कथा संरचना – लेखन शैली पर कुछ बातें

प्रवीण झा ने कथा संरचना में पहली पंक्ति के महत्त्व पर जो बातें कही हैं उनसे ही आगे कहना चाहता हूँ. प्रवीण ने बहुत सही बात कही कि यदि पहली पंक्ति ही उत्सुकता न जगाए तो पढ़ने का उत्साह ठण्डा पड़ने लगता है. दरअसल पहली पंक्ति ही नहीं बल्कि पहला पूरा पैराग्राफ ही बहुत महत्वपूर्ण होता है. पहला पैराग्राफ ही ऐसा हो जो पूरा माहौल बाँध दे. पढ़ते ही पाठक को लगे कि कोई बहुत उम्दा किताब हाथ लगी है. इसे आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता. उसके बाद यदि कुछ देर तक लेखन सतही भी हो जाए तो भी पाठक पहले पैराग्राफ वाली खूबी और गहराई ढूँढते हुए उसे पढ़ डालेगा.

प्रवीण झा ने भी माहौल बनाने या मंच सजाने की बात कही. यानि कि आँखों के सामने एक तस्वीर खिंच जाए. पर्दा उठा और ये रहा मंच, ये रहे प्रॉप, ये रही सजावट और अब कहानी शुरू. उपन्यास में इसकी गुंजाइश बहुत होती है, कैनवास बड़ा होता है. कहानी का कैनवास छोटा होता है तो गुंजाइश भी कम होती है, मगर फिर भी अगर माहौल बना दें तो क्या बात. एक बानगी देखें श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की प्रसिद्ध कहानी ‘उसने कहा था’ से –

“बड़े-बडे शहरो के इक्के-गाडी वालो की जबान के कोड़ो से जिनकी पीठ छिल गई हैं और कान पक गए हैं , उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालो की बोली का मरहम लगावे । जबकि बड़े शहरो की चौड़ी सड़को पर घोडे की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी धोडे की नानी से अपना निकट यौन संबंध स्थिर करते है, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते है, कभी राह चलते पैदलो की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं , कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरो को चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर मे उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियो मे हर एक लडढी वाले  के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर , ‘बचो खालसाजी’, ‘हटो भाईजी’, ‘ठहरना भाई’, ‘आने दो लालाजी’, ‘हटो बाछा’ , कहते हुए सफेद फेटो , खच्चरो और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालो के जंगल से राह खेते हैं । “  

गौर करिए कि हर वाक्य में तस्वीर खींची जा रही है. शब्दों की सजावट पर गौर करें, उपमाओं पर गौर करें. जैसा माहौल वैसे ही उपमाएँ, ‘इक्के-गाडी वालो की जबान के कोड़ो से जिनकी पीठ छिल गई हैं और कान पक गए हैं.’

शब्दों से तस्वीर कैसे खींचें? एक उदाहरण से समझते हैं. मसलन आप लिखते हैं, ‘उस छोटे से कमरे में एक पुरानी कुर्सी रखी थी.’ कुछ खास तस्वीर नहीं खिंची. कमरा कैसा दिखता है? कुर्सी कैसी है? कमरे में कहाँ रखी है? अब इसे कुछ इस तरह लिखें, ‘उस दस बाई आठ फुट के छोटे से कमरे की सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की के दायीं ओर लोहे की ज़ंग खाई पुरानी कुर्सी रखी थी जिसका भूरा पेंट जगह-जगह से उतरा हुआ था.’  खिंच गई ना तस्वीर? पाठक बंध गया. आँखों के सामने फिल्म सी चलने लगी. मगर चित्रण करते हुए इस बात का भी ध्यान देना होता है कि बहुत ही विस्तृत चित्रण भी न हो. कुछ चीज़ें पाठकों की कल्पनाशीलता के लिए भी छोड़ देनी चाहियें.

और भी तरीके हैं पाठक को बाँधने के. जैसा कि प्रवीण ने आर के नारायण का लिखा एक उदाहरण दिया, ‘सोमवार की सुबह थी.’ सोमवार की सुबह आम सुबहों से अलग होती है. वीकेंड ख़त्म होता है. काम पर जाने की बेचैनी शुरू. अगर ऐसा ही कुछ लिखना है तो लिख दें, ‘सोमवार की बेचैन सुबह थी.’ एक विशेषण से सुबह का चित्रण हो गया, प्रकृति का मानवीयकरण भी हो गया, और पाठक की भी उत्सुकता जगी आगे की बेचैनियों को जानने की. रविवार की सुबह हो तो लिख दें, ‘रविवार की अलसाई सुबह थी.’ एक और बानगी जो मैंने डार्क नाइट दूसरे चैप्टर की शुरुआत में लिखा है. ‘वह जुलाई की एक रात का आख़िरी पहर था.’ आख़िरी पहर तकरीबन सुबह ही होता है. ब्रिटेन में तो जुलाई के महीन में सूरज सुबह चार बजे से उगा बैठा रहता है. मगर ‘रात का आख़िरी पहर’ एक अलग तरीके से बाँधता है. फिर ‘जुलाई की एक रात का आख़िरी पहर’, आख़िर क्या ख़ास होगा जुलाई की रात के आख़िरी पहर में? अगली पंक्ति है, ‘प्रिया के रेशमी बालों की बिखरी लटों सा सुर्ख उजाला रात के सुरमई किवाड़ों पर दस्तक दे रहा था.’

लेखन में विशेषण, प्रतीकों और उपमाओं का बहुत महत्त्व होता है. इनका ख़ास ध्यान दें तो साधारण बातों को भी बहुत सुंदर तरीके से लिखा जा सकता है.

2 comments

  • rsbharti

    मेरी कोई भी कहानी पढ़ें तो पता चल जायेगा कि कहानी की फ़िज़ा गढ़ने के लिए मैं पहले पैराग्राफ में ही भरपूर कोशिश की है. अभी कई नयी कहानियाँ मुझे इसलिए पसंद नहीं आती है, क्योंकि पहला पैराग्राफ दिलचस्प नहीं होता है. कहानी का माहौल भी सही नहीं बन पाता है तो पाठक बीच में ही कहानी छोड़कर चले जाते हैं.

  • Literature Life

    राकेश जी, कुछ उदाहरण देकर बताएँ तो बेहतर रहेगा।

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