कथा संरचना: कथावाचक (नैरेटर) की भूमिका

अक्सर पहली पंक्ति से ही स्पष्ट हो जाता है कि कथावाचक है कौन? अमूमन लेखक स्वयं ही कथावाचक होते हैं। यही सुलभ भी है। पर लेखक कथा में हों, यह आवश्यक नहीं। अगर लेखक कथा में होते भी हैं, तो उनकी भूमिका नायक की तरह लगभग नहीं होती। वो तटस्थ रूप से कथा कहते रहते हैं, पात्रों से बतियाते हैं पर स्वयं मूल पात्र नहीं बन जाते। बशर्तें कि वो आत्मकथा लिख रहे हों।

तो कथावाचक के चार रूप हैंकथा का हिस्सा होना या एक महत्वपूर्ण नायक होना, कथा में नहीं होना, कथा में आतेजाते रहना, कथा में एक कथावाचक की तरह ही होना।

पहला रूप दरअसल सबसे आसान है, और कई लेखक अपनी पहली किताब उसी रूप में लिखते हैं। वो अपनी ही कहानी लिखते हैं। अपनी और अपने आसपास की। नव लेखकों में वो चाहे सत्य व्यास जी कीबनारस टॉकीज़हो या चेतन भगत जी कीफ़ाइव प्वाइंट समवनया नीलोत्पल कीडार्क हॉर्स इस कथा में लेखक सहज होते हैं। पर क्या सभी कथाओं में कथावाचक स्वयं मूल पात्र हैं? अबडार्क हॉर्सपूरा पढ़ जाइए, कथावाचक हर जगह हैं, पर कहीं स्वयं कथावाचक का विवरण ही नहीं मिलेगा। वो पात्रों के साथ घूम रहे हैं, पर वो हैं कौन? यह सबसे प्रचलित तरीका है।रेहन पर रघ्घूमें काशी बाबू रघ्घू को करीब से जानते हैं, यह कथा पढ़ कर स्पष्ट है। वो उसी के गाँव के हैं, यह भी लगता है। पर यह बात स्पष्ट नहीं होती। कथाकार पूरी कहानी सुना जाता है, फिर भी।

वहींदिल्ली दरबारके सत्य व्यास राहुल मिश्रा से बतियाते मिलेंगे। वो कथा के एक महत्वपूर्ण पात्र स्वयं है। लेखक नेपथ्य में नहीं, लेखक सामने है। लेखक के बोले हुए वाक्य हैं। पूरी बातचीत है। यहाँ लेखक तटस्थ नहीं है। वो कथा का हिस्सा है। यही बात चेतन भगत केटू स्टेट्समें भी है। लेखक ही मुख्य पात्र है।

एक और तरीका है कि कथाकार यह आभास दे कि कहानी उसी की है, पर पात्र का नाम भिन्न हो। यह उसका ‘alter ego’ हो या बदला हुआ नाम हो। जैसे नैपॉल अपनी किताब ‘The house of Mr. Biswas’ में स्वयं ही मि. बिश्वास है। यह आप कथा पढ़ेंगे तो स्पष्ट ही होगा कि यह उनकी ही कहानी है। पर कथाकार ने कहीं यह बात कही नहीं।

सबसे कठिन तरीकों में है, लेखक का आतेजाते रहना। जैसे सुभाष घई अपनी फ़िल्मों में इंट्री मारते थे, वैसे ही। पूरी कथा में अन्य लोगों की कहानी चल रही है, पर लेखक बीच में कभी जाता है। जैसेकोठागोईके लेखक बीचबीच में पात्र बनकर आतेजाते रहते हैं। यह इतिहास रूप में लिखी गयी है, तो इसमें लेखक का आनाजाना अलग लगता है। क्योंकि लेखक को टाइमफ़्रेम बदलना पड़ता है। जाहिर है, इतिहास को रोचक बनाने के लिए ऐसा किया गया है।

एक और जो तरीका है, वो है कथा से लेखक का बाहर ही होना। अब वो हैरी पॉटर हो या संदीप नैयर कीसमरसिद्धा इन कथाओं में लेखक शायद मिले। लेखक, लेखक का रूप। और यही कथाएँ पूर्णगल्प हैं, जहाँ अपने अनुभव से नहीं, बल्कि सिरे से कथा रचना की गयी हो। कथा के पात्र, प्लॉट, सब कुछ काल्पनिक हो। यह पैटर्न फन्तासी और जासूसी लेखकों में खूब नजर आता है। सुरेंद्र मोहन पाठक जी के उपन्यासों में वो नहीं मिलेंगे।

आप पाठक को किस कथावाचक से अधिक बाँध सकते हैं, यह कहना कठिन है। अगर इतिहास के सबसे लोकप्रिय (बेस्टसेलर) किताबों पर नजर डालें, तो आखिरी शैली सबसे पॉपुलर नजर आती है।गॉन विद विन्डएक पूर्ण गल्प है, जिससे कथावाचक गायब है। सभी चरित्र गढ़े गए हैं। रेट बट्लर संभव है लेखक से जुड़े रहे हों, पर यह कथा में कहीं नजर नहीं आता। शरलॉक होम्स एक भिन्न चरित्र है, जिसकी पूरी रचना कॉनन डॉयल करते हैं। प्रेमचंद कुछ कथाओं के सिवा, अधिकतर में नहीं आते। शेक्सपीयर अपनी रचनाओं में स्वयं नहीं आते। एक कथाकार का मुकाम संभवत: यही है, पर यह कोई नियम नहीं। शुरुआत सहज और स्वयं कथा में रह कर की जा सकती है।

(प्रवीण झा स्तंभकार और लेखक हैं। लेखक पेज़ – यहाँ क्लिक करें।)

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