अखबार – एक कविता

आशावान हूं, सपनों में खुशियां अपार देख लेता हूं!
बहुत खुश होता हूं कभी तो अखबार देख लेता हूं!

क्या होता है अखबारों में?

घपलों और घोटालों की खबरें !
बिजली पानी और निवालों की खबरें,
स्याह चेहरे और सफेद रुमालों की खबरें,
दो धर्मों के प्रेम में ज़हर घोलने वालों की खबरें,
भ्रम नहीं पालता मगर दुनिया फिर भी साकार देख लेता हूं ,
बहुत खुश होता हूं कभी तो अखबार देख लेता हूं !

होती हैं उनमें,

बंद कमरों में छटपटाती रही सियासत की खबरें ,
परम्पराओं पर अटकी पुरानी रियासत की खबरें,
चरित्रों में उलझी मासूमियत और नफासत की खबरें ,
नेताओं की बेगुनाही और बाबाओं की हिरासत की खबरें ,
कपड़ों की आड़ में जिस्मों का बाज़ार देख लेता हूं ,
बहुत खुश होता हूं कभी तो अखबार देख लेता हूं !

देखनी पड़ती हैं कभी,

सैनिकों के भी अपमान की खबरें,
जंग जीत कर भी हारते हुये स्वाभिमान की खबरें,
गोलियों से छलनी, वादों से घायल अभिमान की खबरें,
तिरंगे कफन में लिपटे हर बहादुर जवान की खबरें,
इनके साथ ज्यादतियों का जुटता अंबार देख लेता हूं,
बहुत खुश होता हूं कभी तो अखबार देख लेता हूं!

मगर बस ये ही नहीं,

होती हैं उनमें उभरती प्रतिभाओं की खबरें,
जूझती और जीतती कुछ आशाओं की खबरें,
सिसकती मगर डटी रही संभावनाओं की खबरें,
हार न मानती हुई कुछ हिम्मती व्यथाओं की खबरें,
इन्हीं में सम्मान का असली हकदार देख लेता हूं,
बहुत खुश होता हूं कभी तो अखबार देख लेता हूं!

#अंकित_बाजपेई©
whatsapp- 8299470141
ankitbajpai031@gmail.com

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