ताम्रपत्र से किंडल तक

हालिया एक प्रश्न पढ़ा कि अठारहवीं सदी के पूर्व की लिखी किताबें भारत में मूल रूप में नहीं मिलती। इसलिए विश्वसनीयता पर संदेह होता है। पहले ताम्र-पत्र, शिलाओं पर ही लेखन होता था। जब काग़ज और मुद्रण आया, तो छपने लगी। अब वो चाहे वेद व्यास हों या बाणभट्ट, मूल लिखी कॉपी आपको नहीं मिल पाई, तो इसमें उनका दोष नहीं। अधिकतर पुस्तकों का अनुवाद और अनुवाद से पुनर्लेखन हुआ। मुगल काल में भी, और अंग्रेजों के काल में भी। राजतरंगिणी पहले संस्कृत से फ़ारसी, फिर फ़ेंच, फिर अंग्रेज़ी, फिर मराठी, और अंत में अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी में लिखी गयी।

यह एक परिवर्तन है। यह मैं नहीं कह रहा कि काग़ज खत्म होंगे। पर कलम से लिखना यूँ भी कम हो रहा है। ताम्रपत्र, भोज-पत्र और शिलाएँ तो कब की गयी। अब शिला है एक स्क्रीन। उस पर लिखा-मिटाया जाता है। और उस प्रति को प्रिंटर से निकाल कर छापा जाता है।

इतिहास से अब तक सबसे सुरक्षित संवाद बस मूल प्रति ही है। अनुवाद या पुनर्लेखन मूल नहीं। हालिया हिंदी की एक मशहूर पुस्तक से एक महत्वपूर्ण चिट्ठी गलती से नहीं छपी। लेखक अब रहे नहीं। एक लेखक के पुत्र अपने पिता की किताब के लिए ही प्रकाशक के चक्कर काट रहे हैं। बिकनी बंद हुई, प्रकाशक ने रद्दी में दे दी, जला दी, पता नहीं। यह जरूरी है कि जो बात लिखी जाए, वो उसी रूप में सुरक्षित रहे।

यह संभवत: ‘डिज़िटल सुरक्षा’ से मुमकिन हो। आपने लिखा, और ऐसा लॉक कर मर गए कि अब बस उसे कोई हू-ब-हू ही निकाल पाए। किंडल किताबों का pdf निकालना मुमकिन नहीं, पर कोई चाहे तो शब्दश: कॉपी कर सकता है। और बदल सकता है। पर वह लेखक भी महान् ही होगा, जिसकी किताब चुराई और बदली जाए।

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