केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ३)

– ये सब पैसे वालों को खडयंत्र हैं। -मुखर्जी दादा ने चारमिनार का कश खींचते हुए कहा।

सुलतान सिंग सिलाई मशीन की पैडल धुके जा रहा था। किचकिच किचकिच करती हुई सुई धकाधक टांके लगाए जा रही थी। कपड़ा पीछे की ओर सरकता जा रहा था।

सुलतान सिंग ने अचानक पैडल रोक कर, सुई का लीवर उठाया और कपड़ा अपनी ओर खींच लिया। कपड़े के साथ-साथ दो लंबे धागे भी खिंचे चले आए। सुलतान सिंग ने दांतों से ही दोनों धागे काट डाले।

आप तो कह रहे थे दादा कि गोबर मेंट उजाड़ देगी सुलतान सिंग ने कहा।

तू पगला हे रे…जिसके पास पैसा है वोई तो गोवरमेंट है मुखर्जी दादा ने समझाया।

गोबर मेंट तो हम चुनते हैं दादा सुलतान सिंग ने कहा।

तो इस बार तू खड़ा हो जा चुनाव में। लोग तुझे भी चुन लेंगे- मुखर्जी दादा ने खिसिया कर कहा। – कोई गरीब आदमी चुनाव जीतता है क्या रे….

सुलतान सिंग सोच में पड़ गया।

पता है गार्डन क्यों बना रहे हैं ? ताकि सेठ लोगों की बीवियां यहां घूम सके। साहब लोगों के बच्चे खेल सकें। इनको गरीबो से कोई मतलब नहीं है रे…

सुलतान सिंग मुखर्जी दादा की ओर भौचक देख रहा था।

इस बस्ती में कितना गरीब बच्चा लोग रहता है। स्कूल भी नहीं जाता। उनके लिए स्कूल बनाने का फिकर है किसी को ? – मुखर्जी दादा ने पूछा।

स्कूल तो है दादा बस्ती में सुलतान सिंग ने कहा।

उसको स्कूल बोलता है क्या रे….? डब्बा है डब्बा। जइसा भेड़-बकरी का कोठा होता है न, वही है वो। स्कूल तो वो है रे, उधर। जिधर अफसर लोगों का और सेठ लोगों का बच्चा पढ़ता है।

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इस स्कूल में जो बच्चा लोग पढ़ता है, वो क्या बनेगा रे बड़ा होकर। सौ में कित्ता लोग कॉलेज तक पहुंच पाएगा। आठवीं-दसवीं पढ़कर कोई हमाली करेगा, कोई मजदूरी। कोई तेरे जैसा मशीन लेकर बैठ जाएगा।

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अच्छा ये बता तू कितना पढ़ा है मुखर्जी दादा ने पूछा।

छटवीं तक सुलतान सिंग ने कहा।

आगे काहे नई पढ़ा ?

मां-बाप बचपन में मर गए। मामा के घर रहता था। मामी रोज झूठी शिकायत कर मामा से पिटवाती थी। जब भी किताब काफी खोलकर बैठता, तो चिल्लाने लगती। रोज-रोज की पिटाई से तंग आकर एक रोज घर से भाग गया। घर से निकला तब मां की ये फोटो बस साथ ला पाया।

मुखर्जी दादा ने महात्मा गांधी की तस्वीर के बगल वाले फ्रेम की ओर देखा। वहां धुंधला सा कुछ था, एक चेहरा जैसा कुछ दिख रहा था।

अच्छा…। तो तेरे को मलाल है क्या कि तू पढ़ नहीं पाया ?

बहुत मलाल है दादा।

अच्छा, तो मैं तेरे को पढ़ाएगा। तेरे को किताबें मैं देगा। तू उसको पढ़ना।

सुल्तान सिंग मन ही मन खुश हो गया। लेकिन इस उमर में पढ़ाई ?…..

 

मई का महीना था।

पांच-साढ़े पांच भी बज रहे होते, तो पहाड़ की परछाईं साइट तक पहुंच ही जाती। लेकिन इस वक्त तो दोपहर के दो बज रहे थे।

सूरज से लपटें निकल रही थीं।

जोर लगा के…हइशा, और थोड़ा……हइशा, ……….थोड़ा बांकी…….हइशा……चढ़ गया साथी…..हइशा……चढ़ गया माल…..हइशा…….

स्ट्रक्चर की रूफ पर राफ्टर चढ़ाने की तैयारी चल रही थी।

यह केबिन का स्ट्रक्चर था। पहाड़ की ढलान पर जमीन से कोई 40-50 फीट ऊपर पहले कांक्रीट का एक मजबूत प्लेटफार्म तैयार किया गया था। केबिन इसी पर बनना था। कॉलम खड़े किए जा चुके थे। उन कॉलमों के बीच एंगल वेल्ड कर उन्हें अच्छी तरह कसा जा चुका था। अब यह राफ्टर रूफ में वेल्ड किया जाना था।

रूफ के पास ही दो मोटे मोटे एंगलों पर जुगाड़ लगाया था।

जुगाड़ वह युक्ति होती है, जो किसी माल को मंजिल तक पहुंचाने के काम को आसान कर देती है।

साइट कांट्रेक्टर का अनुमान था कि इस बार एक पुल्ली और रस्से से काम चल जाएगा।

वेल्डर जोसेफ, हेल्पर गोविंद और खलासी अकरम रूफ पर चढ़े हुए थे।

योजना यह थी कि पुल्ली यानीकि घिरनी से रस्सा नीचे उतारकर उससे राफ्टर को अच्छी तरह बांध दिया जाए। रस्से के दूसरे छोर को दस-बारह लेबर खींचे ताकि माल आहिस्ता-आहिस्ता जोसफ के करीब जाकर झूलने लगे। और जब वह झूल रहा होगा, तब हेल्पर गोविंद और खलासी अकरम उसे अपनी ओर खींच कर उसे उस प्लेट तक ले आएं, जहां राफ्टर को सेट किया जाना है।

नीचे माल को परखा जा रहा था, और ऊपर गोविंद खैनी मल रहा था।

चूना ज्यादा रखना जोसेफ ने पीछे खाई की ओर थूकते हुए कहा।

जोसफ की थूक तेज हवा में कई बूंदों में बदलती हुई खाई में गिरने लगी। उस तरफ तो जमीन 40-50 फीट ऊंची थी, लेकिन इधर यह खाई सैकड़ों फीट गहरी थी।

जोसेफ ने फिर प्लेटफार्म की ओर देखा। नीचे लेबर राफ्टर को सरकी मार कर कॉलम तक ला रहे थे। एक लेबर रस्सी का एक छोर पकड़कर कॉलम के ऊपर चढ़ा जा रहा था, ताकि उसे घिर्री से फंसाकर फिर नीचे उतारा जाए।

जोसेफ ने अपनी पीठ की ओर पैंट में कुछ और वेल्डिंग रॉड खोंच लिए। फिर ग्लोबस उतार कर मुंह में रखी पुरानी खैनी बाहर खींच ली।


गोविंद ने ताजी खैनी को पट-पट-पट चार-पांच तपड़ियां दी। और फिर अपनी अंजुरि जोसेफ की ओर बढ़ा दी। जोसेफ ने नयी खैनी उठाकर ओठ में दबा लिया। फिर अंजुरि अकरम की ओर बढ़ गई। अकरम ने भी एक चुटकी खैनी ओठ में दबा ली।

कैसा-कैसा लड़बहेर लोगों के लेकर आ गया है रे, सरकी भी नई मारना आता जोसफ ने कहा। अकरम ने मुस्कुरा कर नीचे लेबरों की ओर देखा।

जब कम पैसे में काम चल जाता है तो ये टकला ज्यादा पैसे क्यों खरचा करेंगा जोसेफ भाई- अकरम ने कहा।

सूरज के साथ-साथ पूरा स्ट्रक्चर तपा जा रहा था। जोसेफ के हाथों में ग्लोब्स था, अकरम और गोविंद ने बोरे के टुकड़े पकड़ रखे थे, ताकि धूप में गर्म हो चुके राफ्टर पर पकड़ अच्छी हो।

तीनों की कमीज पसीने से लथपथ थी। माथे और कनपटी से पसीना चुचवा रहा था।

गोविंद ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा, तो उसकी हथेली पसीने से तरबतर हो गई। उसने हथेली का पसीना एंगल पर ही पोंछ दिया। गर्म एंगल पर एक गीला निशान बना, और तुरंत गायब हो गया।

 

अब सुल्तान सिंग के सामने एक बड़ा प्रश्न यह था कि वो कौन पैसे वाला हो सकता है, जो गोबर मेंट से कहलवा कर गरीब लोगों की खोली और छपरी उजाड़ना चाहता है।

पहला शक श्यामू सेठ पर हुआ, वही श्यामू सेठ जिसकी किराने की दुकान है और जहां से सुल्तान सिंग सुबह शाम दुबराज खरीदता है।

सुल्तान सिंग को पहले भी कई बार लगा कि ये श्यामू सेठ ठीक आदमी नहीं है, लेकिन उसने इतनी गहराई से सोचा नहीं था। गरीबों से उस सेठ को नफरत है, ये तो पक्का है। तभी तो उसकी दुकान में कोई बड़ा आदमी आ जाता है, तो उसका सामान पहले तौलकर देता है। गरीब आदमी खड़ा रहे।

शक का एक कारण ये भी था कि बड़े-बड़े अफसर श्यामू किराना स्टोर्स से ही सामान लेते थे। उन्हें उधार भी देता था, और उनकी कैसी चमचागिरी करता है, यह तो सुल्तान सिंग ने अपनी आंखों से देखा है। और ये साला श्यामू सेठ गरीबों को कैसा घुड़कता है, उसे अब ये भी याद आ रहा है- काहे जल्दी मचा रहा है बे, खड़ा रह चुपचाप, तेरे को भी दे रहा हूं। ज्यादा जल्दी है तो चल भाग यहां से।

वह श्यामू सेठ के बारे में जितना सोचता जाता, उसके मन में श्यामू से नफरत उतनी ही बढ़ती जाती। मानो मन में विष की कोई पोटली फट गई हो।

साला गंदा आदमी, कैसा मजाक करता है। क्यों रे सुल्तान, शादी क्यों नहीं कर लेता बे। फिर तुझे रोज आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लुगाई को ही चावल लेने भेज दिया करना। कभी मैं भी आ जाया करूंगा पहुंचाने।

बहुत कमीना है ये आदमी।

पक्की दुकान है, पक्का मकान है। दो मंजिला तान दिया है साले ने, गरीबों का खून चूस चूस कर। छत से देखता होगा, तो हमारी छपरी खटकती होगी उसे। तभी अफसर लोगों से कहकर यहां गार्डन बनवा रहा होगा।

यदि उसकी दुकान के सामने से गरीब उजड़ भी जाएंगे तो क्या फर्क पड़ेगा उसे। गरीब लोग रोज भला सामान भी कितना खरीदते होंगे उससे। उसका धंधा तो अफसरों के भरोसे है।

तो कॉमरेड मुखर्जी ठीक ही बोल रहे थे। इस खड्यंत्र में ये श्यामू भी शामिल है। पक्का।

 

– देखो, संगठन बोनाना पोरेगा, संगठन में भोत ताकत होता हाय….- कॉमरेड मुखर्जी ने कहा।

सबने सिर हिलाकर सहमति दी।

सब मिलकर लोरेगा, तो गोवरमेंट का हिम्मत नहीं होगा इधर आंख उठाके देखने का।

सबने सिर हिलाकर सहमति दी।

हमको एक रहना ही नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए।

सबने सिर हिलाकर सहमति दी।

शब लोग अपने अपने छपरी में लाल झंडा लगाएगा, तो शब एक दिखेगा। यूनिटी दिखेगा।

सबने सिर हिलाकर सहमति दी।

सुलतान तुम सिलेगा झंडा।

सुलतान ने सहमति दी।

एक ओबेदन बनाके कोलेक्टर को देगा, शब का दस्तखत होगा उसमें।

सब ने सहमति दी।

सुलतान, तुम शब के घर जाकर दस्तखत करवाएगा।

सुलतान ने सहमति दी।

प्राजी, इक गल्ल दस्सो, सरकार नाल इन्ने आदमी लड़ लेवांगे ? – बलबीर सिंग ने पूछा।

कॉमरेड को थोड़ा बुरा लगा।

एक आदमी भी काफी होता है कॉमरेड मुखर्जी दादा ने चारमिनार की कागज की ट्राली को आगे धकेलते हुए कहा।

तब तुस्सी अकेले क्यों नई लड़दे, प्रॉजी। अस्सी लड़ेंगे तो रोटी कैसे पावेंगे।

कॉमरेड मुखर्जी थोड़ा हड़बड़ा गए। ये आदमी ठस बुद्धि का दिखता है, लेकिन तर्क कर रहा है।

हाम तो लोर ही रहा है। हमारा छपरी नई इधर। तुम लोग का है। तब भी लोर रहा है। तुम भी लोरेगा तो हमारा ताकत और बढ़ जाएगा।

तुस्सी काम की करदे हो प्रॉजी ?


सुल्तान सिंग ने अपनी छपरी से बाहर निकलकर देखा। यहां से वहां तक, सारी झोपड़ियों में, सारी छपरियों में लाल झंडा लहरा रहा था। उसकी छाती चौड़ी हो गई। ये सारे झंडे उसी ने सिले थे। घर-घर खुद जाकर बांटा था।

जिधर देखो उधर लाल ही लाल।

बलबीर और जगतार की खोली में लाल, जोसेफ की झोपडी में लाल, अकरम की छानी में लाल, गोविंद की छानी में लाल, नंदू धोबी के दरवाजे पर लाल, श्यामू सेठ की छत पर लाल….

हांय…ये क्या ? खडयंत्रकारी श्यामू सेठ की छत पर भी लाल झंडा !! मोहल्ले का सबसे बड़ा लाल झंडा, एकदम स्पेशल वाला !! उसने तो ऐसा एक भी झंडा नहीं सिला !!

सुल्तान सिंग का दिमाग चकरा गया। ये श्यामू तो उस रोज मिटिंग में भी नहीं आया था। फिर उसने कैसे टांग लिया लाल झंडा। क्या खुद से टांग लिया, या किसी ने जाकर उससे भी टांगने कहा है ?

ये बस्ती के लोग भी कितने भोले हैं, कुछ समझते ही नहीं। क्या जरूरत थी श्यामू की बिल्डिंग में झंडा टांगने की।…लेकिन झंडा तो एकदम स्पेशल वाला दिखता है। बस्ती के लोग कहां से पाएंगे ऐसा झंडा ?

सुल्तान सिंग के पेट में हुदहुदी मच गई। किससे कहे, किससे पूछे। सामने की गुमटी में नंदू धोबी इस्त्री का ढक्कन खोलकर उसमें कोयले भर रहा था।

सुल्तान सिंग ने उसे आवाज देकर पूछा खाना खा लिए काका ?

हव

क्या सब्जी ?

मुनगा-आलू

बची है क्या ?

हव, आजा।

सुल्तान सिंग ने अपनी छपरी से कटोरी निकाली और नंदू की गुमटी की ओर बढ़ गया। गुमटी के पीछे ही नंदू की झोपड़ी थी।

नंदू ने भर कटोरी मुनगा-आलू सुल्तान सिंग को थमा दिया।

उधर देखा ?

का हुआ बे।

उधर देखा, श्यामू सेठ का झंडा ?

हां, का हुआ ?

नई कुछ नई, अच्छा है।

हां, बहुत अच्छा है। बस्ती वालों का साथ दे रहा है।

सुल्तान ने कटोरी को दूसरी हथेली से ढंकते हुए कहा। सबसे ऊंचे पर बांधा है। इत्ते ऊंचे चढ़ा कौन रहा होगा।

बलबीर सिंग। उसे ही बुलवाया था सेठ । – नंदू धोबी ने कहा।

सुल्तान सिंग ने एक बार फिर श्यामू किराना स्टोर्स की छत पर लहरा रहे झंडे की ओर देखा।

क्रमशः

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