स्लीप पैरालिसिस

मैं भूल जाउंगी कि मैंने क्या कुछ लिखा था
तुम भी भूल जाना कि तुमने क्या पढ़ा ।

मैं बहुत दिनों के लिए मर गयी थी। मेरा दोबारा जन्म हुआ है।

एक लंबे समय से नींद जाने कौन सी रंजिश निभा रही है।अंदर एक चुप्पा सा पसरा हुआ है।एकाध घंटे को आँख लग भी जाए तो सिहरन भर देने वाले अजीब सपने मुझे जकड़ लेते हैं।मैं बस उन सपनों के मायने खोजती रहती हूँ।

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रात का वो कौन सा पहर होगा।
ढलान पर आकर रास्ता दो तरफ़ को बँट गया था।दायीं ओर दूर तक नरम हरी दूब का गलीचा बिछा था। कचनार प्राजक्ता,और कटहरी चम्पा फूलों से लदे थे।मुझे लगा यह रास्ता ज़रूर पहाड़ों को जाता होगा। मुझे कोई जिज्ञासा न हुई।लेकिन कैसा सम्मोहन था कि बायीं तरफ़ के रास्ते पर मेरी आँखें ठहर गयीं।वो कोई मायावी जगह थी।मैं आगे का कोई कयास नहीं लगा सकती थी।जहाँ तक नज़र गयी बस रेत ही रेत। ।आँखें गड़ाकर देखने पर भी दूर का कुछ नहीं दीखता था।मैंने क्यों उस बायीं तरफ़ के रास्ते पर उतर जाना चाहा था ! शायद एक पल को मुझे किसी बन्द मुट्ठी का ख़याल आया होगा कि ज़िंदगी थोड़ी रहस्यपूर्ण , रोमांचक और जोख़िम भरी होनी चाहिए। किसी अदम्य इच्छा से आवेशित होकर मैंने उसी धूलिहा रास्ते को चुना।लेकिन सौ कदम चलते ही मैंने पाया वहां किसी तरह की कोई आहट नहीं बस एक तवील खामोशी है। मुझे उस खामोशी से भय लग रहा था।चंद कदम चलकर ही मुझे असहनीय थकान हो गई।हताश होकर मैं वापस लौट जाना चाहती थी कि अभी बहुत दूर नहीं आयी हूँ।मगर पीछे मुड़कर देखने पर भी गहरा ग़ुबार था।कुछ बड़े आकार की मकड़ियां मेरे गिर्द खूँखार चपलता से जाल बुन रही थीं।मारे दहशत के मैं बहुत तेज़ चलने लगी। मगर इंच भर भी आगे न खिसक पायी।मेरे पाँव रेत में धँसे जा रहे थे।मेरे कंधे पर ठस्समठस्स भरा एक झोला था। कहीं से कोई आवाज़ आयी “इस झोले में बहुत सारे डर और बेचैनियां हैं ,इसे उतार फेंको।” यह मेरी ही आवाज़ थी।मैंने झोले को फेंक देना चाहा ।लेकिन वो मेरी पीठ पर किसी जोंक के मानिंद चिपका था।मैं बहुत थक गई थी। मैं कोई छाँव ढूंढ रही थी जिसके तले दो घड़ी सुस्ता लेती। लेकिन वहां सूखे बबूल और कंटीली नागफनियों के सिवा कुछ नहीं था।मेरा सारा जिस्म छिल गया था।अचानक रेत को चीरकर बहुत से लाल -बैंगनी गिरगिट मेरे चारों ओर दौड़ने लगे।मैं चिल्लाने लगी। खौफ़ ने मेरे हवास छीन लिए।थोड़ी देर में वहां गाढ़ा अंधेरा फैल गया।मुझे कुछ दिखाई न दिया।तब मैं निढाल होकर गिर पड़ी।मेरी साँसों से होकर रेत फेफड़ों तक जा घुसी थी ।मैं साँस नहीं ले पा रही थी।मैं भीषण दर्द से छटपटाने लगी ।और नीम अंधेरे में मैंने उस शुष्क और ठंडी रेत पर दम तोड़ दिया।मेरा कोई नामोनिशान बाक़ी न था।सिर से पाँव तक मैं रेत में दब चुकी थी । मरते समय मैं बहुत उदास थी।
मुझे किसी ख़ुशगवार पहाड़ या रोमानी समंदर के किनारे पर मरना चाहिए था।

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बहुत देर बाद समझ आया मैं ठीक जगह पर हूँ।
मैं हैरान थी कब्र से निकलकर मैं यहाँ कैसे पहुँची ।मेरे आस पास रेत होनी चाहिए थी मगर नहीं थी।कौन मुझे उठाकर बिस्तर तक लाया होगा ।पंखा अपनी तीव्रतम गति से घूम रहा था।मुझे ठंड लग रही थी।मैं अपने पाँव पर पड़ी नीली चादर को अपने कंधों तक खींचना चाहती थी।लेकिन मेरे हाथ -पाँव सुन्न पड़े थे।मुझमें हिलने डुलने और किसी को आवाज़ देने की शक्ति नहीं बची थी।

मैं सचमुच मर गयी थी।मैंने फिर से जन्म लिया है।

— विजयश्री तनवीर

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