आविष्कार

ये लेख मैंने खासतौर पर literature.life के लिए लिखा है। कृपया सभी महानुभवी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें। ..कि मैंने १०००० तीर में दो निशाने पे लगाये या पाँच???

???☺☺

 

कल रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। दिमाग किसी उलझन में भटक रहा था। मैंने सोचा…

 

आबादी कितनी बढ़ रही है। हवा में कितना प्रदूषण है। पेड़ भी सब कटते जा रहे हैं। और ओजोन भी फटती जा रही। ऐसे में ऑक्सीजन की मात्रा कितनी घट गई है। क्या इस मुसीबत से बचने का कोई रास्ता है हमारे पास?

नहीं।

बल्कि हम मुसीबत और बढ़ा रहे हैं। वो ऐसे कि… हम बच्चे पैदा करने का तो शौक रखते हैं। लेकिन पेड़ लगाने में बहुत आलस आता है। जहाँ एक इंसान को ऑक्सीजन के लिए दो पेड़ चाहिए। वहीं हम बच्चे दो पैदा करके चार पेड़ काट देते हैं। जिससे उन्हें कॉपी, किताब, घर और ज़मीन मिल सके।

 

फिर अचानक मुझे एक आइडिया आया। क्यों न हम ऑक्सीजन का आविष्कार करें। लेकिन, कैसे…?  कैसे…???????

फिर सुबह मैंने एक प्रयोग किया। मैंने हल्दी में मिट्टी का तेल डालकर फिर आग लगा दी। सोचा, शायद ऑक्सीजन निकले। अफसोस….. उससे एक अजीब सी गंध वाला धुआँ निकला।

फिर, दूसरा प्रयोग…… समंदर के पानी में नाइट्रोजन मिलाया। फिर भी ऑक्सीजन नहीं निकली।

फिर कॉर्बन में कुछ पसीने की बूँदें मिलाई। शायद…. इस बार ऑक्सीजन बन ही जाती लेकिन, पसीने की मात्रा ही कम पड़ गई। कारण कि अब इस पॉश एरिया में पसीना कहाँ मिलेगा। अब तो घर, दफ्तर, वाहन सब वातानुकूलित हैं। इतना कि स्कूल और मंदिर भी।

ये पसीना तो उसका था जो रोड में झाड़ू लगा रहा था। या जो पौधे सींच रहा था। वैसे पसीना तो हमें भरपूर मात्रा में मिल जायेगा। बशर्ते हम किसानों के बीच जायें।

वैसे आपको हँसी तो आ रही होगी कि इस तरह भला कहीं ऑक्सीजन का आविष्कार होता है? नहीं होता है। ये तो मुझे भी पता है। लेकिन… शायद… ऐसे ही होता हो। मतलब… ये जरूरी तो नहीं कि हर कोई एकलव्य ही बने। कुछ लोग एडिसन की तरह भी होते हैं। जो अंधेरे में ही १०००० तीर मारते हैं। ये सोचकर कि कोई न कोई तो निशाने पे लगेगा ही। ये बिल्कुल उसी तर्ज पर है जैसे– आधा गिलास पानी। सकारात्मक सोच वालों के लिए भरा और नकारात्मक सोच वालों के लिए खाली।

उसी तर्ज पर जैसे– आर या पार।

उसी तर्ज पर जैसे– #जिंदगी_50_50

कहने का मतलब… ऐसे ही ऊटपटाँग काम करके, मतलब… अंधेरे में तीर मार के एडिसन को रोशनी मिल गई। हमें ऑक्सीजन मिल जायेगी। या हमें न सही किसी और को सही। आज न सही कल ही सही। लेकिन… एक न एक दिन ऑक्सीजन का आविष्कार जरूर होगा।

 

मतलब कि जब मंजिल पे पहुँचना हो तो हाइवे पे चलना जरूरी नहीं। कोई भी गलियारा पकड़ लो मंजिल अपने आप मिल जायेगी। क्योंकि मंजिल जरूरी नहीं जरूरी सफ़र है। क्योंकि सफ़र में गति है और गति में प्रगति है। सफलता एक ठहराव है, ठहराव पूर्णविराम है।

इसलिए… चलो कुछ आविष्कार करते हैं। जीत न मिले तो क्या? चलो फेल ही होया जाय। जरूरी नहीं कि हम बिल गेट्स बनें। चलो एंटिला के सामने पकौड़े तला जाय। जरूरी नहीं कि हम सूरज बनें, चलो जुगनू बनके उड़ा जाय। क्योंकि, गीता के अनुसार… कर्म किये जा फल की इच्छा मत रख। मतलब… मंजिल से ज्यादा जरूरी है सफर। मतलब… हर काम का प्रयास। जैसे– हमने ऑक्सीजन के आविष्कार का प्रयास किया। जैसे– एडिसन ने अंधेरे में १०००० तीर मारे।

तो ये मत सोचो कि लोग क्या कहेंगे। क्योंकि विवेकानंद जी ने कहा है कि “लोग आपके काम का पहले उपहास उड़ायेंगे, फिर विरोध करेंगे और फिर सहमत हो जायेंगे।”

 

तो ठीक इसी तरह, बिल्कुल ऑक्सीजन की तर्ज़ पर मैं एक आविष्कार कर रही हूँ। खुद को लेखक बनाने का। जानती हूँ कि लोग पहले मेरा जोक बनायेंगे, फिर बुराई करेंगे और फिर मान जायेंगे।

और फिर अंधेरे में तीर मारकर हम भी एडिसन बन जायेंगे।

 

लेकिन, उससे पहले… हमें प्रयास करना होगा। सफ़र शुरू करना होगा। तो जरूरी नहीं कि #ई_एल_जेम्स का #क्रिस्चियन_ग्रे ही रचा जाय। चलो अपने घर के #हरिया को लिखा जाय। जरूरी नहीं कि #चेतन_भगत ही बना जाय। चलो शुरुआत #डॉली_परिहार से की जाय।

 

✍✍ डॉली परिहार

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