभिन्न मित्रों की मानें तो एलिज़ाबेथ टेलर शराब पीने की प्रतिस्पर्धा में किसी भी मर्द को हरा सकने का माद्दा रखती थीं। एक बार किसी होटल में शराब पीते हुए एलिज़ाबेथ और रिचर्ड के बीच ज़बरदस्त झगड़ा हुआ। झगडे के दौरान एलिज़ाबेथ हाथ में वोदका की टूटी बोतल लिए रिचर्ड को पूरे होटल में दौड़ाती रहीं। होटल को हुए नुकसान का खर्च आया बीस हज़ार पौंड।

प्रसिद्द अभिनेता रिचर्ड हैरिस भी ज़बरदस्त पियक्कड़ थे। रिचर्ड हैरिस दिन में वोदका की दो बोतल आराम से पी जाते और फिर शाम को ब्रांडी की बोतल खोल कर बैठ जाते। हैरिस का कहना था कि उन्हें सुबह अख़बार में यह पढ़ने में बड़ा मज़ा आता था कि पिछली रात उन्होंने शराब के नशे में धुत्त होकर क्या-क्या कारनामे किये थे।

एक अन्य अभिनेता ओलिवर रीड तो और भी बड़े पियक्कड़ थे। एक बार उन्होंने एक दिन में बियर के 126 पाइंट पी डाले। ओलिवर रीड की पसंदीदा ड्रिंक उनकी खुद की इज़ाद की हुई थी, एक आइस बकेट में बार में उपलब्ध सभी प्रकार की शराबों को उड़ेल कर बनाई हुई।

ओलिवर कभी-कभी शराब के नशे में धुत्त होकर सांसारिकता से भी परे हो जाते और सरेआम वस्त्र त्याग कर दिगंबर हो जाते। एक बार एक रेडियो चैट शो में अमेरिकी अभिनेत्री इलेन स्ट्रिच के साथ ओलिवर को भी भाग लेना था। इलेन शो पर पहले से ही मौजूद थीं। थोड़ी देर बाद स्टूडियो का दरवाज़ा एक ज़ोर के झटके से खुला और दरवाज़े पर खड़े दिखाई दिए ओलिवर रीड, शराब के नशे में धुत्त और बिलकुल दिगंबर।

“माय डिअर ओलिवर, सच कहूँ तो मैंने बड़े और बेहतर देखे हैं” इलेन ने ओलिवर को घूरते हुए कहा।

शराब के नशे में अँगरेज़ चाहे जैसा भी व्यवहार करें मगर जब वे नशे में न हों तो उनसा विनम्र और शिष्टाचारी भी नहीं मिल सकता। सॉरी, थैंक यू और यू आर वेलकम जैसे शब्द तो उनके मुंह से किसी मीठे झरने से बहते रहते हैं। यदि सड़क चलते आप किसी को ठोकर मार बैठें या किसी के पैर पर आपका जूता आ जाए और वह व्यक्ति पलट के आपसे कहे, “सॉरी” तो समझ लें आप ब्रिटेन के अलावा कहीं और नहीं हो सकते।

शुरू-शुरू में तो मुझे अंग्रेज़ों का यह शिष्टाचार बड़ा ही अटपटा लगता। यदि किसी का काम करके उसे फ़ोन पर उसकी जानकारी दी तो दूसरी ओर से थैंक यू और चियर्स जैसे शब्दों की झड़ी लग जाती। आभार व्यक्त करने का यह तरीका मुझे बड़ा ही विचित्र लगता। ठीक है भाई एक बार थैंक यू कह दिया अब रखो फ़ोन और काम पर लगो। मगर वह तो इस तरह आभार व्यक्त करेगा कि आप उस आभार के आभार तले दबा महसूस करने लगें। और यदि आपको यह न पता हो कि थैंक यू का जवाब यू आर वेलकम होता है थैंक यू नहीं, तो फिर अगले आधे घंटे तक आप एक दूसरे को थैंक यू ही कहते रहेंगे।

ब्रिटेन में सोलह वर्ष रहने के बाद भी मैं अक्सर इन शिष्टाचार की परम्पराओं को लेकर कंफ्यूज हो जाता हूँ। कभी-कभी राह चलते हुए किसी का पैर मेरे पैर पर पड़ जाए तो दर्द से कराहते हुए कह बैठता हूँ, ‘यू आर वेलकम’

ब्रिटेन में शिष्टाचार की एक और परंपरा है, ‘होल्ड द डोर’. किसी दरवाज़े से गुज़रते हुए अंग्रेज़ व्यक्ति खुले हुए दरवाज़े को उसके पीछे आने वाले व्यक्तियों के लिए पकड़ कर रखता है, तब तक, जब तक कि उसके पीछे आने वाला व्यक्ति दरवाज़े को न थाम ले। मगर शिष्टाचार की हद तो यह है कि यदि उसकी नज़र में काफी दूर से भी कोई व्यक्ति उस ओर आता दिखाई दे तो वह दरवाज़ा पकडे खड़ा रहेगा, कुछ इस तरह कि आने वाले व्यक्ति को ही शर्म आ जाए और उसे आराम से चलने की बजाय दौड़ कर दरवाज़े तक पहुंचना पड़े। कभी कभी तो दृश्य और भी मज़ेदार हो जाता है जब पता चलता है कि आने वाले व्यक्ति को तो उस दरवाज़े से प्रवेश ही नहीं करना था।

दरवाज़ा पकड़ कर खड़े व्यक्ति की आने वाले से इतनी अपेक्षा तो होती ही है कि वह कम से कम उसे थैंक यू कहे। मगर यदि वह अंग्रेजी शिष्टाचार से वाकिफ न हो और थैंक यू न कहे तो दरवाज़ा पकड़े खड़ा व्यक्ति पहले तो उसे तिरिस्कार से देखेगा मगर फिर कहेगा, “यू आर वेलकम”

चलते-चलते बस इतना ही कि यदि आपके बच्चों में शिष्टाचार की कमी हो और आप उन्हें शिष्टाचार सिखाते सिखाते तंग आ चुके हों तो उन्हें ब्रिटेन अवश्य भेजें। यकीन मानिये आपके बच्चे लौट कर आपसे अवश्य कहेंगे, “थैंक यू”

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