केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग १)

सुल्तान सिंग…ये नाम सुनकर आपने उसके बारे जैसी कल्पना की होगी, वह उसके ठीक उलट था. न तो उसकी कोई सल्तनत थी, और न डाकुओं जैसा कोई इलाका. न ही पहलवानों जैसी काया.

पापड़ जैसा मुंह था उसका, लौकी जैसा शरीर. उस पर सफेद बनियान, जो पता नहीं कितनी पुरानी रही हो. पीली-सी और यहां-वहां फटी हुई भी. ढीला पाजामा. लटकता हुआ नाड़ा, पांव में पुराना स्लीपर, जिसकी एड़ी चांद हो चुकी थी. माथे पर किसी आवेदन-पत्र जैसी तीन-चार लकीरें और ओठों पर भवदीय जैसा भाव.

सुल्तान सिंग के परिवार में दो ही लोग थे। एक तो खुद सुल्तान सिंह, और दूसरा बंठू। बंठू एक कुत्ता था। सुल्तान सिंग की तरह बंठू को भी दुबराज का भात ही पसंद था। भोजन में सब्जी-दाल की जरूरत न तो सुल्तान सिंग ने कभी महसूस की और न ही बंठू ने। सुबह-शाम भात खाकर दोनों ही कभी नहीं ऊबे।

कभी लाल मिर्च के बुरादे में थोड़ा-सा नमक लेकर भात गटक लिया करते। तो कभी भात में नमक के साथ फल्ली तेल की कुछ बूंदें चूहाकर लपेट लेते। कभी गोंदली के साथ, तो कभी चिरपोटी चटनी के साथ। भात में तुरंत पानी डालकर उसे नमक के साथ भी खाया जा सकता है। स्वाद बढ़ाना हो तो रात में पानी डालकर उसे दूसरे दिन सुबह खाया जाता। अड़ोस-पड़ोस के घरों से तरह-तरह के आचार भी आ जाया करते, किसी के घर से नींबू का, तो किसी के घर से आम का। चूंकि सुल्तान सिंह जनसेवक थे, इसलिए पड़ोसियों को पता था कि उन्हें उनकी जरूरत कभी भी पड़ सकती है। मसलन- कभी जलाऊ लाना हो, राशन लाना हो, बच्चे को स्कूल छोड़ना हो….

प्रापर्टी के नाम पर सुल्तान सिंग के पास दो खास चीजें थीं। एक तो सिलाई मशीन और दूसरी साइकिल। चूंकि सुल्तान सिंग का कद छोटा था, इसलिए साइकिल भी छोटे कद की ही थी। छपरी हालांकि किराये की थी,, लेकिन न तो छपरी के मालिक ने कभी किराया मांगा, न सुल्तान सिंग को कभी देना याद आया। वह थी भी ऐसी, कि यदि सुल्तान सिंह छपरी छोड़ दे तो वह ढह ही जाए। उसी ने उसकी बल्लियों में चिंदिया बांध-बांधकर उसे थाम रखा था।

छपरी में दो तस्वीरें टंगी हुआ करती थीं। एक तो इतनी पुरानी और इतनी धुंधली थी कि सुल्तान सिंग के कहने पर ही सबने अंततः मान लिया था कि यह उसकी मां की तस्वीर है, जिसे मरे बरसों हो गए। कब मरी उसे भी ठीक से याद नहीं, छोटा था। दूसरी तस्वीर महात्मा गांधी की थी। महात्मा गांधी से उसका रिश्ता स्कूल के दिनों से शुरू हुआ था, जब मास्साब ने बताया था कि यही देश के पिता हैं। इऩ्होंने ही देश को आजादी दिलाई है। चूंकि सुल्तान सिंग के पास अपने पिता की तस्वीर नहीं थी, इसलिए देश के पिता की तस्वीर लगा ली थी।

यदि आपने फेब्रिकेशन और इरेक्शन का काम न देखा हो तो कभी किसी साइट पर घूम आइये। उधर ऐसे-ऐसे लोग मिलेंगे कि आप ओलंपिक के वेट-लिफ्टरों और जिम-खानों के बॉडी-बिल्डरों को भूल जाएंगे।

यूं तो इन लोगों से आपकी मुलाकात, मोहल्लों और बाजारों में भी हो जाती होगी, लेकिन आप उन्हें वहां पहचान नहीं पाएंगे।

आप पूछेंगे तो वे खुद को रिगर, खलासी या वेल्डर बताएंगे। जैसा कि जगतार सिंग और बलबीर सिंग बताया करते थे।

जगतार सिंग रिगर थे और बलबीर सिंग खलासी। इस तरह जगतार सिंग, बलबीर सिंग के ओस्ताज थे।

बलबीर सिंग के लिए जगतार सिंग साइट से लेकर खोली तक, सब जगह ओस्ताज थे। कितनी भी बारी बीम हो, गर्डर हो, प्लेट हो, एंगल हो, जगतार सिंग से आप कह बस दीजिए कि उसे उठाकर किस जगह फिट करवानी है, आपका काम हो जाएगा।

जगतार सिंग का यह मंत्र बलबीर सिंग ने गांठ बांध कर रख लिया था ओए बलबीरा, माल चुकान दे वास्ते दमाग चाहिदा होंदा है, ताकत-वाकत तै बाद दी चीज हैगी।

सैकड़ों किलो का गर्डर कंधे पर कैसे उठाना चाहिए, जमीन पर सरकी कैसे मारनी चाहिए, ट्रक में कैसे लोड करना चाहिए, कैसे उतारना चाहिए, इन सबके लिए दिमाग चाहिए।

लोहे की प्लेटें किसी ट्रक से यूं ही नहीं उतारी जा सकतीं। एक के ऊपर एक रखी भारी-भारी प्लेटें इस कदर चिपकी होती हैं कि वारी फंसाने के लिए जगह ही नहीं मिलती। वारी मतलब सब्बल समझ लीजिए। इन सब्बलों से गड्ढे नहीं खोदे जाते, माल सरकाया जाता है। माल माने बीम, गर्डर, प्लेट, एंगल।

चुक ले माल जवाना रे…हइ जोरा…हइशा…और थोड़ा…हइशा….थोड़ा बाकी…हाइशा…सोन चिरय्या….हइशा….मीठी बोली…..हइशा…..मिसरी घोली….हइशा….सूखी रोटी…..हइशा….अम्मा बोली…..हइशा…..खाले बेटा….हइशा….खाया नहीं क्या….हइशा….मां दी रोटी…..हइशा….मर्द दा बच्चा….हइशा…..लगा जोरा…..हइशा।

जगतार सिंग के नारे में ऐसे ललकार होती कि खलासियों की भुजाएं फड़कने लगती। भारी से भारी माल भी रूई जैसा नजर आने लगता।

बलबीर सिंग इन्हीं सब बातों का कायल था। जगतार सिंग के साथ-साथ उसके नारे भी उसे बहुत अच्छे लगते थे।

जगतार और बलबीर की खोली सुलतान सिंग की छपरी के सामने ही थी। तीनों में बस एक ही चीज कॉमन थी- सिंग। जगतार और बलबीर पंजाब के थे और सुल्तान सिंग शायद ओड़िशा का। शायद इसलिए कि उड़िया तो उसे आती ही नहीं थी। हिंदी के अलावा हल्बी-गोंडी खूब जानता था। वही बताता था कि वह ओडिशा का है, तो लोग मान लेते थे। और जगतार और बलबीर के भी पंजाबी होने की पहचान तब ही हो पाती थी, जब उनकी बोली हुई एक दो लाइनें कानों पर पहुंचती। दोनों ने कभी केश नहीं रखे। कंपनी के साथ पता नहीं कितने सालों से पूरा इंडिया घूम रहे थे। जहां कंपनी, वहीं डेरा।

तो इस तरह उस छपरी के नीचे एक सिलाई मशीन, एक साइकिल, कुछ चिंदियां, एक पंप वाला स्टोव, एक मिट्टी तेल का कनस्तर, नमक और लाल मिर्च की कुछ पुड़िया, एक देचगी, एक कड़ाही, एक साबुन बट्टी, एक गुड़ाखूू डिब्बी, एक तौलिया, एक पंछा, दो पाजामा, दो बनियान, और एक कुर्ता, सुल्तान सिंग और बंठू के साथ रहा करते थे। दुबराज चावल के लिए कोई डिब्बा कभी नहीं रहा। उसे रोज खरीदा जाता, डेढ़ पाव सुबह और डेढ़ पाव शाम के वक्त।

क्रमशः

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