लघु कथा – काफ़िर लड़की

पौ फटने वाली थी ,अँधेरे ने रात का दामन नही छोडा था। उन दोनों  के बार्डर पार करने का यही सबसे मुफीद वक्त था,जब फौजी दरयाफ्त कम से कम होती थी। हाड कंपाती ठंड मे एक ने दूसरे से पूछा “अमजद ,तूने सच मे गोली मारी थी उस लडकी को?

दूसरे ने ठंडे स्वर मे कहा “हाँ सुबेह,तुम्हें शक क्यों  है? ये मेरी अहद है,सो किया। ”
सुबेह को उस पर यकीन न हुआ उसने पूछा “पर तू तो कह रहा था कि उस लडकी ने तुझे फौजियो से उस रात छुपाया था,फिर कत्ल कैसे किया तूने उसका,हाथ न काँपा तेरा?”
अमजद झल्लाते हुए बोला”जिबह नही किया था उसको,हलाली नही करनी थी। दूर से गोली चलानी थी ,सो चला दी। हम मुजाहिद है गोली चलाते वक्त ये नहीं सोचते कि ये गुनाह है या सवाब। अल्लाह का काम करने मे क्या हिचक?”
सुबेह अमजद का लीडर था। उसी की गवाही पर अमजद को पगार मिलनी थी। सुबेह ने मोबाइल निकालकर अपने आका को इत्तला देनी चाही कि मुजाहिदीन ने कत्ल करके सवाब का काम किया है,सो उसकी पगार दे दी जाये। अमजद भी यही सोच रहा था कि सुबेह आकाअो को खबर कर दे तो उसके घर पैसे पहुँच  जाये अौर उसकी बीमार बेटी का इलाज जारी रह सके।
सुबेह ने मोबाइल आन किया,मगर उसका दिल खटका।उसने फिर पूछा”सच-सच बता अमजद,खा अल्लाह की कसम कि तूने उस लडकी को गोली मारी थी।  अल्लाह की झूठी कसम का नतीजा जानता है ना”।
अमजद की आँखों से आँसू  बहने लगे। वो बिलखता हुआ बोला “मेरी बेटी बीमार है,इसीलिए अल्लाह कसम मैने उस काफिर बच्ची को गोली मार दी थी,अल्लाह बेहतर जानता है”ये कहते हुएउसका गला रुध गया।
सुबेह ने मोबाइल पर इत्तला दे दी कि मुजाहिदीन अमजद की पगार उसके घर पहुँचा दी जाये क्योकि उसने सवाब का काम कर दिया है।
ये खबर शाया करने के बाद सुबेह की आँख भी नम थीं।  वो दोनों  जानते थे कि काफिर बच्ची मरी नही होगी।

दिलीप कुमार

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