केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ५ – अंतिम)

– रीगन तेरा तानाशाही

– नहीं चलेगी नहीं चलेगी

– अमरीका तेरा तानाशाही

– नहीं चलेगी नहीं चलेगी

– शोम्राजबाद…

– मुरदाबाद मुरदाबाद

– सोरबाजनिक क्षेत्रों का निजीकरण पे

– रोक लगाओ रोक लगाओ……

सुल्तान को कुछ पल्ले तो पड़ नहीं रहा था, तब भी वह भी चीख चीख कर नारे लगा रहा था। जब दादा नारे लगवा रहे होंतो लगाना ही पड़ेगा। तब भी मिटिंग खत्म होने के बाद पूछ ही लिया।

दादा ये रीगन कौन है ?

ये शोब बैशबिक शोम्राजबादी लोग हैं।

अच्छा।

अमरीका का नाम शुना ना, उसका राष्ट्रोपति हाय।

अच्छा।

और ये सोरबाजिक…

सोरबजनिक…जो शब का है, तुम्हारा, मेरा शब का हाय…गोवरमेंट सेक्टर…सरकार का है जो…वो सोरबजनिक…जइसा ये धरती हाय न, ये आकाश हाय न, नदी, पहाड़….ये शोब सोरबजनिक है…शोब गोरमेंट का नई हाय, फेर बी सोरबजनिक हाय….

अच्छा…..

उसका निजीकोरण कोर रहा है…निजी हाथ में दे रहा है…सेठ लोगों को….पइसा वाले लोगों को….उशका बिरोध करता हाय…..

अच्छा…..

अमरीका ऐसा क्यों कर रहा है ?

अमरीका नई कोरता है रे, कोंग्रेस कर रहा है…कोंग्रेस पार्टी का गोबरमेंट

अच्छा…

तब अमरीका करवा होगा….

तू ऐशा ही समझ ले अभी….शोब शोम्राजबादी लोग एक हाय….शोब पइसा वाला एक हाय….दुनिया के शोब गरीबों को एक होना पोरेगा….शोब मजदूर लोगों को एक होना पोरोगा….

तो दादा, ये बस्ती…

अरे, शब मिलाजुला हाय रे….शब एकीच्च हाय….

तू कॉमरेड मार्क्स को पढ़ेगा तो जानेगा…

अच्छा……ये कौन……

मैं तेरे को कितोब देगा….


आज जोसेफ जल्दी घर लौट आया, तब भी सूरज तो ढल ही चुका था।

छोटी बिटिया ने दौड़कर उसके हाथ की टिफिन ले ली।

कैसी है मेरी मुन्नी ? स्कूल गई थी? – जोसेफ ने बिटिया का गाल सहलाते हुए कहा। और फिर झोपड़ी के बाहर बनी नहानी की ओर बढ़ गया।

उफ! कितनी गरमी है आज….

चाहे गरमी हो, ठंड हो या बारिश हो…साइट से लौटकर नहाना तो रोज ही पड़ता है। पानी जब सिर से गरदन और छाती की धूल के साथ शरीर के नीचे उतरता है, तो दिनभर की थकावट की परतें भी उतर जाती हैं। ड्यूटी-ड्रेस बदलते ही लगता है, मानो भीतर का आदमी ही बदल गया।

जोसेफ ने लुंगी पहन ली और उस पर बनियान डाल लिया। शरीर कुछ हल्का हुआ अब।

पत्नी ने मुस्कुराकर जोसेफ की ओर देखा।

जोसेफ भी मुस्कुरा उठा। आज वह सादा लौटा है, बिना पिये। वरना रोज घर लौटने से पहले एकाध गिलास महुआ तो ले ही लेता है।

वह अपने बाल पोंछता हुआ खोली के भीतर घुसा तो पीछे पीछे मुन्नी भी आ गई। खोली में अंधेरा हो चुका था। जोसेफ ने कमरे रखी चिमनी जला दी।

बाप को आया देखकर खाट पर लेटी बबली उठ खड़ी हुई। जोसेफ ने उसके सिर पर भी हाथ फेरा।– जाओ दोनों बाहर जाकर खेलो।

 

ठन्नन…ठन्नाक…..धूम……धड़ाम……तेरी पैण की….सर फोड़ देना तेरा इत्थे इ….

 

चिमनी की लौ से काला धुंआ उठ रहा था।

आज यदि वेल्डिंग केबल हाथ से छूट जाता तो…….

ठन्नन…..ठन्नाक………….

खाट पर लेटे जोसेफ ने आंख बंद कर करवट ले ली……….

नीचे कांक्रीट पर लोहे की सरिया भाले की तरह निकली हुई थी। तीनों उसी पर गिरते…….

 

सरिया न भी होती तो 40-50 फुट से गिरकर बचता कौन…..

मुन्नी का जन्मदिन है…..शीला को नौंवा महीना चल रहा है……अस्पताल कभी भी जाना पड़ सकता है……

चार बच्चे हैं, एक और आ जाएगा……

ठन्नन….ठन्नाकककक……………….

– मुन्नी ऐ मुन्नी…बबली ए बबली….कहां है दोनों…बबीता कहां है…..और सावित्री…….

पति को चिल्लाता देखकर जोसेफ की पत्नी शीला भी खोली के भीतर आ गई…..

क्या हुआ ?

कहां है बच्चे सब ?

मुन्नी और बबली को तुमने ही खेलने के लिए बाहर भेजा है। बबीता पड़ोस में है और सावित्री चाय पत्ती ने गई है दुकान…..

हां, खेलने दो उनको……

क्या हुआ, तबियत ठीक है?

हां ठीक है, वो गोविंद…गोविंद घर लौटा कि नहीं….

मुझे कैसे पता ? क्यों ?

नहीं कुछ नहीं, उसके साथ थोड़ा मार्केट तरफ जाउंगा….

माने आज भी….।– शीला से मुस्कुराते हुए कहा।

जोसेफ ने उठकर खूंटी पर टंगी पैंट निकाली और पहन लिया। ऊपर से हरी टी-शर्ट डाल ली। चिमनी के पास खड़े होकर अपना चेहरा आइने में देखा और फिर कंघी करने लगा….

 

दादा, आप लेबर लोग के लिए जो कर रहे हैं अच्छा लगाता है मेरे को- श्यामू सेठ ने कहा।

तुम हामको एक रोजिस्टर और कागोद दे दे – कॉमरेड मुखर्जी ने श्यामू सेठ की ओर रुपए बढ़ाते हुए कहा।

अरे, रजिस्टर निकाल रे, एक दस्ता पेपर निकाल – श्यामू ने अपने नौकर को आवाज दी।

आप बैठिये न दादा। दादा को कुर्सी दे बे – श्यामू ने दूसरे नौकर से कहा।

नई बैठेगा नई, जाएगा। बाद में बैठेगा।– कॉमरेड मुखर्जी ने कहा।

थोड़ा बैठो न दादा, बात करनी है आपसे – श्यामू ने आग्रह किया।

कॉमरेड मुखर्जी कुर्सी पर बैठ गए।

बहुत अच्छा कर रहे हैं दादा। ये बस्ती उजड़ना नहीं चाहिए। मेरे को बहुत अच्छा लगा कि आप इतना मेहनत कर रहे हैं।

हमारा कोम हाय, हमारा पार्टी गरीब लोगों का पार्टी है – कॉमरेड ने कहा।

बहुत अच्छा है दादा। हमारा भी पेट इन्हीं गरीबों से चलता है। ये बिचारे कमा कर लाते हैं, यहां से सामान खरीदते हैं, तो दो पैसा हमको भी मिलता है – श्यामू सेठ ने कहा।

ठीक बोलता हाय तुम। इसी को तो शोमाज बोलता हाय- दादा ने जेब से चारमिनार का पैकेट निकालते हुए कहा।

अरे, आप उसको जेब में ही रहने दो न दादा। आप ये पियो- विल्स फिल्टर।

नाई हम चारमिनार पीता है।

हां तो चारमिनार भी है ना। अबे, चाय बोलके आ रे…..

नई, चाय-शुई रहने दो। हम तुमारा चारमिनार पी लेता है।

एक बात तो आप मानेंगे दादा, कुछ तो कमी इनके अंदर भी है, तभी ये साले गरीब हैं।

दादा को खांसी आ गई। सेठ की चारमिनार बिना सुलगे ही ओठों पर नाचने लगी।

साले, इतना कमाते हैं। खर्च करने की अकल नहीं है। पैसे की इज्जत ही नहीं करते। लछमी कहां ठहरेगी इनके घर।

कॉमरेड ने सिगरेट पर लाइटर टिकटिकाई।

रोज दारू, रोज दारू….रोज मुर्गा-मछली…..थोड़े पैसे आए नहीं कि मटकने लगते हैं….

तुम खाता है मुर्गा ?

हां, खाता हूं न दादा।

दारू पीता है ?

कभी-कभी। इनकी तरह रोज नहीं पीता…..

इनको शौक नई होगा क्या ? जिसको तुम भगवान बोलता है, उसने इनको भी जीभ और पेट दिया है….

मैं वो बात नहीं कर रहा दादा, लेकिन जितनी चादर हो, पैर उतना ही फैलाना चाहिए…..

अब हम जाता है, नमोस्कार।

नमस्कार दादा। अच्छा दादा, मेरी छत पर लाल झंडा देखा आपने ? कभी भी कोई काम हो तो मुझे भी बोल देना दादा….

ये तुम्हारा रोजिस्टर और कागोद का पइसा।

अरे नहीं दादा, ये मेरी तरफ से। पइसा रहेना दो।

नाई-नाई, रख्खो तुम। जरूरत होगा तो बोल देगा तुमको.

(21)
ये गरीब के छपरी के पीछे कितना लोग पड़ गया है हो – सुल्तान ने हंसते हुए नंदू से कहा।

का हुआ बे ? – नंदू ने मुस्कुराते हुए पूछा।

अपने को तो पता ही नहीं था कि इतने दुसमन पीछे पड़े हैं- सुल्तान हंसे जा रहा था।

काहे हंस रहा है बे ? कौन दुसमन पीछे पड़ गवा है तोहरे ?

पइसा वाला लोग अलग, गोबर मेंट अलग, सम्राजबाद अलग, अमरीका अलग, और पता नहीं कौन-कौन…..

पागल हो गया है का बे ? का बोल रहा है।

अरे, मुखर्जी दादा बता रहे थे। ये सब मिला जुला है। सब मिलकर गार्डन बनाएंगे।

वो बंगाली साला तो पागल है, तू भी साथ में पागल हो रहा है।

हा हा हा हा

अमरीका यहां कहां आएगा बे, वो तो लंका के पास है।

पता है, लेकिन मुखर्जी दादा इतना पढ़ा-लिखा आदमी है, झूठ काहे बोलेगा।

अबे, तू तो पढ़ा-लिखा नहीं है ना। वो बोलता कुछ होगा, तू समझता कुछ होगा।

हव, मेरे को भी लगता है। साला दिमाग खराब हो गया है काका…। सपने में भी लाल झंडा दिखता है।

तू भी कमनुनिस्ट हो गया है बे….

हा हा हा…..मेरे को भी लगाता है..

 

(22)

 

मिट्टी के आहते में बने छोटे से दरवाजे से भीतर घुसकर वे आंगन में आ गए। आंगन भी छोटा ही था। घर भी खास बड़ा नही। बहुत झुकी हुई छानियों वाला।

गोबर से लिपा हुआ, साफ सुथरा आंगन था। कुछ चटाईंयां बिछी हुई थीं। इनमें से कुछ पर लोग बैठे हुए थे, कुछ खाली थीं।

दोनों ने एक-एक चटाई ली और बैठ गए।

भीतर से एक लड़की चुपचाप आकर उनके सामने एक दोने में थोड़ा सा खड़ा नमक और थोड़ी मिर्च रख गई। जोसेफ रास्ते में ही उबले हुए अंडे बंधवाता आया था। पुड़िया खोलकर उन्होंने अंडे भी सामने रख लिए।

वही लड़की फिर आकर दो गिलास रख गई। उसके पीछे एक अधेड़ औरत एक लोटा रख गई। लोटे में महुआ था। महुए की कच्ची शराब।

जोसेफ ने लोटे के एक किनारे को पकड़कर पारी-पारी से दोनों गिलासों में शराब उड़ेल ली।

मैं हमेशा बोलता हूं, साइट में सेफ्टी बहुत जरूरी होता है।

हां, आज तो मरते मरते बचे। – गोविंद ने कहा।

एक्सीडेंट तो कभी भी हो सकता है, अपने को अपना सेफ्टी देखना है। कभी भी ऊपर चढ़ो तो पहले पकड़ ढूंढ लो.. – जोसेफ ने कहा।

गलती ठेकेदार का था।

वो तो है ही हरामी, लेबर मर जाएगा तब भी उसको क्या फरक पड़ेगा। यहां वहां पैसा खिलाकर बच जाएगा।

सेफ्टी बेल्ट तो देना चाहिए न।

सब देना चाहिए, सेफ्टी बेल्ट, सेफ्टी शू, गम बूट, हेलमेट, ग्लोब्स, रेनकोट…सब देना चाहिए…देता कौन है।

प्लांट में तो सबको मिलता है।

वो सरकारी है रे, अपन प्राइवेट वाला लेबर हैं।

काम तो उधर भी ओईच्च होता है।

उधर सरकारी कानून लागू है, इधर अंधा कानून….

प्लांट के बाजू में ही साइट है हमारा, सरकार को इधर नई दिखता क्या?

दिखता भी होएंगा तो क्या पता, कोई कम्पलेंट करेगा तब न होगा कार्रवाई….कम्पलेंट कौन करेगा..मैं तो करेगा नई….तू भी नई करेगा….फिर कौन ठेकेदार काम देंगा हमको….?

लाल झंडा यूनियन….

लाल झंडा- फाल झंडा, यूनियन-फ्यूनियन प्लांट वालों का है रे…हमारे इधर झांकता है क्या कोई…..

चल तू दारू उठा…..

(समाप्त)

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