क्यों प्रेम की शुरुआत पुरुष करते हैं और उसे निभाती महिलाएँ हैं?

डॉ. अबरार मुल्तानी कृत ‘क्यों प्रेम की शुरुआत पुरुष करते हैं और उसे निभाती महिलाएँ हैं? : स्त्री-पुरुष संबंधो को मधुर बनाने वाली पुस्तक’ का एक विहंगावलोकन।  

“खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार ।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार ।।”

पुस्तक की प्रेरणा पवित्र कुरआन की ये पंक्तियाँ हैं : ‘पति-पत्नी इक-दूजे के लिबास हैं (सु.-१, आ.-१८७)’। ये पंक्तियाँ पति-पत्नी के प्रेमल रिश्ते के अनिवार्य तत्व प्रगाढ़ता और विश्वास को रेखांकित करती हैं। प्रेम एक सहज मानवीय वृत्ति है। इसका विकास आत्मीयता का आश्रय पाकर होता है। यहाँ दुराव-छिपाव के लिए स्थान नहीं होता। प्रेम देने की भाषा है। प्रेम समर्पण का प्रयोजन है, फिर भी निष्प्रयोजन है। प्रेम में ‘मैं’ का कोई स्थान नहीं होता । प्रेम पर जितना भी कहा जाय, कम ही है: अतः अब पुस्तक की बात करते हैं।

पुस्तक 20 अध्यायों में विभक्त है। पुस्तक की प्रस्तावना वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने लिखी है जिसमें वे मनुष्य को ‘मनुष्य’ कहलाने के लिए एक प्रेमल हृदय का होना अनिवार्य मानते हैं। साथ ही विवाह को एक ‘गुरिल्ला युद्ध’ की संज्ञा देते हुए जयप्रकाशजी बताते हैं कि विवाह की रसायनशाला में दोनों व्यक्ति बदलते हैं और इस बदलाव को आत्मसात करने से ही रिश्ता सुदृढ़ होता है।

रोचक बात यह है कि पुस्तक के नाम से यह भ्रम होता है कि प्रेम का प्रारंभ (प्रणय-निवेदन) पुरुष करते हैं जबकि पुस्तक का प्रथम अध्याय ‘प्रेम की शुरुआत’ ही कई सर्वे का हवाला देते हुए स्थापित करता है कि 90% मामलों में पहल महिलाएँ करती हैं। यह प्रथम अध्याय बड़ा ही रोचक है और स्त्री-पुरुष में आकर्षण प्रक्रिया के पाँच चरणों की जानकारी देता है। साथ ही महिलाओं और पुरुषों की प्रमुख प्रणय-मुद्राओं/प्रणय संकेतों के बारे में भी यह पाठ विस्तृत जानकारी देता है। (वात्स्यायन के कामसूत्र की कुछ सामग्री से मैंने इसकी तुलना जान-बूझकर, बोझिल हो जाने के भय से नहीं की है। ?)

दूसरा अध्याय ‘प्रेम के रसायन’ महिलाओं/पुरुषों की उन शारीरिक/मानसिक विशेषताओं को उजागर करता है जो उन दोनों के पारस्परिक आकर्षण-विकर्षण का कारण होती हैं। यह पाठ बताता है कि जब पति-पत्नी अपने आत्मसम्मान और महत्व के लिए आपस में संघर्ष करते हैं तो विवाह स्वर्ग के स्थान पर युद्ध का नारकीय मैदान बन जाता है। यह अध्याय पति-पत्नी में प्रेम की अनिवार्यता पर जोर देते हुए महिलाओं की इस विशेषता को ख़ास तौर पर रेखांकित करता है : ‘महिलाएँ प्यार के खत्म होने की भी पहचान रखती है और यही कारण है कि रिश्तों को खत्म करने या उसे निभाने वाली अधिकतर महिलाएँ ही होती हैं।’

तीसरा अध्याय ‘पुरुष और महिलाएँ कितने अलग हैं’ महिला और पुरुषों में वैज्ञानिक अंतर को बताता है जबकि चौथा अध्याय इन अंतरों के कारणों की पड़ताल करता है। ‘महिलाओं और पुरुषों की वैचारिक भिन्नता’ नामक पंचम अध्याय में बताई गई भिन्नताओं का सार है : (i) महिलाएँ रिश्ते को प्राथमिकता देती हैं तो पुरुष रूतबे को (ii) पुरुष वस्तुओं के दीवाने होते हैं और महिलाएँ लोगों को पसंद करती हैं (iii) पुरुष प्रतिस्पर्धी होते हैं और महिलाएँ सहयोगी (iv) पुरुष बहादुर दिखना चाहते हैं और महिलाएँ असहाय (v) महिलाएँ सलाह लेती हैं और पुरुष नहीं (vi) पुरुष समस्या का समाधान करना चाहता है जबकि महिलाएँ हमदर्द खोजती हैं। दीगर बात है कि इस पाठ में बताई गई कुछ बातों से हम पुरुषों की असहमति होना भी अनिवार्य है।?

छठा अध्याय महिला/पुरुष हार्मोन पर केन्द्रित है । सातवाँ अध्याय ‘महिला और पुरुष के लिए सेक्स के मायने’ एक महत्वपूर्ण अध्याय है, पर मैं इसकी विशेष चर्चा से बचते हुए पाठकों को इसे स्वयं पढ़ने की सलाह दूँगा। यह पाठ विविध विन्दुओं को विश्लेषित करते हुए यह स्पष्ट करता है कि स्त्री-पुरुष की यौन प्राथमिकताएँ एक-दूसरे से अलग होती हैं और दोनों को एकाकार होने से पहले एक दूसरे की भावनाओं का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

सृष्टि की शुरुआत से ही नर और नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। दोनों का संयोग ही सृजन का आधार है । ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है नारी । नर और नारी के संबंधों को लेकर भारतीय समाज बहुत ही संवेदनशील रहा है । नर-नारी के मध्य उचित सम्बन्ध की सांस्कृतिक परम्परा हमारी धरोहर है । चतुराश्रम व्यवस्था में ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ आश्रम की शुरुआत होती थी जिसे विवाह की संज्ञा दी गयी । विवाह के टिकने का आधार प्रेम है। प्रेम का मूलाधार(पर एकमात्र नहीं) काम है। परिपूर्ण हृदय से काम की स्वीकृति, काम से विमुक्त कर देती है । प्रेम एकात्म का अनुभव है और तभी जाकर उस काम के, राम के अनुभव में रुपान्तरण की प्रकिया शुरू होने की संभावना भी बनती है । आदमी काम के प्रति विमुख और राम के प्रति सम्मुख हो जाता है ।

आठवें अध्याय ‘महिला और पुरुष के लिए सेक्स कितना महत्वपूर्ण है’ में स्थापित की गई कुछ मान्यताएं हैं :- (i) पुरुष के लिए सेक्स सब कुछ है लेकिन महिला के लिए सेक्स जीवन का एक हिस्सा भर (ii) पुरुष को सेक्स का लालच देकर कुछ भी करवाया जा सकता है लेकिन स्त्री को सेक्स का प्रलोभन देना ही मूर्खतापूर्ण कार्य है (iii) पुरुषों को महिलाओं की सुन्दरता मोह लेती है और महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति (iv) सेक्स की चाह पुरुष की आदिम प्रवृत्ति है जबकि सुरक्षा व घरोंदे का निर्माण करना महिला की आदिम प्रवृत्ति एवं (v) महिला के लिए उसका पति सब कुछ है और पुरुष के लिए पत्नी केवल एक सेक्स पार्टनर । हालाँकि एक पुरुष होने के कारण मैं चाहता हूँ कि मैं इन सारी स्थापनाओं को नकार दूँ। लेकिन देश में बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ/घरेलू हिंसा की घटनाएँ एवं कुछ अन्य प्रत्यक्ष घटनाएँ मुझे ऐसा करने से रोक देती हैं। अतः इन विंदुओं से सहमत या असहमत होने का मामला पुस्तक को समग्रता में पढ़ने वाले पाठक पर ही छोड़ा जाता है।

नवां अध्याय ‘महिला और पुरुष शादी के बाद भी अन्य साथी की तलाश क्यों करते हैं?’ अपने शीर्षक के अनुसार उक्त प्रश्न के उत्तरों की तलाश करता है और उचित परामर्श भी देने का प्रयास करता है। दसवां अध्याय ‘क्या महिला और पुरुष मित्र हो सकते हैं?’ स्थापित करता है कि महिला-पुरुष एक दूसरे के जुनून हो सकते हैं, प्रेम हो सकते हैं, शत्रु हो सकते हैं, आराध्य हो सकते हैं पर कभी भी एक दूसरे के मित्र नहीं हो सकते। पुरुष बिना सेक्स की चाह के किसी महिला को अपना दोस्त नहीं मान सकता, हाँ, महिला जरुर मान सकती है। हालाँकि इस स्थापना का आधार कुछ विद्वानों के कथन और कुछ प्रसिद्ध पाश्चात्य संस्थाओं के विविध रिसर्च हैं पर भारतीय परिदृश्य में अधिकांश लोग इस स्थापना को नहीं पचा पाएंगे।

भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण और प्रेम पर्यायवाची माने गए हैं। भगवान श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण विश्व में प्रेम का सार्वभौम संदेशवाहक माना जाता है । वे कहते हैं-‘कृष्ण प्राणाधिका देवी तदधीनो विभुर्यतः, रासेश्वरी तस्य नित्यं तय विना न तिष्ठति ।’ अर्थात् कृष्ण के प्राणों में राधा बसती है, जहाँ राधा है, वहीं मैं हूँ और राधा के बिना तो मेरी कल्पना ही नहीं की जा सकती । वासनात्मक प्रेम इस अखंड प्रेम के समक्ष तनिक भी नहीं टिकता ।धर्म की दुनिया में वासनात्मक प्रेम एक अयोग्यता है, पर पवित्र प्रेम उसकी बुनियाद है । अस्तु! विषयांतर से बचते हुए पुनः पुस्तक की ओर चलते हैं।

ग्यारहवां अध्याय ‘महिलाएँ क्यों ज्यादा बोलती हैं और पुरुष क्यों खामोश रहते हैं ?’ एक लोकप्रिय मुद्दे का रोचक परीक्षण-विश्लेषण करता है। बारहवां अध्याय रिश्तों को सुधारने और खुशहाल वैवाहिक जीवन का सूत्र देता है-‘पुरुष सुनना शुरू करें और महिलाएँ सुझाव देना छोड़ें।’ तेरहवां अध्याय महिलाओं को अपने पतियों का दिल जीतने के लिए 50 सरल उपाय सुझाता है जबकि चौदहवां अध्याय पुरुषों को पत्नियों का दिल जीतने के 50 सरल उपाय बताता है।

पंद्रहवां अध्याय ‘स्पर्श प्रेम की जान है’ सलाह देता है कि अपने जीवनसाथी को प्रतिदिन कम से कम 10 बार अवश्य छुएँ। सोलहवां अध्याय ‘पुरुष और महिला के लिए तोहफ़ा’ पति-पत्नी के बीच प्रेम को बरक़रार रखने हेतु उपहारों के आदान-प्रदान पर जोर देते हुए सूत्र निगमित करता है-‘पुरुष छोटे-छोटे अनेक तोहफे पत्नी को दें और पत्नी बड़ा और काम आने वाला तोहफा पुरुष को दे।’ साथ ही यह एक उपसूत्र भी देता है-‘आप बगैर प्रेम के कुछ दे सकते हैं, लेकिन आप बगैर कुछ दिए प्रेम नहीं कर सकते।’

सत्रहवां अध्याय पति-पत्नी को वजह-बेवजह बहस से बचने की सलाह देते हुए अंतिम नियम स्थापित करता है-‘विवाह या प्रेम की सफलता सही साथी तलाश करने से नहीं होती, बल्कि सही साथी बन जाने से होती है।’ अठारहवां और उन्नीसवां अध्याय पुरुषों और महिलाओं द्वारा किये जाने वाले सामान्य गलतियों पर प्रकाश डालता है।

बीसवां और अंतिम अध्याय पति-पत्नी के बीच प्रेम कायम रखने के चार उपाय बताता है-(i) एक-दूसरे की सराहना करें (ii) एक-दूसरे को तोहफे देते रहें (iii) अपने जीवनसाथी को समय दें एवं (iv) अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान करते रहें अर्थात् आपस में बातचीत करते रहें—संवादहीनता न आए।

पुस्तक ऐसे विषय पर है जिसे न कोई लेखक जल्दी छूता है और न ही कोई समीक्षक ऐसी किताब की समीक्षा करना चाहता है। कारण वह एक प्रसिद्ध गीत है: परदे में रहने दो, परदा न उठाओ….?। इस कारण इस पाठक ने ही, जैसा भी बन पड़ा, इस पुस्तक को पढ़कर अपने विचारों की अभिव्यक्ति कर डाली है। पुस्तक की भाषा पाठक-फ्रेंडली है, दुरूहता से मुक्त है।

डॉक्टर अबरार मुल्तानी एक ख्यात आयुर्वेद विशेषज्ञ होने के साथ एक कुशल जिंदादिल लेखक भी हैं जिनकी अब तक दर्जनभर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। समीक्षित पुस्तक में लेखक ने दाम्पत्य जीवन को मधुर और शांतिपूर्ण बनाए रखने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, समस्याओं के विश्लेषण के साथ उनके उचित समाधान भी सुझाए हैं। हालाँकि पुस्तक कुछ ऐसी मान्यताएँ भी स्थापित करती हैं जो पुरुषवादी मानसिकता पर चोट करती हैं और कोई भी समाज अचानक से एक नंगे सच को तुरंत स्वीकार भी नहीं कर सकता। दरअसल हममें से हर एक आदमी इस बंधे-बंधाए बंद दायरे की जिरह में शामिल है भले ही कुछ लोग इसमें खुद के शामिल होने से इनकार कर दें। यह किताब स्त्री-पुरुष संबंधों को मधुर बनाने का अनूठा व्यावहारिक दस्तावेज है।

पुस्तक परिचय :

पुस्तक : ‘क्यों प्रेम की शुरुआत पुरुष करते हैं और उसे निभाती महिलाएँ हैं?
लेखक : डॉक्टर अबरार मुल्तानी
प्रकाशक : मौसम बुक्स, भोपाल
अंकित मूल्य : रु. 175 मात्र

©अविनाश अमेय

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