अपनी ख़लवत में भटकते हुए

देर रात ‘ग्रीन टी’ का प्याला लिए बालकनी में फालतू सा खड़े रहना जैसे अपने आप को खोजना।

यूकिलिप्टस की विरल कतारों के पीछे ऊँचे पुल पर तेज़ी से गुज़रती हुई आख़िरी मेट्रो रेल एक चमचमाती तूल -तवील लक़ीर सी दिखती है। इतनी रात भी खाक़ उड़ाती गर्म हवा खुली बाँहों और चेहरे पर थपेड़ों की तरह पड़ रही है। मगर मैं ग्रीन टी सुड़कते हुए अन्धेरे आसमान को ताकती हूँ क्या किसी तूफ़ान के आसार हैं? प्याला खाली होने तक भी आसमान अपना हाल नहीं कहता।जैसे बहुत बार हमारे भीतर का तूफ़ान शक़्ल पर शाया नहीं होता।

मन अपनी ख़लवत में भटकने लगता है। इस भटकाव में मैं एक छोटी लडक़ी की बाँह थाम लेती हूँ। और यह सोचकर अचंभित होती हूँ कि जिन बातों को हम धुंधला या बासी हो गया समझते हैं ज़रा सा मुड़कर देखते ही वे एकदम साफ़ और ताज़ातरीन लगती हैं।

छोटी लड़की दरमियाना कद की औरत के साथ ईंट -खरंजे की गली में बहुत पुरानी पक्की हवेली के सामने खड़ी है।हवेली का रंग – रोगन उड़ चुका है और पिछवाड़े की दीवार पर पीपल उग आए हैं। चौमासों के बाद ढीठ पीपल और हरे हो गए हैं। कच्चे दगड़े से गुज़रकर आने की वजह से लड़की के पैर धूल से भरे हैं। हवेली के सामने कुआँ है उस पर चापाकल (हैंड पम्प) है।कुआँ लकड़ी के तख्तों से ढंका है मगर तख़्तों के बीच की चौड़ी झिर्रियों से कुएँ में सिर डालकर लड़की जोर से अपना नाम पुकारती है और लौटकर आई आवाज़ पर खुश होती है। हवेली के मुख्य दरवाज़े पर जगह जगह पीतल की नुकीली फूलदार खूँटियाँ हैं और दरवाज़े के दोनों ओर नक्काशीदार परछत्ती के के तले दो संगमरमरी चौकियां।चौकी पर बैठकर लड़की मल्लिका हो जाती है। वह जब भी यहाँ आती है राजा -रानी का खेल खेलती है।इस खेल में ममेरे -मौसेरे भाई बहन उसकी प्रजा होते हैं।

लड़की के साथ आई औरत उद्विग्न लगती है वह चिट्ठी भेजकर आए अप्रत्याशित बुलावे पर घबराई हुई है। दुआरी पार करके वह अटैची को बरामदे के थमले से टिका देती है। बरामदे में पटसन के पीढ़े पर बैठी आधी सदी देखी एक भारी भरकम औरत सारा वजन घुटनों पर तौलकर “अरेsss मेरे रामजी तेरा ही …. ” कहते हुए खड़ी हो गयी है ऊँचे सुर में रोने लगी है। घर की बाक़ी औरतें भी सुर में सुर मिलाकर विलाप कर रही हैं। छोटी लड़की महीनों पहले हुई किसी मृत्यु के बाद बरसी होने तक हर मिलन पर रूदन के इस रिवाज को नहीं जानती। वह इस माहौल से अप्रतिभ होकर ऊपर की मंजिल पर दौड़ जाती है। सीढ़ियों के ठीक सामने एक बड़ी बैठक है। एक विशाल तख़्त बिछा है।तख़्त पर दरी है।बैठक में सीलन की बू भरी हुई है। वहाँ छोटे बड़े कई आले हैं। सामने की दीवार में किताबों की अलमारी है। किताबों में गोदान, सत्यार्थ प्रकाश और चंद्रकांता संतति के सारे खण्ड हैं। लडक़ी को एक लुभावना वादा मिला है कि बड़ी होने पर ये तमाम किताबें उसकी हो जाएंगी।बैठक के आगे लोहे का बड़ा जाल है। जाल के पार लाल फ़र्श वाला बारजा।लड़की जाल से नीचे झाँकती है वहाँ किसी बात पर ऊँची आवाज़ में जिरह हो रही है। लड़की उकताकर लाल फ़र्श पर बने वृत में किसी माहिर नर्तकी की तरह अपनी घेरदार फ़्रॉक को लहराकर गोल -गोल घूमने लगती है।उसके पैरों में जैसे चकरघिन्नीयाँ लगी हैं। घूमते -घूमते लड़की निढाल होकर जाल पर औंधी लेट जाती है। अब पूरी दुनिया उसे गोल लगती है। गोल …गोल …और बिल्कुल गोल। आधी सदी देखी औरत दरवाज़े के पीछे दुबकी एक दुबली सी औरत पर बिगड़ रही है। दुबली औरत अपने उभरे पेट को अपनी बेरंग साड़ी का पल्लू फैलाकर छिपाना चाहती है। वो पल्लू का दूसरा सिरा मुँह में ठूँसकर अपनी रुलाई रोकने की कोशिश कर रही है।इस कोशिश में उसका चेहरा अजीब लग रहा है। उसके पेट को देखकर लडक़ी की कल्पना में नन्हें -नन्हें हाथ पाँव उभर आए हैं।अब उसकी प्रजा में वृद्धि होगी। अचानक उसके साथ आई औरत क्रोध से चिल्लाती है “छठा महीना है अम्मा…अब सफ़ाई का मतलब जानती हो ?…वो मर जाएगी।”
“कल की मरती आज मरे …जनम में थुकवा दिया डंकनी ने ”
प्रतिवाद में दूसरी औरत के चेहरे पर वितृष्णा फैल जाती है वह तल्ख़ आवाज़ में कहती है-
“थुकवाया तो तुम्हारे लल्ला ने भी . ..उसका क्या ?”
“छै फुट का आदमी डकार गई …साल नई हुआ …ख़सम चईए। पूत समान देवर ना छोड़ा।”
लडक़ी के साथ आई औरत ज़हर से भरी है।
“पूत समान देवर तो माँ समान भौजाई …छोटे को ये पाठ ना पढ़ाया अम्मा …जो हुआ दोनों की राज़ी थी?”
पीढ़े पर बैठी औरत क्षुब्ध हो उठी है।वह गुस्से में पैरों में पड़ी लकड़ी की खड़ाऊं दरवाज़े के पीछे खड़ी औरत पर फेंकती है।
दुबली औरत दरवाज़े पर सिर मारकर ज़ोरों से रोने लगी है। रेडियो की आवाज़ बढ़ा दी गई है।
“अब बस्स एक काम करो अम्मा चद्दर डलवाकर छोटे को बिठवा दो। जिसकी करनी उसके माथे…इस बेचारी को भी आसरा होगा।”
ज़हरीली औरत ने जैसे सलाह नहीं बम फेंका है।
पीढ़े पर बैठी औरत गश खाकर धड़ाम से गिर पड़ी है उसके दाँत भिंच गए हैं। बाक़ी लोग उसकी हथेलियां और तलुवे रगड़ रहे हैं।
पानी के छींटे मारती बड़ी भौजाई लड़की के साथ वाली औरत को गरियाने लगी है।
” इज्जत पर ढेले फेंकने आई हो जीजी …देवउठान पीछे लल्ला जी का लगन है।”

तीन महीने बाद हुए विवाह में वह नाराज़ औरत शरीक़ नहीं हुई थी। छोटी लड़की पिता के साथ एक दिन को आई थी। उसने छींटदार फ़्रॉक पहना था। दुबली औरत और दुबली हो गई थी। वह भीड़ में सबसे पीछे बुझी हुई आँखे लिए काँपती आवाज़ में बन्ने गा रही थी। छोटी लड़की की नज़र उसके पेट पर थी। उसकी कच्ची समझ के हिसाब से उसकी गोद में एक छोटा बच्चा होना चाहिए था। लेकिन नहीं था।वह क्यों नहीं था ! वह कहाँ था? कुछ सोचकर छोटी लड़की के भीतर झुरझुरी हो आई। वह देर तक घर के बाहर के कुएँ में तख़्तों के बीच की झिर्रियों से कुछ झाँकती रही। उसने जोर से अपना नाम पुकारा किन्तु लौटकर आई प्रतिध्वनि में उस रोज़ अपने नाम की जगह उसे ” ब–चा –ओ ” जैसा कुछ सुनाई पड़ा था।

बरसों बाद अब हवेली की जगह एक बदबूदार घूरा है। छोटी लड़की बहुत पीछे कहीं छूट गई है। अड़ियल ज़हरीली औरत राख़ हो गई है। अक्सर उस ज़िद्दी औरत की राख़ मेरे अंदर उड़ती है। मुझे जलते हुए गोश्त की चिरांध आने लगती है । उसी की तरह मेरी आँखों में चिंगारियां दहकने लगती हैं और तब मैं ठीक उसी के अंदाज़ में बगावतों का ज़हर उगलने लगती हूँ।

लेखिका – विजयश्री तनवीर.

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