केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ४)

अब देखो कैसा यूनिटी दिख रहा है कॉमरेड मुखर्जी ने पुलकित होते हुए सुल्तान सिंग से कहा।

सुलतान सिंग ने कहा- हां दादा, दिख तो रहा है।

मैं येइच्च तो चाहता था। शाबास कॉमरेड, बहुत अच्छा काम किया तुमने। -कॉमरेड मुखर्जी ने सुल्तान की पीठ ठोकी।

लेकिन एक बात बताओ दादा, ये लाल झंडा यूनिटी कैसे है ? – सुलतान सिंग ने कहा।

तू क्या बोलता है रे, पगला है क्या? पूरा बस्ती हमारा साथ हाय, दिखता नई क्या ?

दादा, लाल झंडा देखकर कैसे जान जाएं कि किसके दिल में क्या है। आजकल तो खड्यंत्रकारी लोग भी लाल झंडा लेकर घूम रहे हैं।

कॉमरेड मुखर्जी ने चौककर सुल्तान सिंग की ओर देखा।

सुल्तान सिंग श्यामू सेठ की बिल्डिंग की ओर देख रहा था।

कॉमरेड मुखर्जी ने सुल्तान के कंधे पर हाथ रखकर कहा तू कैसे जानता है कि कौन खड्यंत्रकारी है, कौन नहीं ?

मेरे को पता नहीं है दादा, लेकिन लाल झंडा लगाने वाले हर आदमी अचछा हो, ये जरूरी नहीं।

तू आंदोलन को समझता नई है रे। आंदोलन ऐसा ही नई हो जाता है। बहुत सोहन कोरना पोरता है। शब को साथ लेकर चोलना पोरता है। जो-जो साथ आता है, शब का स्वागत है। शब दोस्त है हमारा। जो नई आता है, समझलो वोइच्च …

बलबीर तो मिटिंग में आता है दादा, जगतार नहीं आता।

तेरे को अभी खूब पढ़ना पड़ेगा रे। मैं देगा तेरे को कितोब। कोई ऐसे ही कोम्युनिस्ट नई बन जाता। खूब पोढ़ना पोरता है।

कितना दादा ?

खूब ।

 

जोसेफ ने अपने सिर के ऊपर से गुजर रहे एक एंगल पर वेल्डिंग-होल्डर लटकाकर उसका केबल पर्याप्त लंबाई में अपनी ओर खींच लिया, ताकि जब माल ऊपर आए तो ठीक से टांका मारा जा सके।

वेल्डिंग केबल का छोटा-मोटा टुकड़ा भी बहुत-भारी होता है, फिर तो यह केबल 40-50 फीट नीचे रखी वेल्डिंग मशीन से ऊपर आया था। इस केबल को सपोर्ट दिए बिना टांका लगाया ही नहीं जा सकता था।

गोविंद का काम ही यही था। इस बात का ध्यान रखना कि इस केबल के वजन और होल्डर के संतुलन का ध्यान रखे। और जब टांके लग जाएं, तो टांकों से बाबरी झाड़ दे। बाबरी यानी काली पपड़ियां। जब वेल्डिंग रॉड अपना काम कर रही होती है, तब लोहा पिघलने लगता है। इसी पिघले हुए लोहे पर बाबरी जम जाती है।

जोसेफ ने अपनी पीठ में खुची एक वेल्डिंग रॉड को निकालकर होल्डर के मुंह पर फंसा दिया। फिर उस रॉड को लोहे में टच करके करंट और अर्थिंग की जांच की। उसके एक हाथ में वेल्डिंग ग्लास थी, दूसरे में वेल्डिंग होल्डर।

छरछरछरछरछर…..तेज लाइट निकली।

गोविंद को इस बात को लेकर भी सतर्क रहना पड़ा है कि जोसेफ किस वक्त वेल्डिंग रॉड से लोहे का स्पर्श करने वाला है। उसके पास वेल्डिंग ग्लास नहीं होती, लाइट सीधे पहुंचती हैं। इससे पहले कि वेल्डिंग रॉड लोहे को छुए, उसे तुरंत अपनी नजर किसी और तरफ कर लेनी होती है, ऐहतियात वह अपनी उल्टी हथेली से भी लाइट और आंखों के बीच एक पर्दा डाल देता है।

घुंउउउउउउउउउउ….छरछरछरछर

कंरट ठीक है। अथिंग भी है। अब बस माल चढ़ने का इंतजार है।

नीचे लेबर माल को सरकी मारकर कॉलम तक लाने की कोशिश कर रहे हैं।

जोसेफ ने नीचे झांककर देखा। कम से कम 15 मिनट और लग जाएंगे। इतना भारी भी नहीं है कि दस बारह लोग कंधे पर उठा न सकें, लेकिन जिस जगह पर माल रखा है, वहां उसे कंधे पर लेकर चला भी नहीं सकता। कांक्रीट में कहीं लोहे की छड़ें निकली हुई हैं। कहीं पर ऑक्सीजन और डीए के सिलेंडर रखे हुए हैं, कहीं पर एंगल हैं, कहीं पर प्लेंटें, कहीं पर स्क्रेप्स। रॉफ्टर को सरकी मारकर ही लाया जा सकता है।

जोसेफ ने अपने गोलब्स उतारकर टांग दिए। गोविंद और अकरम ने भी यहां वहां कुल्हे टिका लिए। भीषण धूप में पसीने से तरबतर चेहरों को भूख ने भी लाल कर रखा था। लंच का समय हो चुका था, लेकिन काम अधूरा छोड़कर जाया भी नहीं जा सकता था।

तभी पहाड़ की ओर से हवा चली। पसीने से लथपथ तीनों का बदन ठंडा हो गया। किसी मजदूर के लिए इससे ज्यादा सुख का क्षण क्या हो सकता है। चिलचिलाती धूप से ये पसीना ही मुकाबला करता है। शरीर की ठंडकता आत्मा तक समा चुकी थी।

जोसेफ ने कहा- परसों छोटी का जन्म दिन हैं।

अरे वाह, मुबारक हो पार्टी बनती है।

पगार को गुरूवार को मिलेगी, परसों मंगलवार है – जोसेफ ने कहा।

एडवांस मांग लेना टकले से गोविंद ने कहा।

कमीना है, नहीं देगा जोसेफ ने मुंह बनाकर कहा।

श्यामू सेठ से सामान उधार लेंगे। गुरूवार को पेमेंट कर देंगे उसका।अकरम ने कहा।

नहीं छोड़ों, बहुत खर्चा हो जाएगा। अभी घरवाली प्रेग्नेंट भी है। इसी महीने कभी भी अस्पताल दौड़ना पड़ सकता है, तब फिर पैसे लगेंगे।जोसेफ ने बताया।

नसबंदी क्यों नहीं करवा लेते, चार तो पहले से हैं तुम्हारेगोविंद ने पूछा।

उसे ही लड़के का शौक है, इस बार नहीं मानी तो जबर्दस्ती करवा ही दूंगा, कमाना तो मुझे पड़ता है। जोसेफ ने कहा।

हइशा…..हइशा….हइशा…मारो सरकी….हइशा…सरक गया माल….हइशा……..अबे बारी ठीक से फंसा बे ठीक से….तेरी बारी का तो जोर ही नहीं लग रहा है…..नीचे टकला ठेकेदार चिल्ला रहा था।

 

– क्यों बे सुलतान, सबको झंडा दिया, हमको काहे नई दिया बे ? – सुकीर्तन रॉय ने सुल्तान की धमकाते हुए कहा।

– बबब…बस्तीवालों को बस दिया, जो मिटिंग में आए थे सुल्तान हकलाने लगा।

– अबे तो मिटिंग में हमको क्यों नहीं बुलाया, हम भी आते रॉय ने फिर चमकाया।

– दादा ने बुलाया था सबको सुलतान ने कहा।

– कौन? मुखर्जी दादा ?? तेरा कब से दोस्ती हो गया बे उनसे। तू मेरे से ज्यादा बड़ा दोस्त है क्या उनका। बोलना रॉय ऐसा बोल रहा था।

– हव, बोल दूंगा।

– अब दे झंडा। मेरे भी घर में लगाना है। एक मेरी बुलेट में भी लगेगा।

– सुल्तान ने कहा- एक ही ले लो।

– अबे चंदे का है न, तेरा क्या जाता है। दो दे।

सुल्तान ने दो झंडे दे दिए।

रॉय ने बुलेट में किक मारी और भडभडभडभड करता हुआ आगे बढ़ गया।

साला लकड़ी चोर। ये भी घर में झंडा लगाएगा।सुल्तान ने मन ही मन सोचा। फिर मुखर्जी दादा की नसीहत याद आ गई- जो जो साथ आ रहा है, शब हमारा दोस्त हाय।

 

– ये शब छोटा-मोटा बात है कॉमरेड, आंदोलन में तो और बोरा बोरा मुसीबोत आता है कॉमरेड मुखर्जी ने सुल्तान को समझाया।

– लेकिन दादा, वो रॉय भी झंडा लगाकर घुमेगा तो सब की बदनामी नहीं होगी क्या ?

– अरे तू क्यूं फिकिर कोरता है रे। कुश बदनाम नई होगा। शोब जानता है, कोन चोर है, कोन नई हाय।कॉमरेड मुखर्जी ने समझाया।

– वो बोल रहा था कि आप उसके दोस्त हैं- सुल्तान ने कहा।

– जोब वो दोस्त बोलता हाय, तो मैं दुश्मन कइसा बोलेगा रे कॉमरेड मुखर्जी ने कहा।

– सुल्तान का दिमाग चकरा गया। ये मुखर्जी भी ठीक आदमी नहीं लगता है।

– तू शुन रे बाबा। अइसा छोटा-मोटा चिरकुट लोगों को दुश्मन बनाने का टाइम किसके पास है। हमारा लड़ाई बहोत बड़ा है,हमारा दुश्मन भी बहोत बड़ा है।

सुल्तान को बात थोड़ी सी समझ में आई।

एनर्जी वेस्ट नई करने का चिरकुट लोगों के पाछू . छोटा-मोटा चोर-तस्कर है ये लोग। इनका पाछू मगजमारी करेगा, तो फिर लड़ाई कैसे लोरेगा।

सुल्तान का मन अब थोड़ा शांत हो रहा था। लेकिन दादा की एक बात समझ में नहीं आई, ये सरकार को दुश्मन क्यों बोल रहे हैं।

दादा, तो क्या सरकार हमारी दुश्मन है ?

नाई रे, शोम्राजबादी ताकत हमारा दुश्मन है। सरकार में जो शोम्राजबादी लोग घुसा है, उससे लड़ना है। जनबादी लोगों को सरकार में भेजना है।

सुल्तान का दिमाग चकरा रहा था- ये शोम्राजबादी कौन है दादा ?

शोम्राजबादी नई रे, शोम्राजबादी….शो म्रा ज बा दी….

हां, वही। कौन है ये….

मैं तेरे को कितोब देगा, तू पोरना।

(16)

– अच्छा ये बताओ कि भूत-परेत होते हैं कि नहीं?

– होते हैं।

– किसने देखा है। मन का भरम है सब।

– मैंने देखा है।

-कहां ?

गांव में। एक रोज रात के समय सायकल से नहर के किनारे-किनारे जा रहा था, कि अचानक सामने सफेद साड़ी पहने कोई आ गया…..

ओए, सो जाओ वै, बहुत रात हो गित्ती है….

बलबीर ने घुड़का तो नंदू धोबी और सुल्तान दोनों चुप हो गए।

गरमी की रात थी। नंदू धोबी, उसके बेटे दिलीप और सुल्तान की खाट सड़क के किनारे कतार से लगी हुई थी। नंदू के एक तरफ दिलीप, फिर सुलतान। सबने मच्छरदानियां तान रखी थीं, और अपनी अपनी मच्छरदानी में घुसकर गप्पबाजी कर रहे थे।

करतार सिंग और बलबीर सिंग की खाट थोड़े फासले पर एक-दूसरे के करीब बिछी हुई थी।

सुल्तान और नंदू धोबी की गपशप शुरू हुई थी मिटिंग और आंदोलन से। लेकिन बात भूत-प्रेत तक आ पहुंची थी।

अमावस की रात, उस पर बत्ती गुल। चारों और अंधेरा ही अंधेरा। आसमान साफ था, तारे खिले हुए थे।

अपने मोहल्ले में भी है…- नंदू ने फुसफुसा कर कहा, ताकि बलबीर तक आवाज न जाए।

क्या ?….सुलतान ने भी फुसफुसाते हुए पूछा।

परेत।…वो महुआ पेड़ दिख रहा है न, उसमें….। मैंने कई बार अपनी आंखों से देखा है। अमावस की रात को निकलती है।

नंदू को याद आया आज भी अमावस की रात है। खुद उसके शरीर में झुरझुरी फैल गई।

पास ही एक कुत्ता रोने लगा। सुल्तान उठ बैठा। हाट-हुट करके पत्थर मारकर भगाया उसे।

अब सो जा सुलतान- नंदू ने कहा।

सुलतान और नंदू दोनों खामोश हो गए। नंदू के बेटे दिलीप ने भी करवट बदल कर एक चादर सिर से पांव तक तान ली।

सड़क पर सन्नाटा पसर गया। बस खर्राटे की आवाजें आ रही थी। बलबीर और जगतार भी सो चुके थे।

रात गहराती चली गई।

अचानक जगतार की नींद टूटी। बलबीर की भी। उन्होंने सुना नंदू धोबी जोर-जोर से चिल्ला रहा है। छोड़े बे-छोड़ो बे….

दोनों उसकी ओर भागे। देखते क्या है कि दिलीप सुलतान की छाती पर सवार है और उसकी गरदन दबोचे हुए है। सुल्तान अपनी गरदन से उसके हाथ हटाने की कोशिश कर रहा है। दोनों कुछ बोल नहीं रहे हैं, बस घुघु घुघु कर रहे हैं। दोनों के गले से अजीब आवाजें निकल रही हैं।

सब ने मिलकर दोनों को एक-दूसरे से अलग किया। दिलीप खटिया से कूदकर दूर खड़ा हो गया। वह चिल्लाने लगा- भूत भूत।

उधर सुल्तान भी चिल्ला रहा था। बचा लो, बचा लो।

नंदू धोबी ने दिलीप को पकड़ा और गाल पर एक झापड़ रसीद करते हुए पूछा- कहां है बे भूत।

दिलीप ने सुल्तान की ओर ईशारा किया।

इधर सुल्तान को बलबीर और जगतार शांत कर चुके थे।

अब बताओ बे दोनों। क्या हुआ।

सुलतान ने बताना शुरू किया मैं सो रहा था। अचानक मेरी नींद टूटी, तो देखा दिलीप अजीब-अजीब आवाज निकाल रहा है। मैं डर गया। मुझे लगा कि परेत सवार हो गई है। मैंने इसे जोर से पकड़ लिया।

फिर ?

इसने मुझे मेरे बिस्तर पर पटक दिया और मेरी छाती पर चढ़ गया। मेरी गरदन दबोच ली। तब मैं और डर गया…

तू बता बे….तुझे क्या हुआ……

मैं समझा कि सुल्तान भैया को भूत धर लिया है……

 

जाने दे माल..हइशा रे…..मारे जोरा…हइशा रे…और थोड़ा…..हइशा रे…..

बस बस बस बस

रॉफ्टर को सरकी मारते हुए लेबर उस कॉलम के करीब ला चुके थे, जिसके ठीक ऊपर जोसेफ, गोविंद और अकरम एंगल पर लटके हुए थे।

ऊपर, एंगल पर बंधी पुल्ली से गुजारते हुए रस्से का जो सिरा वापस प्लेटफार्म पर उतारा गया था, उसे बलबीर ने थाम रखा था। दूसरे सिरे पर आठ-दस लेबर खड़े थे, ताकि बलबीर जब राफ्टर पर गांठ बांध ले, तो उस दूसरे सिरे को खिंचाना शुरू किया जा सके।

ऐसे कामों में गांठ बांधने के काम में विशेषज्ञता चाहिए होती है। हर कोई यह निर्णय नहीं ले सकता कि किस वक्त रस्से पर किस तरह की गांठ बांधनी चाहिए। किस माल में किस जगह पर रस्सा बांधा जाएगा, इसकी परख भी तुरंत करनी होती है, बिना किसी मशीन के। ताकि जब माल ऊपर चढ़ने लगे, तो उसका संतुलन बना रहे। राफ्टर जैसी चीजों में तो गुरूत्व बिन्दु का अनुमान लगाना तब भी आसान होता है, लेकिन हर माल उसकी तरह सपाट नहीं होता।

बलबीर ने राफ्टर में वह जगह ढूंढ ली जहां गांठ बांधी जानी चाहिए, और फिर वह अपने काम में जुट गया।

अचानक बलबीर की नजर रस्से पर यहां-वहां नजर आ रहे काले-काले दागों पर पड़ी। उसने सिर उठाकर जगतार की ओर देखा और आंखों से ईशारा किया।

जगतार ने कहा- ये रस्सा काम नई आवेगा ओए। दूसरा रस्सा चाही होएगा।

टकला ठेकेदार भड़क गया- क्यों काम नहीं आएगा ये रस्सा, क्या हुआ है इसे।

जगतार ने कहा- तुस्सी वेख लो, ये काले-काले निशान। वेल्डिंग स्पार्क गिरा हैगा इस पर।


एक तो दोपहर के ढाई बजने वाले थे। पूरा दिन राफ्टर को सरकी मारते हुए निकल गया। राफ्टर अब जाकर कॉलम तक पहुंचा है, और अब ये जगतार कह रहा है कि दूसरा रस्सा चाहिए। साइट पर दूसरा रस्सा अभी है नहीं।

इंतजाम करते-करते आध-पौन घंटे और निकल जाएंगे। ऐसे में तो आज राफ्टर को रूफ पर सैट करने में ही पूरा दिन निकल जाएगा। हो सकता है कि लेबर ओटी मांगें। ये सब बहाने बाजी है, लंच में थोड़ी देर क्या हुई साले नाटक करने लगे। हराम का पैसा आया है क्या ठेकेदार का।

टकले ठेकेदार ने कहा- तू सठिया गया है जगतार। बात तो ऐसी कर रहा है, जैसे कभी मैंने माल चढ़ाया ही नहीं हैं। कुछ नहीं हुआ है रस्से को मजबूत है, बांधों। मैं देखेगा, कैसे नई चढ़ेगा इससे माल।

बलबीर ने जगतार की ओर देखा। जगतार खामोश था, उसकी आंखों में ठेकेदार के लिए गालियां थीं।

बलबीर ने गांठ बांध दी और फिर लेबरों से कहा- हां पाई, खींचो।

ऊपर, जोसेफ, अकरम और गोविंद सतर्क हो गए।

बोलो हां….हां……जाने दे माल…हइशा रे…और थोड़ा…हइशा रे……

राफ्टर आहिसा-आहिसा ऊपर की ओर चढ़ने लगा। बलबीर को लगा कि लोड ज्यादा है और आदमी कम, इसलिए वह भी लेबरों के साथ मिलकर रस्सा खींचने लगा।

थोड़ा साथी…हइशा रे…थोड़ा बांकी….हइशा रे….चढ़ गया माल……हइशा रे…..

जगतार लेबरों के पीछे, रस्से के खींचे हुए सिरे को एक कांक्रीट के कालम में लपेटता जा रहा था, ताकि यदि लेबर के हाथों से रस्सा स्लीप होने की कोई स्थिति बने तो उसका वजन कांक्रीट के कॉलम पर आ जाए।

जाने दे माल….हाइशा रे….चढ़ गया माल…हइशा रे…..जोर जवाना….हइशा रे….मिलेगा दाना…हइशा रे…

माल जोसेफ और अकरम तक पहुंच कर हवा में लटक रहा था। जोसेफ ने ऊपर से हाथ का ईशारा करके कहा- बस बस बस…रुक जाओ।

अकरम ने एक हाथ से एंगल को पकड़ा और दूसरे हाथ से हवा में झूल रहे राफ्टर को लपककर अपनी ओर खींचने लगा। गोविंद भी उसका हाथ बंटाने लगा। जोसेफ को लगा कि उसकी भी जरूरत पड़ेगी। उसने आसपास अपनी पकड़ देखी, जब कुछ न दिखा तो सिर के ऊपर के एंगल से लटक रहे वेल्टिंग होल्डर और उसके केबल को मिलाते हुए अपने लिए पकड़ बनाई, फिर वह भी राफ्टर की ओर लपका।

राफ्टर अब उनकी ओर खींचा चला आ रहा था।

तभी कड़ कड़ कड़

भागो बे नीचे से भागो….जोसेफ अभी कह ही रहा था कि रस्सा टूट गया।

राफ्टर के जिस सिरे को वे अपनी ओर खींच चुके थे, वह उसी एंगल से बुरी तरह टकराया जिस पर तीनों खड़े थे।

घननननन्नननननन्….धड़ाक……….


जोसेफ के पांव एंगल से उखड़ गए थे। वह केबल पकड़कर लटक गया था। अकरम भी अपना संतुलन खो चुका था, वह हवा में अपने हाथों को झूला झूला कर खुद को गिरने से बचा रहा था। और गोविंद जोसेफ की कमर पकड़कर चिपका हुआ था।

घन्नननन्नननन…धूम….धड़ाक….धाड़….धाड़….घन्ननन…………

राफ्टर यहां वहां टकराता हुआ 40-50 फीट नीचे जा गिरा। रस्सा खींच रहे लेबर टूटे हुए रस्से के साथ एक ओर गिरे पड़े थे। गिरते हुए राफ्टर से खुद को बचाने के लिए जगतार और टकला ठेकेदार अलग-अलग दिशाओं में भागे।

ठन्नननननननननन…

चारों ओर शांति थी।

ऊपर, जोसेफ, अकरम और गोविंद बुरी तरह हांफ रहे थे।

नीचे, बलीबर और उसके साथ गिरे पड़े आठ-दस लेबर अब खड़े होकर अपनी-अपनी चोंट देख रहे थे।

टकला ठेकेदार अपने सिर पर हाथ दिए एक ओर बैठा था।

जगतार की आंखों में खून उतर आया था।

वह टकले ठेकेदार की ओर बढ़ा…..तेरी पैण दी ……

क्रमशः

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