शब्दों की भी सीमाएँ हैं

शब्द बांध न सकें तुम्हें

भाव लांघ न सकें तुम्हे

कहने की पर आशायें है

शब्दों की भी सीमायें हैं ।

 

सब भाव तुम्हारे चेहरे के

निष्कपट से हैं सब झलक रहे

आंखों के बीच तैरते से

कुछ ख्वाब तुम्हारे छलक रहे

कहने को मैं कह दूं इतना

इस दुर्गम जीवन अरण्य में

हम साथ तुम्हारे आये हैं

शब्दों की भी सीमायें हैं।

 

नर्म गुलाबी होठों पर

नमी शफक़ सी बिखरी थी

घटाओं में लाली हो जैसे

जुल्फ़ें ऐसी निखरी थी

ऐसे में तुमको कह दूं क्या

इस तस्वीर को हम कितनी

शिद्दत से मन में बसाये हैं

शब्दों की भी सीमायें हैं।

 

कमी कहीं सरगम की है

जिन पर कदम थिरकते थे

शब्द बांध कर तानों संग

रात को जुगनू उड़ते थे

सुबह पहर वो गीत सुने जो

चिड़ियों ने गुनगुनाये हैं

शब्दों की भी सीमायें हैं।

 

#अंकित_बाजपेई

8299470141

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