कहानी – आक् थू

उसकी आंखें याद आती हैं।

गरमी के दिन थे। आंखें चौंधिया देने वाली धूप। सड़कें सूनीं थीं। मैं मेन गेट से बाहर निकल रहा था और वह भीतर आ रही थी।

हरी सलवार में। पीली चुनरी सिर पर। मुझे देखा तो मुस्कुरा कर सिर हिलाया।

लगा जैसे धूप में बिजली कौंध गई हो। तेज रौशनी के कारण मेरी मिंची हुई आंखें फैल गईं- वह चेहरा इतना खूबसरत लगा उस समय।

सांवले चेहरे पर पानी के रंग का पसीना।……

पता नहीं मैंने उसकी मुस्कुराहट का जवाब दिया या नहीं, लेकिन अपने सिर के तालु पर हथेली रखकर कुछ बुदबुदाया जरूर था, शायद-  गुडमार्निंग…

पहली बार लगा कि इस चेहरे से प्यार किया जा सकता है।

उसका नाम….छोड़िये नाम में क्या रखा है। उसका नाम लूंगा तो जुबान कड़वी हो जाएगी, खखारकर थूकना पड़ेगा। आप नाम कुछ भी रख लीजिए, लेकिन कृपया किसी शरीफ लड़की जैसा नाम ही सोचें।

सांवले चेहरे पर उजली हंसी। सलवार कुर्ते पर लिपटा दुबला शरीर। मिजाज में बेपरवाही। सबसे बेतकल्लुफ मेल-मुलाकात…। वह लड़की थी, लेकिन हौसला लड़कों जैसा था। इतने बड़े शहर में अकेली थी। न मां, न बाप। नौकरी के लिए भरी दुपहरी में पांच किलोमीटर का सफर, कभी सिटी बस, कभी ऑटो, तो कभी पैदल। वह दुबली काया लू के थपेड़ों को चीरती हुई दफ्तर आती थी। हर रोज। राइट टाइम।

जब अंधेरा हो जाता और आधा शहर सो चुका होता, तब टेबल से अपना बैग उठाकर कंधे पर लटका लेती, यह घर जाने का वक्त होता। 22-24 साल की वह लड़की, खतरनाक रास्ते, पांच किलोमीटर की अंधी दूरी….

सबसे पहले मुझे दूसरों से पता चला कि मैं उससे प्यार करता हूं।

बल्कि यूं कहें कि मैं उससे प्यार करता हूं यह तो मुझे पता ही नहीं था।

जब भी वह मुझसे बातें करती, लोग अजीब निगाहों से घूरा करते थे हमें। मेरे लिए यह नयी तरह की अनुभूति थी। अटपटा लगता, गुस्सा आता, कसमसाकर रह जाता।

घूरती हुई चमकती आंखें…जैसे घुप्प अंधकार में भेड़िये खड़े हों। और चारों ओर घना जंगल हो।

कभी किसी घने जंगल में आपके साथ ऐसा हो तब आप क्या करेंगे। आपको पता होगा कि भेड़िये आपको देख रहे हैं, यह भी पता होगा कि आप भाग नहीं सकते। यह भी कि यह जंगल है और यहां सिर्फ भेड़िये ही नहीं होते…..

चुप्प रहने में ही भलाई थी, उसकी भी।

लेकिन चुप्पी ने उन आदमखोरों का हौसला बढ़ा दिया था। वो आंखें अब ईशारे करने लगी थीं। मटक-मटक कर कहतीं- ऐश कर रहे हो बावा !…….

स्स्साले नेरो माइडेंट….

एक दिन मैंने उससे कहा…….

– यह सब तुम्हें भी नजर आता होगा। अजीब लगता है न ?  मेरे दोस्तों की हरकतों को देखकर पता नहीं तुम मेरे बारे में क्या सोचती होवोगी…

– हम लड़कियों के लिए इसमें कुछ नया नहीं है। आप भी नजरअंदाज कर दिया करें।

उस दिन  से मैंने उन घूरती हुई आंखों की ओर देखना ही छोड़ दिया। ताज्जुब…!!  ऐसा करना लड़कियों के लिए कितना आसान होता है और मेरे लिए कितना कठिन था।….अपने बारे में दूसरों के बुरे ख्यालात को नजरअंदाज कर देना….किसी की बुरी नीयत को नजरअंदाज कर देना…..वो आंखें पागल कुत्तों की आंखों जैसी भी लगती थी, लार टपकाते लपलपाती जीभ वाले कुत्तों की तरह….। भेड़िये तो जंगल में होते हैं, यह तो शहर है, पागल कुत्ते ही होते हैं यहां…..

एक अकेली लड़की शहर में। लाखों आंखें। घूरते हुए पागल कुत्ते। उन पागल कुत्तों की लार का एक अदृश्य दरिया बहता है इस शहर में। उस जैसी न जाने कितनी लड़कियां इस दरिया को रोज लांघती हैं।

सब कहते थे….पर मैं मानता नहीं था कि मैं उससे प्यार करता हूं। एक दिन जब मैंने मान लेना चाहा, तब दिल ने मना कर दिया – सबने कहा इसलिए तुमने भी मान लिया ? प्यार कोई बाजार की चीज है कि टीवी पर विज्ञापन देखा, और वही खरीद लाए।

….तो कुल मिलकार मैं उससे प्यार नहीं करता था।

लेकिन वह मेरे जेहन में घूमती रहती। चौबीसों घंटे। निश्चित ही प्रचार-दुष्प्रचार ने मेरे दिलो-दिमाग को झकझोर डाला था।

जब भी मैं दिल पर जम रही नमी पर दिमाग का पोंछा लगाता, तुरंत कोई नई परत जम जाती।

लोग मुझसे पूछते-

सुना है वीकली ऑफ में सिनेमा गए थे ? अकेले ही गए थे….

सवाल भी ऐसे, कि जवाब खुद मुझे ही पता नहीं होता।

आज आई नहीं वो ? बात क्या है ?

अच्छा ये बताओ, वह रहती कहां हैं, माने कहां की रहने वाली है, उसका बाप क्या करता है ?

सुना है कहीं और ज्वाइन कर रही है…..?

मैं तंग आ गया था। एक रोज गुस्सा आया तो कह दिया – हां तुम लोग सही सोचते हो। हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं।

उस रोज मुझे थोड़ी राहत मिली। उन सबके ओठों पर अजीब मुस्कुराहट तैर गई। उनकी आंखें मुझसे कह रहीं थीं- स्साले झूठ बोलता है क्या हमको नहीं पता ?

 

नाम में रखा कुछ नहीं है, पर उम्मीद है कि आपने अच्छा सा नाम सोच ही लिया होगा। मीठा सा कोई नाम। आप अपनी प्रेमिका के जैसा या फिर उसके आस-पास का नाम भी सोच सकते हैं।

– वो एक होटल में धंधा करती पकड़ी गई।

– क्या बात कर रहे हो ?

– पक्की खबर है बॉस।

– कैसे पता ?

– वैसी ही लड़की है वो। उसके कितने यार हैं, तुम्हें पता है ?

– यार, यकीं नहीं होता…वो बेतकल्लुफ जरूर है, बेपरवाह भी, पर…..

– इस पर यकीं नहीं कर रहे हो। दूसरी बातें सुनोगे तो….

– दूसरी बातें ?

–  यारों को घर बुलाया करती थी। ऑफिस से लौटकर नाइट शिफ्ट करती थी, अकेली रहती है न शहर में। कमरा भी ऐसी जगह ले रखा है कि धंधा आसानी से चलता रहे। एक एक दिन में चार-चार……तुम भरोसा नहीं करोगे….आजकल रात के वक्त उसका एक यार आता है रिसीव करने…

 

मैं उसके कम से कम एक यार के बारे में तो जानता ही था। उसी यार के बारे में, जो रोज शाम उसे रिसीव करने आता था।

उसी लड़की ने मुझे बताया था कि वह उसका ब्वायफ्रैंड है- जब वह ये बता रही थी, तब एक प्रेमी होने के नाते मुझे तड़प उठना था, लेकिन ताज्जुब, मुझे ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि अच्छा लगा कि वह रोज-रोज ऑटो या पैदल ऑफिस आने-जाने की परेशानियों से बच गई। कोई तो है जो उसे छोड़ जाता है, और बकायदा वक्त पर लेने भी आ जाता है।

उस लड़के से उसकी दोस्ती पुरानी थी, यह भी उसी ने बताया। तब की, जब वह किसी और जगह जॉब करती थी। तभी से उसका उसके साथ घूमना-फिरना था।

हमारे दफ्तर में जब नयी नयी थी, तब उस फ्रैंड के साथ आने-जाने में हिचकती थी, लेकिन दोपहर की तपिश कब तक बर्दाश्त करती। और रात के सन्नाटेदार रास्ते भी…।

उस दिन मैंने उन्हें साथ-साथ देखा, तो जोड़ी अच्छी लगी। वह तीखे-नैन नक्श वाला सांवला सा साधारण लड़का। साधारण बातचीत, साधारण पहनावा। वह भी शहर में अकेला रहता था। उसी मोहल्ले में, जहां वह रहती थी। दोनों के कमरे करीब-करीब थे।

ये मेरे लोकल गार्जियन भी हैं – उसने बताया था मुझे।

– पता ह उस दिन पुलिस केस भी हुआ था।

– अच्छा !

अपने ऑफिस के रेपुटेशन के कारण छूटी है।

कैसे ?

थाने से सीधे बॉस को फोन आया था। बताया होगा साली ने यहां काम करती है। थानेदार बॉस का पहचानवाला है न। बॉस ने सोचा ऑफिस की बदनामी होगी, इसलिए छुड़वा लिया।

अच्छा !!

किस होटल में पकड़ी गई ?

पड़ोस के शहर का कोई होटल है यार….नाम अभी याद नहीं आ रहा

किस दिन की बात है ?

फ्राइडे का….अरे वीकली ऑफ था न उसका उस दिन। साइड बिजनेस करने गई थी साली।

 

वह ऐसी लड़की होगी, मैंने सोचा भी नहीं था। आंखे भी कैसे धोखा दे जाती हैं। एक चेहरे के पीछे छुपा हुआ दूसरा चेहरा नजर ही नहीं आता। उसकी मासूमियत के पीछे कितनी मक्कारी थी। और उसकी आंखें….

बिलकुल झूठ है आंखें….। किसी की आंखों में झांककर कोई नहीं बता सकता कि उसका मन काला है या फिर सफेद। उफ ! शायद किसी वेश्या से भी इतनी घिन न करूं, जितनी इससे हो रही है। इतनी नफरत…

शराफत की चादर ओढ़े कैसी बेहया निकली। होटल में रंगे हाथ पकड़े जाने के बाद भी सिर उठाकर दफ्तर चली आई।

सब उसकी ओर घूर-घूर कर देख रहे थे। आज तो मैं भी घूर रहा था।

वह मेरे पास आकर मुस्कुराई। पूछा –कैसे हैं ?

मैंने कहा – ठीक हूं। आप कैसी हैं…?

उसने कहा – ठीक…।

मैंने महसूस किया कि आज मेरे भीतर से कोई और बोल रहा था। शायद उसने भी गौर किया हो। वह मुस्कुराई और अपनी टेबल की ओर बढ़ गई। बेशर्म। बेहया।   

होटल में पकड़ी गई ?

धंधा करने के लिए किसी दूसरे शहर में जाने की जरूरत ही क्या थी ? यहां उस जैसी कितनी कॉल गर्ल रोज धंधा करती हैं और किसी को पता भी नहीं चलता।

क्या वह अपने ब्वायफ्रैंड के साथ होटल में पकड़ी गई ?  हो सकता है कि वीकली ऑफ के रोज दोनों तफरीह करने निकले हों, और पुलिस के हत्थे चढ़ गए।

यदि ब्वाय फ्रैंड के साथ पकड़ी गई, तब तो यह सिर्फ हादसा है। यदि वह उससे प्यार करती है, तो रिश्तों की सीमा तय करना उसका निजी मसला है।

…लेकिन उसका ब्वायफ्रैंड तो कई हफ्तों से शहर से बाहर है। हो सकता है कि वह उसके वीकली ऑफ के रोज उससे मिलने आया हो और वे तफरीह के लिए निकल गए हों।

….लेकिन उन्हें कुछ करना-धरना होता तो उनके अपने कमरे भी हैं शहर में। वो लोग उस शहर में घूमने ही गए होंगे। पर क्या पुलिस ने उसे जिसके साथ पकड़ा, वह उसका ब्वायफ्रैंड ही था….??

आक्क्…..

गरमी में भी मेरे सीने में कफ जमा हो गई है। सिगरेट बहुत पीने लगा हूं आजकल।

 

संडे को बॉस ने उसे चेंबर में बुलवाया। जब बाहर आई तब चेहरा बुझा हुआ था। मंडे को दफ्तर में नजर नहीं आई। ट्यूसडे को भी नहीं….

धीरे-धीरे बात फैल चुकी थी कि उसे नौकरी से हटा दिया गया है।

अब भरोसा हुआ तुझे ?  पहले मैं भी यकीन नहीं करता था। सुदेश ने जब बताया तब मैंने भी  झूठ ही माना था। वो साला तो सब लड़कियों के बारे में बकता ही रहता है।

सुदेश ने ?

हां। और एक बार सुदेश ने उससे कहा भी था, हम क्या बुरे हैं, कभी हमको भी चांस दो न….तब भाव खा गई थी स्साली, जैसे सती सावित्री हो।

याने सुदेश को सब पता था उसके धंधे के बारे में ?

वो तो पहले से जानता था उसकी असलियत।

तभी तो….जब वह मुझसे बातें करती थी, तब सुदेश आंखें मटकाया करता था। तब मैं समझ नहीं पाता था, मुझे सुदेश पर गुस्सा आता था….

तू तो बे जोजवा है…सुदेश ही नहीं, ऑफिस के कितने ही लोगों ने ट्राई मारा, भाव नहीं दिया साली ने। चालाक है। कहां धंधा करना, कहां नहीं, जानती है।

ऑक्क्कक…..

तुझे क्या हुआ…?

कुछ नहीं। कफ बढ़ गई है। सिगरेट बहुत पी रहा हूं आजकल…

 

आज 20 रोज हो गई वह नहीं आ रही। नौकरी से निकाल दी गई है, यह तो पक्का है, पता नहीं उस दिन बॉस ने उससे क्या कहा था…

मैं जब-जब उसकी खाली टेबल की ओर देखता हूं, तब-तब ऐसा लगता है कि हरी सलवार और पीली चुनरी में कोई बैठा है। कमरे के भीतर लू चलने लगती है। वह चेहरे पर बंधा रूमाल खोलती है, और मेरी ओर देखकर सिर हिलाती है।

उसके अभिवादन के जवाब में कहता हूं – छिनाल साली।

किसी को नफरत के साथ याद करने का दर्द, प्यार के साथ याद करने के दर्द से रत्तीभर भी कम नहीं होता।

मैं उससे प्यार नहीं करता था, लेकिन अब नफरत करता हूं। मेरा नाम तो जुड़ा ही था उसके साथ, भले ही दोस्तों की चुहलबाजियों ने जोड़ा हो….मैं उससे जुड़े होने का दर्द असहनीय हो रहा था मेरे लिए….

पता है, जिस दिन वो निकाली गई, उस दिन जनरल मैनेजर ने मार्केट में हो रही बदनामी के बारे में उन्हें बताया था। उसी ने बताया था कि वह धंधा करती पकड़ी गई।

जनरल मैनेजर ने ?? लेकिन उसे तो बॉस ने थाने से छुड़वाया था न !!

हां, सुदेश ने तो यही बताया था।

 

एक रोज इंटरकॉम की घंटी बजी।

ऑपरेटर ने बताया, उसका फोन है। बात करना चाहती है।

कह दो कि मैं टेबल पर नहीं हूं- मैंने कहा।

-यार पता है वो सब झूठ था।

– क्या झूठ था।

– यही कि वह होटल में पकड़ी गई थी।

– अच्छा, तुझे कैसे पता।

– मेरा दोस्त रिपोर्टर है वहां। मैंने उससे पता लगवाया था।

– माजरा आखिर है क्या यार

– उस दिन वहां के सभी होटलों की जांच चल रही थी। पीईटी का एक्जाम था न उस दिन। दूसरे शहरों के लड़के और लड़कियां ठहरे हुए थे होटलों में। पुलिस ने ऐहतियातन जांच की। सारे स्टूडेंट्स के मां और बाप के पते नोट किए, ताकि यदि कोई वारदात न हो।….इसके 15 दिन आगे न कुछ हुआ, न 15 दिन पीछे।

– ओह !  तब तो बहुत बुरा हुआ उसके साथ।

– हां यार….बेचारी…

– लेकिन तूने सच जानने के लिए बहुत मेहनत की। कौन किसी के लिए इतना करता है आजकल। वह भी एक लड़की के लिए…

 

कुछ भी कहो यार, वो बहुत अच्छी लड़की थी। ऐसी लड़की से भला कौन…..

उसकी मकान मालिकन का फोन नंबर था मेरे पास। मैंने ऑपरेटर से कहकर फोन मिलवाया।

जवाब आया- वो तो खोली खाली करके चली गई। कहां गई पता नहीं। शायद शहर ही छोड़ दिया है..

और उसका दोस्त ?

वह भी नहीं दिखता आजकल।

 

मुझे भूख लगी थी। सोचा समोसे खा आऊं।

मेन गेट से निकलते हुए वह फिर याद आ गई।

धूप चिलचिला रही थी।

सिगरेट की तलब हो रही थी।

ऑक्कक……………थू

ढेर सारा गंदा बलगम, मेरी परछाई पर गिरा, जो इस वक्त बौने कद की थी।

 

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