राइटर्स ब्लॉक को कैसे तोड़ें?

जब समरसिद्धा लिखने बैठा तो न तो कोई कहानी थी और न कोई रूपरेखा। तब तो मैं खुद को लेखक भी नहीं समझता था। उपन्यास तो बहुत दूर तब तक तो कोई लघुकथा भी नहीं लिखी थी। मगर बचपन से ही जब छोटी छोटी पॉकेट बुक पढ़ता था एक हसरत सी थी कि बड़ा होकर एक उपन्यास लिखूँगा जिसमें फंतासी होगी, किस्सागोई होगी, एक्शन होगा, थ्रिल होगा, सस्पेंस होगा..यानि कि यू पी चाट भंडार वाले की चाट होगी जिसमें आलू, चना, पापड़ी, सेव, भुजिया, दही, चटनी सब कुछ होगा। वो हमारी पीढ़ी के बच्चे थे जो बड़ा होकर कुछ करने की हसरत पालते थे। आज के बच्चों में तो बड़ा होने का सब्र ही नहीं होता।
खैर जब कुछ फंतासी टाइप लिखना था तो सोचा कि ऐतिहासिक/पौराणिक गल्प का विषय मुफ़ीद रहेगा। अब काल कौन सा लें, पृष्ठभूमि कहाँ की रखें। छत्तीसगढ़ में पला बढ़ा था, सिरपुर, राजिम, अमरकंटक वगैरह घूमे हुए थे तो सोचा दक्षिण कोसल और मेकल की पृष्ठभूमि बना ली जाए। काल भी उत्तर वैदिक काल तय कर लिया, बुद्ध-महावीर से पहले का। उस काल का कोई प्रामाणिक इतिहास भी नहीं है। फट्टे देने में आसानी होगी। किसी जानकर व्यक्ति ने सवाल किए भी तो कह दूँगा, गल्प ही तो है, पढ़ो और मज़ा लो, इतिहास काहे ढूँढते हो।
अब सोचा लिखने बैठा जाए। मगर न कोई कहानी, न कोई प्लॉट। उपन्यास लिखना था, मज़ाक थोड़े ही था। तो सोचा पहले एक दृश्य बनाया जाए। दो चार पैराग्राफ लिखकर देखूँ तो सही, लिख भी पाता हूँ या नहीं। दृश्य क्या बनाया जाए? ऐतिहासिक गल्प है, फंतासी है, थ्रिल है तो कुछ तंत्र-मंत्र के एलिमेंट तो डालने होंगे। तो सोचा किसी तांत्रिक साधक या साधिका का दृश्य बनाया जाए। श्मशान में बैठा देता हूँ साधना करने के लिए, अमावस की काली रात में। जबरदस्त सीन बनेगा। पहले सोचा कि शव साधना में बैठा दूँ। फिर लगा हॉरर थोड़े ही न लिख रहा हूँ, कोई अन्य साधना हो। नाम देना कोई ज़रूरी भी नहीं। महिला साधक ही रखता हूँ। तंत्र के वाममार्ग की अग्रदूत महिलाएँ ही तो थीं। तभी तो उन्हें वामा कहा जाता है। या फिर इसका उल्टा हो, वामा से वाममार्ग बना हो।
अब साधिका का नाम क्या रखूँ? कहानी के पात्रों के नाम चुनना भी एक टेढ़ी खीर होती है। चरित्र से मेल खाना चाहिए। ऐसा तो नहीं कर सकते ना कि आंखों का डॉक्टर और नाम डॉक्टर सूर। हैं हमारे रायपुर में एक। आईडिया आया कि अमावस की काली रात का सीन है, कुछ काले जादू की साधना हो रही है, वैसा ही कुछ नाम रख देता हूँ। गूगल में सर्च किया तो एक नाम बहुत पसंद आया, शत्वरी, यानि अंधेरी रात, डार्क नाइट। बस उठा लिया।
अब लिखा क्या जाए? तब कहानी में पहली पंक्ति का महत्व समझाने वाले प्रवीण झा तो फ़्रेंडलिस्ट में नहीं थे मगर फिर भी इतनी समझ तो थी कि पहली लाइन बढ़िया होनी चाहिए। आँख बंद कर श्मशान के दृश्य को इमेजिन किया और कुछ सोचकर लिखा, ‘साधना के असफल प्रयासों से कुंठित होते हुए शत्वरी ने एक बार फिर धीरे से अपनी आँखें खोलीं और अपने चारों ओर भूमि पर मानव हड्डियों को गाड़कर बनाए गए घेरे के बाहर बैठे सियार को टकटकी लगाए देखने लगी।’
दो तीन बार इस लाइन को पढ़कर देखा। बढ़िया लगी तो दृश्य आगे बढ़ाया। श्मशान का वातावरण और शत्वरी की शारीरिक रूपरेखा खींचते हुए ही दो पैराग्राफ हो गए। शुरुआत हो गई। अब लगा लिख सकता हूँ। अब कुछ कहानी बनाई जाए।
ये ऊपर जो कुछ भी लिखा है उसका मक़सद उन लोगों को एक उदाहरण देना है जो कहते रहते हैं कि वे राइटर्स ब्लॉक से जूझ रहे हैं। राइटर्स ब्लॉक कुछ नहीं है। कभी कभी पानी की तरह ही विचार भी जमकर बर्फ़ हो जाते हैं। उन्हें तोड़ना होता है। वो जो अँग्रेज़ी में कहते हैं, ब्रेक द आइस। बस बैठ जाएँ और शुरुआत कर दें। कुछ तो लिखें, कोई तो दृश्य बनाएँ। आगे की आगे सोचेंगे। विचार बहने तो शुरू हों। कलम की स्याही के साथ बहते बहते आगे भी निकल जाएँगे।

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