मिसेज़ सिंह का स्मार्टफोन

मिसेज सिंह आजकल रौनक-ए-बज़्म हैं,उनके चेहरे का नूर गज़ब का है/ उनकी बढ़ती उम्र मानो थम सी गई है/ लोगबाग उनकी बढ़ती उम्र और चढ़ते जादू का सीक्रेट पूछते हैं तो वो मुस्कराकर रह जाती है/ उनके वय की महिलाएं जहां बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी हांफ रही हैं वे सब शुगर और बीपी जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं वहीं मिसेज सिंह अपनी बहू की साड़ियां पहनकर उल्टे पल्ले का फैशन किये घूमती हैं/ बहू की सारी साड़ियों का उद्घाटन मिसेज सिंह ही करती हैं / मोटापा काबू में नहीं है इसलिये मिसेज सिंह बहू का सलवार सूट नहीं पहन पाती इसका उनको बहुत मलाल रहता है / बहू के फैशनेबुल कपड़े वो पहन सकें इसलिए वो नींबू पानी और ग्रीन टी पीती हैं ,उन्होंने अन्न खाना लगभग छोड़ दिया है/ अपने घर में उपवास और पार्टियों में वो सिर्फ फ्रूट जूस पीती हैं/ अब वो सिर्फ उबला हुआ खाना ही खाती हैं ताकि वो अपनी बहू के सभी सलवार सूट और बाकी नए फैशन के कपड़े पहन सकेवैसे मोटापे से मुक्ति के लिये गई अपनी कसम को वो अन्न दोष और अन्न विकार से जोड़कर लोगों को बताती हैं ये और बात है कि टी पार्टी में उनके फ्रूट जूस देने में लोगों को काफी दिक्कत होती है/ अब वो चूल्हा चौका ,गृहस्थी की नही बल्कि धर्म,अध्यात्म और साहित्य की बातें करती हैंराजनीतिक विचारधारा से वो परहेज रखती हैं क्योंकि उनको सबको लेकर चलना है ,धंधा बनाये रखना है तो सबको जोड़े रखना हैये परिवर्तन उनके जीवन में कुछ बरस पहले ही आया थाइधर मोदी जी देश बदलने निकले उधर माणिकलाल की बीवी ने अपनी और उनकी दुनिया बदल कर रख दीये चमत्कार यूँ हुआ कि मोहल्ले की पोलिंग एजेंट और चुनाव में वोट की गणित के बीच एक दिन माणिक लाल की बीवी का बटन वाला मोबाइल फ़ोन कहीं खो गया,चुनाव प्रभावित ना हो इसलिए नेताजी ने अपना पुराना मोबाइल फ़ोन उनको दे दिया,और नेताजी चुनाव जीत गए सो उन्होंने अपना स्मार्टफोन वापस भी नहीं मांगाबस इसी स्मार्टफोन से माणिकलाल की बीवी को पंख लग गएउसके पहले वो मोहल्ले की औरतों के बीच बैठकर चूल्हा,चौका,बहू की चुगली,भजनकीर्तनसिलाईकढ़ाई औऱ उन के फंदे पर चर्चा किया करती थींतब वो माणिकलाल की बीवी के तौर पर जानी जाती थीजो कट पीस के कपड़े बेचा करती थी और ब्लाउजपेटीकोट सिलने के आर्डर लिया करती थींउन्ही दिनों एक रिटायर अधिकारी से उनका परिचय हुआ जो रिटायरमेंट के बाद जीवन बीमा की पालिसी बेचा करते थेउस धंधे में प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो उन्होंने साहित्य बेचना शुरू कर दिया/उन्होंने खाये अघाये लोगो को फांसा और साझे संकलन में रचना प्रकाशन का झांसा दिया/ गंदा था,मंदा था मगर बहुत दिलफरेब धंधा थासबसे पहले रचना लो फिर उन्ही से शुल्क लो ,उन्ही के खर्चे पर छपवाओ फिर उन्हे के खर्चे पर लोकार्पण करके उन्हें साहित्य भूषण ,साहित्य रत्न जैसी कोई छुटभैया टाइप की उपाधि दे दोउपाधि पाया हुआ लेखक/लेखिका अपने यशोगान हेतु अधिक प्रतियां खरीदता है और फिर अमरत्व प्राप्ति की चाह में उनको चारों ओर बांट देता हैअधिकारी महोदय पुरुष थे इसलिए उनकी पहुंच और पैठ घरों में नहीं हो पा रही थी सो उन्हें एक महिला साझीदार की तलाश थी इत्तेफ़ाक़ से उन्हें माणिकलाल की बीवी मिल गयी/वो भी व्यापार कर रही थीं कट पीस के कपड़ों का जो रेडीमेड की वजह से ठंडा पड़ता जा रहा थासो उन्होंने साहित्य का व्यापार अपनाया और वो चल निकलादेखते ही देखते माणिकलाल की बीवी मिसेज सिंह हो गई और माणिकलाल एम:लाल हो गए।पिलपिलाये से माणिकलाल को उनकी बीवी पहले ऐ जीओ जी कहती थी अब वो उनको हनी और हबी कहकर बुलाती हैं। अधिकारी महोदय को मिसेज सिंह को साहित्य का धंधा सिखाना बहुत महंगा पड़ा।वो उन्ही से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्ही के लिए भस्मासुर बन गयीं।उनके सारे क्लाइंट उन्होंने काट लिए।फिर शिव दक्ष संवाद की भांति उनका और अधिकारी महोदय का वो झगड़ा हुआ कि फेसबुक बिल्कुल सती के अग्नि कुंड की तरह जल उठा। मिसेज सिंह ने ना सिर्फ खूब महिला क्लाइंट बनाये बल्कि अपने साथ पुरुष अनुयायियों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी। महिलाओं का बहनापा और पुरुषों की आसक्ति मिसेज सिंह के धंधे के लिए बहुत काम आयी।मगर जाते जाते अधिकारी महोदय ये पोल खोल गए फेसबुक पर की मिसेज सिंह दरअसल मिसेज सिंह नहीं किसी और जाति की हैँ। मिसेज सिंह उनका नाम नहीं बल्कि धारण की गई उपाधि है । सिंह भी बड़ा दिलचस्प सरनेम है ,हिन्दुओ की तमाम जातियों के लोग अपनी सुविधानुसार इस टाइटल का प्रयोग करते हैं। कभी ठाकुरों के एकाधिकार वाला ये सरनेम अब सर्वसुलभ है ।शायद गुरुदेव को भी अंदाजा लग गया था तभी वो ठाकुर लिखते थे खुद को वरना अगर सिंह लिखते तो लोग नोबल कमेटी आरटीआई डाल कर पूछते कि गुरुदेव की जाति क्या है क्योंकि भारत में जाति कभी नहीं जाती। सिंह सरनेम की माया इतनी है कि साहित्य के एक और मठाधीश एक बार मिसेज सिंह से मिल गए ।अपनी जाति का समझ कर उन्होंने मिसेज सिंह को खूब प्रमोट किया मगर उन्हें जब मिसेज सिंह की असली जाति पता लगी तो वो कन्नी काट कर निकल गए। उनको उनकी जाति की एक असली मिसेज सिंह मिल गयी अब वो उनको प्रमोट कर रहे हैं। मिसेज सिंह साहित्य की इस जातिवादी राजनीति से बहुत आहत हुईं  और फिर फेसबुक पर कई दिनों तक करुण विलाप किया जिससे लोग भी बहुत दुखी हुए। उन्ही दिनों मिसेज सिंह ने अपनी जाति के लोगों को एक साहित्यिक गैंग खड़ा किया जिसमें साहित्यिक मुखबिर से लेकर साहित्यिक शार्पशूटर तक हैँ। मिसेज सिंह की गैंग स्क्रीन शॉट लेने में माहिर है और फिर फेसबुक पर उसके सदुपयोग में उनको महारत हासिल है । मिसेज सिंह को लोग स्क्रीनशॉट क्वीन की उपाधि से भी लोग विभूषित करते हैँ। मिसेज सिंह अपने पति को अब कुछ खास भाव नही देती।वैसे भी तेल मिल के मुनीम और बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े माणिकलाल अपनी बीवी की व्यस्तता से खासे हलकान रहते हैं।तेल मिल की मुनीमी करके जब वो घर लौटते हैं तब मिसेज सिंह बजाय उनकी सेवाटहल के विश्वशांति के जटिल मुददों पर फेसबुक पर कट पेस्ट वाली पोस्ट डाल रही होती हैं।रातबिरात जब मुनीमजी दर्द से कराहतेकलपते रहते हैं तब मिसेज सिंह मेसेंजर पर अपने प्रशंसकों के प्रश्नों का जवाब दे रही होती हैं।रात भर फ़ोन चलता है तो सुबह काफी देर से सोकर उठती हैं मिसेज सिंह तब तक मुनीमजी दफ्तर जा चुके होते हैं मगर क्या मजाल है कि बेटा या बहू उनको जगा दे।उनका निठल्ला बेटा भी अब काफी व्यस्त रहता है इधर उधर दिन भर उसे मिसेज सिंह भेजती रहती हैं उनका बेटा पहले उनको अम्मा कहता था अब मॉम कहकर बुलाता है । वैसे मिसेज सिंह आजकल बहुत परेशान भी रहती हैं ,क्योंकि दादा नाना की उम्र के लोग सुबह  शाम उनको इतना मैसेज भेजते हैं कि उनका मोबाइल हैंग हो जाता है और उनका मोबाईल रुक जाता है तो उनकी दुनिया सूनीसूनी हो जाती है। दिक्कत ये है कि इन बुड्ढे शौकीनों से वो पिंड भी नहीं छुड़ा सकती क्योंकि इन्ही के साथ साझा संकलन निकालने हैं और इन्ही से अपने कार्यक्रम स्पॉन्सर कराने हैँ।माया महा ठगिनी हम जानी ,अब ये माया अगर मिसेज सिंह को धन के रूप में चाहिए थी तो उन शौकीन बुड्ढों को कीर्ति के रूप में पानी थी। माया के दोनों रूप दोनो तरफ से एक दूसरे को ठग रहे थे। मिसेज सिंह यात्रायें खूब करती हैं।वो कहती हैं कि यात्रा करने से उनके आसपास नकारात्मक ऊर्जा नही रहती। ये ये और बात है कि जिस शहर में वो जाती हैं उस शहर में किसी साझा संकलन वाली महिला के घर वो जा धमकती हैं फिर तो खाना पीना चाय नाश्ता सब कुछ मुफ्त। उन्ही के किराये पर शहर घूमना। मौका पाकर किसी टूरिस्ट स्पॉट पर वो अपनी खूब फ़ोटो खिंचवा लेती हैं फिर उसे मेजबान का पता दे आती हैं। झख मार कर वो मेजबान उनकी फ़ोटो उनके पते  पर भेज ही देता है।मिसेज सिंह पहुंची हुई कलाकार हैं ।वो अक्सर नए शहर में अपने एटीएम का कोड भूल जाती हैं तो उनकी छोटीमोटी खरीदारी मेजबान महिला ही करती है। मिसेज सिंह अपने पास दो हजार का एक नकली नोट भी रखती हैं जिसे वो अपने मेजबान के साथ होने पर होटल या टैक्सी का बिल चुकाने के लिये तत्काल निकाल लेती हैं। वो जानती हैं कि उनका नोट पकड़ा जाएगा सो वो नोट के पकड़े जाने पर दुखी और ठगे जाने का अभिनय भी करती हैं फिर अपने वरिष्ठ होने का हवाला देकर वो मेजबान महिला के सामने अपना एटीएम कार्ड हाज़िर करके बिल भुगतान करने की ज़िद करती हैं मगर हमेशा की तरह वो एटीएम का कोड भी भूल जाती हैंमजबूरन उस मेजबान महिला को उनके समस्त भुगतान करने पड़ते हैं। वैसे उनका दो हजार का नकली नोट और उनका एटीएम का कोड भूलना अब काफी चर्चित हो चला है।इसलिये वो नए नए पैंतरे आजमाती हैं। हाल ही में एक दूसरी महत्वाकांक्षी महिला से उन्होंने मेलजोल बढ़ाया है।दूसरी वाली देवीजी पहले एक टूरिस्ट एजेंसी चलती थीं उनका रोजगार फेल हो गया और उधारी बढ़ गई तो उन्होंने मिसेज सिंह के साथ नया रोजगार शुरू किया। अब वो विदेशों में हिंदी का व्यापार बढ़ा रही हैं। अगर आप धनवान हैं और देश के हिंदी परिदृश्य में आपको महत्व नहीं मिल रहा है तो चिंता मत कीजए मिसेज सिंह और उनकी व्यापारिक साझीदार विदेश में हिंदी का कोई ना कोई बड़ा पुरस्कार/सम्मान आपको गारंटी से दिलवा देंगे। सम्मान पाने वाला फूल कर कुप्पा हो जाता है और हमारे देश में तो विदेशी कूड़ा भी सर माथे पर फिर सम्मान तो इंटरनेशनल हो जाता है। इस काम मे मिसेज सिंह का कमीशन तीस प्रतिशत का है।मिसेज सिंह योजना बना रही हैं कि वो जल्द ही शिवभस्मासुर का प्रसंग दोहराएँगी और दूसरी महिला को साहित्यिक टूरिज्म के इस धंधे से बाहर कर देंगी।लेकिन उनके सामने एक बखेड़ा खड़ा हो गया उनकी बहू नाराज होकर मायके चली गयी है वो कहती है कि मिसेज सिंह ने उनकी जितनी भी साड़ियों का पहनकर उद्घाटन किया है उतनी ही साड़ियां जब तक वो नई खरीद कर नहीं दे देती तब तक वो वापस लौट कर ससुराल नही आएगी। मिसेज सिंह अभी इस समस्या से निपट पाती तब तक माणिकलाल बीमार पड़ गए। तेल मिल की मुनीमी में उनका दमा रोग असहनीय हो चला है।डॉक्टर ने उन्हें हवा पानी बदलने के लिए किसी पहाड़ी शहर में कुछ महीने रहने की ताकीद की है। माणिकलाल एक ऐसा सस्ता शहर खोज रहे हैं जहां पांच कोस के दायरे में कोई लेखक/लेखिका ना रहती हो। अब मिसेज सिंह वाकई बहुत परेशान हैं कि दो महीने बाद उनको विदेश जाना है,कई साझा संकलन निकालने हैं अगर वो दूर दराज रहने चली गईं और उनके स्मार्टफोन में नेटवर्क नहीं मिला तो…..?????

दिलीप कुमार

 

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