लघु कथा – बेटियों वाले बाप

‘‘पुलिस वाले ने नजर का इशारा किया तो वर्मा जी उसके पीछे-पीछे हो लिये। दोनों थाने के पीछे आ गये। थाने के पीछे तालाब था। दोनों पेशाब करने की पोजीशन बनाकर थाने की तरफ पीठ करके बातें करने लगे। पुलिस वाले ने पूछा ‘‘तो तुम कहते हो कि वो लड़की तुम्हारी नहीं है’’? वर्मा जी ने ढिठाई से जवाब दिया ‘‘हाँ साहब, शक्ल तो मेरी बेटी जैसी ही है, पर वो लड़की मेरी बेटी नहीं है’’। पुलिस वाला डपटते हुये बोला ‘‘मैं अंधा हूँ क्या, मैंने खुद कम्प्यूटर पर चेक किया है। वो तुम्हारी बेटी ही है। कद-काठी, रंग-रूप सबका मिलान कर लिया है मैंने’’। वर्मा जी की आवाज का आत्मविश्वास जाता रहा। वे मरियल स्वर में बोले ‘‘सर, लड़की कसम खाकर कहती है कि वो मैं नहीं हूँ। मैं लड़की का बाप हूँ, ये सब भला कैसे देखता? क्या कहूँ साहब मैंने तो देखी नहीं है सीडी’’। ‘‘मगर मैने देखी है सीडी और कायदे से चेक भी कर ली है, वो तुम्हारी ही लड़की है’’ पुलिसवाला निष्ठुर स्वर में बोला। वर्मा जी बुरी तरह लज्जित हो गये। पुलिसवाले ने बात को संभालते हुये कहा ‘‘ये सब देखना, चेक करना मेरे काम का हिस्सा है। कल अगर सीडी मार्केट में आ गयी तो’’? दोनों के बीच कुछ देर तक सन्नाटा रहा फिर अचानक वर्मा जी मुडे़ और पुलिसवाले के पैरों पर गिर पडे़। वे भरभरा कर रो पडे़ और कातर स्वर में विलाप करते हुए बोले ‘‘साहब वो ब्लू सीडी अगर मार्केट में आ गयी तो हमारी सात पुश्तें तक किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहंेगे। साहब रहम कीजिये, मेरी लड़की से गलती हो गयी। मैं उस लड़की का अभागा बाप हूँ। बाकी का परिवार भी है, उनका क्या दोष…………?
पुलिसवाला अपने पैर छुड़ाकर छिटककर दूर खड़ा हो गया। कुछ देर की निशब्द खामोशी के बाद उसने वो ब्लू फिल्म की सीडी अपने पैंट की जेब से निकालकर तालाब के पानी में फेंक दी। वर्मा जी अवाक और निरूŸार थे। वापस लौटते समय पुलिसवाले ने वर्मा जी से कहा ‘‘वो सीडी अंतिम और असली थी। आखिर मैं भी एक बेटी का बाप हूँ। वर्मा जी ठिठककर खडे़ हो गये और पुलिसवाले को थाने में जाता हुआ देखते रहे।

लेखक – दिलीप कुमार

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