डार्क नाइट की समीक्षा

इस साल एक बार फिर से उपन्यास पढ़ने की ख़्वाहिश हुई। वैसे तो मैं ख़ुद एक कहानीकार हूँ और कहानियाँ पढ़ना ही ज़्यादा पसंद है। फिलहाल एक हज़ार शब्दों के अंदर भी कहानियाँ लिखी जा रही है। लेकिन ऐसी कहानियों में अभी भी अपने आपको बाँध नहीं पाता हूँ। मेरी कहानियाँ दो हज़ार से ऊपर शब्दों में होती हैं। खैर साहित्य की विधा को हम शब्दों में क़ैद नहीं कर सकते हैं। भगवंत अनमोल जी के उपन्यास ज़िंदगी 50-50 पढ़ने के बाद संदीप नय्यर जी के उपन्यास समरसिद्धा और डार्क नाइट पढ़ने की इच्छा हुई। इन दोनों उपन्यास के बारे में ऑनलाइन बहुत कुछ सुन चुका था। मैंने सबसे पहले डार्क नाइट पढ़ना शुरू किया। दो छोटे बच्चों और पत्नी से बड़ी मुश्किल से वक़्त निकालकर कभी टॉयलेट में तो कभी जब बच्चे कुछ देर के लिए सो रहे थे तो मैंने एक सप्ताह के अंदर यह उपन्यास पढ़ लिया। ज़िंदगी 50-50 की तरह ही इस उपन्यास के प्लाट ने मुझे अपनी रचना-शैली में ढाल लिया।

यह उपन्यास पाठक को एक चैप्टर के बाद ही बाँधना शुरू कर देता है। शुरू में एक चैप्टर पढ़ते ही मुझे महान फ़्रेंच कहानीकार और उपन्यासकार मौपासा की याद आ गयी। क्योंकि इस उपन्यास में संदीप नय्यर जी ने बड़ी ही चालाकी से प्लाट (कथानक) और सब-प्लाट को धागे की तरह एक डंडे में लपेटने का काम किया है। उपन्यास ज़िंदगी की एक आम छोटी सी दिनचर्या से शुरू होती है। योगा प्रशिक्षक, मिस्टर काम इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मीरा को उपन्यास की पूरी कहानी सुनाता है। प्लाट में सब-प्लाट को बड़ी ही चतुराई से जोड़ा गया है। आप आख़िर में ही इस सब-प्लाट और प्लाट का कारनामा समझ सकेंगे। ग्यारहवें चैप्टर में पहुँचते ही प्लाट पाठक को पूरी तरह से अपने क़ाबू में कर लेता है और आख़िर में पाठक को सोचने पर मज़बूर कर देता है। इस उपन्यास का हीरो कबीर गुजरात के वड़ोदरा शहर से लंदन पहुँचता है। पंद्रह बरस की उम्र बड़ी ही चंचल होती है। ज़िंदगी की सबसे नाज़ुक अवस्था होती है। सही से मार्गदर्शन नहीं हो तो ज़िंदगी किसी भी दिशा में मुड़ सकती है। यही कबीर के साथ भी हुआ। वड़ोदरा के छोटे स्कूल से लंदन पहुँचते ही उसकी ज़िंदगी में सबसे अहम तब्दीली आयी। लंदन की स्कूल में उसकी ज़िंदगी धागों की उलझन में आहिस्ता-आहिस्ता उलझती चली गयी। अब उसकी ज़िंदगी कई हसीनाओं से होकर गुज़रती है और ज़िंदगी और भी जटिल होती जाती है। कबीर के ज़ेहन और भी ज़्यादा बोझिल होता चला जाता है। उसकी ज़िंदगी धागे की उलझन में और ज़्यादा उलझती चली जाती है। हिकम, टीना, नेहा, प्रिया, माया जैसे इन लड़कियों से होकर गुज़रते हुए कबीर की ज़िंदगी दुविधाओं, उलझनों, निराशाओं से लबरेज़ हो जाती है। ज़िंदगी अंधकारमय हो जाती है। ये सारी हसीनाएँ किरदार के रूप में कबीर से जुड़ती जाती हैं और एक झटके से उसकी ज़िंदगी से निकल भी जाती हैं। इससे कबीर को मायूसी, निराशा और अवसाद के अलावा कुछ भी नहीं मिलता है। अगर कबीर ने शुरू में ही डार्क नाइट जैसे उपन्यास पढ़ा होता तो उसकी ज़िंदगी अवसादग्रसित नहीं हुई होती। इतना तो मेरा वादा है।

इस उपन्यास में कई नयी बातें भी हैं। उपन्यासकार ने लड़की के परिधानों और लिबासों के बारे में बड़े ही रोचक तरीक़े से वर्णन किया है। हर किरदार का चरित्र-चित्रण भी अपने-आप में अनोखे हैं। उपन्यास किसी भी वर्ग के पाठकों को किसी भी तरीक़े से निराश नहीं करता है। पचास हज़ार अल्फ़ाज़ में लिखा गया यह उपन्यास किसी भी तरीक़े से पकाऊ और बोरिंग नहीं है। हर चैप्टर अपने आप में एक कहानी है और पाठकों की ताज़गी और जोश को हमेशा बरक़रार रखता है। इसके अलावा, कामवासना (eroticism) की बेहद अहम मिसाल इस उपन्यास में देखने को मिलती है। उपन्यास के नायक हर नये जुदागाना पोज़ में हसीनाओं के साथ इश्क़ का इज़हार करता है। यह पक्ष मुझे बहुत अच्छा लगा। इस उपन्यास पर बहुत अच्छा फ़िल्म भी बन सकता है। उपन्यास का प्लाट आख़िरी पेज तक रोमांस और सस्पेंस बरक़रार रखता है। यह भी इस उपन्यास की सबसे बड़ी कामयाबी है। नायक और नायिका डार्क नाइट या फिर अवसाद में फंसने के बाद भी डार्क नाइट में ही डिप्रेशन का समाधान भी निकालते हैं और डार्क नाइट से बाहर निकल जाते हैं। अंत में कबीर प्रिया और माया के प्यार में फंसकर भी बहुत दोबारा दुविधा में फंस जाता है। प्रिया की ज़िंदगी से निकलकर माया से प्यार करता है और फिर ज़िंदगी में ऐसी भी मोड़ आती है, जब फिर से प्रिया की ज़िंदगी में वापस लौट जाता है। फिर भी कबीर को पूरी ज़िंदगी इस बात का मलाल रहेगा कि उसने नेहा की जान नहीं बचा सकी। मेरे हिसाब से अगर कबीर के हाथों में पहले डार्क नाइट जैसे उपन्यास आ गया होता तो नेहा की जान भी बच जाती और वह ख़ुदकुशी नहीं करती और कबीर को भी ज़िंदगी की इतनी बड़ी दुश्वारी का सामना नहीं करना पड़ता। आख़िर में कबीर ने महसूस किया है कि उसे पहले की गलती से सीख लेना चाहिए था। उपन्यास एरोटिक होने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं और मनोरंजन से भी भरा हुआ है। हमारे समाज में ऐसी उपन्यास की सख्त ज़रूरत है। यह उपन्यास पाठकों को किताब के प्रति भी दिलचस्पी बढ़ाता है।

उपन्यास को आख़िर तक पढ़कर पता चलता है कि उपन्यासकार इतने सालों तक अपनी मातृभूमि से दूर रहकर भी अपनी भाषा से दूर नहीं हो सके। भाषा-शैली भी बेहद लचीली और नमी से भरी हुई है। बीच-बीच में अंग्रेज़ी वाक्यों को देवनागरी में लिखकर भी उपन्यास को भारत और इंग्लैंड की फ़िज़ा और आबोहवा में बाँधने की कोशिश की गयी है। बताने को बहुत कुछ है, अगर सबकुछ यहाँ बता दूँ तो आपको आगे उपन्यास पढ़ने की इच्छा नहीं होगी। इक्कीसवीं सदी में हिंदी में डार्क नाइट एक उत्कृष्ट उपन्यास है। अगर आपको समय मिले तो डार्क नाइट ज़रूर पढ़ें।

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