केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग २)

न तो कभी जगतार अकेले दिखा, न बलबीर। जब भी दिखे साथ दिखे। साथ-साथ साइट जाते। साथ-साथ लौटते। यहां तक कि साथ-साथ दिशा मैदान भी हो आते।

जगतार सिंह थे तो रिगर लेकिन थोड़े दुबले थे। उम्र 55 को पार कर गई थी। बलबीर सिंग 35-40 साल का हट्टा-कट्टा जवान। चौड़ा और कसा हुआ चेहरा। उस पर तनी हुई मूंछें। साइट के बाद, खोली ही उनकी दुनिया थी। किसी ने बात कर ली, तो कर लिया। नहीं तो सत्श्री अकाल।

रोज सुबह बलबीर ही उठकर पानी-वानी भरता। रोटी-शोटी पा देता। चार-छ रोटियों का नाश्ता हो जाता। बारह-सोलह रोटियां टिफिन में समा जाती। दोपहर के लिए।

साइट से लौटते हुए अक्सर शाम हो जाया करती थी। लौटते समय एक ही चिंता रहती थी- भट्ठी कहीं बंद न हो जाए। भट्ठी से अद्धी लाने की जिम्मेदारी भी बलबीर सिंग ने संभाल रखी थी।

रात की रोटी-सोटी पा कर, बलबीर सिंग अपने ओस्ताज की मंजी पर रख देता। मंजी की दोनों पाटियों के बीच एक चौड़ी पटनी रख दी जाती, जैसा कि ढाबों में रखी जाती है। कभी कुछ अच्छा खाने को दिल ने चाहा तो सब्जी होटल से भी आ जाती। स्टील के बड़े जग में पानी और कांच के दो गिलास।

अद्धी का ढक्कन ढीला करने का सम्मान बलबीर सिंग ने ओस्ताज जी को दे रखा था। वे ही बोतल के पेंदे को हथेली से थपथपा कर, ढक्कन ढीली करते। कभी बियर-शियर आ गई, तो उसके ढक्कन ढीले करने की जिम्मेदारी बलबीर पर आ जाती। बलबीर के दांत जगतार के दांतों से मजबूत जो थे। हालांकि उनके हाथों में लोहे के कड़े भी थे, लेकिन ये तो गुरू का प्रसाद थे। इनका इस्तेमाल दारू-शारू में कभी किया नहीं।

टप्प से ढक्कन खुलाता और कांच की गिलास में रंग उतर आता। पानी मिलाने का काम बलबीर का था।

जब सब कुछ तैयार हो जाता, तब जगतार सिंग अपने साइट की ओर मुंह करके गिलास से थोड़ी सी दारू जमीन पर गिरा देते।

यह क्रेनों को, वेल्डिंग मशीनों को, रस्सियों को, सब्बलों को और साइट के तमाम लोहे लक्कड़ों को उनका अर्पण होता।

बलबीर भी उसी दिशा में हाथ जोड़कर मन ही मन धन्यवाद देता कि जैसे आज साइट से सुरक्षित लौट आए हैं, वैसे ही कल भी लौटें।

 

सुबह-सुबह का वक्त था जब कॉमरेड चिरंतन मुखर्जी ने सुल्तान सिंग से आकर कहा- शाम को मिटिंग है, आ जाना।

सुल्तान सिंग को बड़ा अच्छा लगा। बड़े दिनों बाद उसने खुद को सम्मानित महसूस किया।

काहे की मिटिंग है दादा ? – सुल्तान सिंग ने पूछा।

कॉमरेड ने अपनी कमीज के जेब से चारमिनार का पीला पैकेट निकाला ये जो तेरा छपरी है न, इसको उजाड़ने वाला है वो लोग।

कपड़े काटती हुई सुलतान सिंग की कैंची वहीं पर ठहर गई। वह उठकर कॉमरेड के करीब आ खड़ा हुआ ?

क कककक कौन दादा ? – वो डर से नहीं हकाला रहा था। हकलाकर ही बोलता था।

कॉमरेड ने चारमिनार के पैकेट को खोलकर, सिगरेटों वाली कागज की ट्रॉली को पीछे से धक्का दिया। सफेद-सफेद सिगरेटों की कतार झांकने लगी।

कॉमरेड ने उनमें से एक को चुनकर बाहर खींचा और ओठ में फंसा लिया।

गौरमेंट उजाड़ेगा रे, इधर गार्डन बनेगा।उन्होंने सिंगरेट के मुंह पर लाइटर टिकटिकाते हुए कहा- पूरा बस्ती को उजाड़ेगा बोलता है।

तब इत्ते सारे लोग कहां जाएंगे दादा ? – सुलतान सिंग ने कहा।

वोइच्च तो। इसीलिए मिटिंग में आना है। – दादा ने सुलगती हुई सिगरेट अपनी उंगलियों के बीच फंसा ली। फिर मुट्ठी बंद कर, मुट्ठी का सुराख मुंह से लगाकर धुंआ भीतर की ओर खींचा। सिगरेट दहक उठी।

और किसको बुलाए हैं दादा ? – सुलतान सिंग ने पूछा।

शब को बुलाया है। बस्ती उजड़ने नई देगा। – दादा ने सिगरेट वाली मुट्ठी के सुराख में अपने दूसरे हाथ की हथेली थप्प से ठोकते हुए कहा।

सिगरेट की राख जमीन पर गिर गई।

 

– हुण साणू हौर कोई जगा वेखनी पाउगीबलबीर सिंग ने दारू में पानी मिलाते हुए कहा।

क्यों ? – जगतार सिंग ने पूछा।

कै रिया सी इ खोली नूं वी उजाड़ देवांगे- बलबीर सिंग ने कहा।

कौण कै रिया सी ? कौण उजाड़ देवेगा ? – जगतार सिंग ने पूछा।

गोबर मेंट। बलबीर सिंग ने कहा।

हंय, गोबर मेंट ? ये की होंदा ए ?

सरकार प्राजी, सरकार……

तो ओन्ना नू गोबर मेंट क्यों केंदेने?

मैणु की पता ओस्ताज जी, तुस्सी दस्सो….

ओ तू दारू चक वै….साड्डे नू की करणा है…गोबर मेंट जाणे….खोली दा मालिक जाणे…

खटखट खटखट

जा देख वै, कौण मरण वास्ते आया है। जा कुंडी खोल…..

लाल सलाम सरदार जी…- कॉमरेड मुखर्जी ने खोली में घुसते हुए कहा। पीछे-पीछे सुल्तान सिंग भी था।

आओ पाईजी आओ…बैठो- जगतार सिंग ने आवभगत में कहा।

बलबीर ने दारू से भरी दोनों गिलास मंजी के नीचे रख दी। रोटी-शोटी की थाली भी नीचे रखकर ढंक दी। पटनी भी हटा दी। जगतार सिंग ने मंजी में मुखर्जी दादा को भी बैठने की जगा दे दी।

अब मंजी उत्ते मुखर्जी दादा और जगतार सिंग। थल्ले बलबीर सिंग, उकड़ूं। और सिरहाने पर खड़ा सुलतान सिंग।

दारू पियोगे प्राजी ?- जगतार सिंग ने पूछा।

नई-नई, दारू-शारू नई पियेगा। एक जरूरी काम से आया है। – मुखर्जी दादा ने कहा।

दस्सो प्राजी। जगतार सिंग ने हाथ जोड़कर कहा।

कल मिटिंग में आना है आप दोनों को मुखर्जी दादा ने कहा।

कौण सी मिटिंग में जी, कहां होगी मिटिंग बलबीर ने पूछा।

ये सुल्तान आपको सब बता देगा। अभी बहुत लोगों के पास जाना है मुझे। मैं चलता हूं, नोमस्कार। – मुखर्जी दादा भांप चुके थे कि गलत टाइम पर आ गए हैं। यहां से जल्दी निकल जाना ही ठीक होगा।

क्रमशः

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