गज़लों में : एक गजल: दिलीप कुमार दर्श

लगा महफिल अब गुल न खिलाओ गज़लों में ।

आज सड़कों से भी आंखें मिलाओ गज़लों में ।

 

अभी भी पीने का पानी नहीं मयस्सर जिनको

उन्हें भी आह भर  पानी  पिलाओ गज़लों में ।

 

पेड़ है रोटियों का , छांह में  वे  हैं  भूखे  बैठे

इसकी डालों को भी कोई हिलाओ गज़लों में ।

 

कुछ भी  बेचो  तो  बिकता  है वो  बाज़ारों में

बेचना खुद को है तो आंसू मिलाओ गज़लों में ।

 

ख्वाब को ओढ़के तो  वे सो रहे हैं  सदियों  से

भूख गर सोती नहीं तो मत सुलाओ गज़लों में ।

 

तेरे  कंधे पे  टिके हैं  बेबसी के  हजारों  कंधे

वाह सुनकर भी ये कंधे न भुलाओ गज़लों में ।

 

वही चादर बनानी  है  गर नये  धागों से  फिर

इक रफूगर नया भी हो तो बुलाओ गज़लों में ।

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