सड़क के बाईं ओर

 

बहुत पहले एक वरिष्ठ मित्र ने मुझे एक पुरानी साइकिल दी थी ताकि मुझे उनके प्रेस कार्यालय तक आने में मुझे आसानी हो। उसका उपयोग, माफ करेंगे,  मैंने अर्थार्जन के उपक्रम में भी किया। बरसों बाद वे मुझे फेसबुक पर मिले हैं । अपनी भावना रोक नहीं पाया और एक कविता कर डाली, बता नहीं सकता कितना सफल हुआ हूँ,  मूल्यांकन उनपर और आप जैसे सुधी पाठकों पर छोड़ता हूँ।

बरसों बाद

कान में फिर गूंजी

ट्रन-ट्रन ट्रन-ट्रन ……..

घंटी एक साइकिल की

बरसों बाद

आंखों में पानी भी उतरा

बहुत गहरा

डूब गयी उसमें

घंटी सहित साइकिल

नहाकर निकली

तरोताजा फिर बजी

ट्रन-ट्रन ट्रन-ट्रन …

सड़क के ठीक बायीं ओर

एक अनुशासित नागरिक की तरह

उसे चलाता हुआ

पहुंचता था रोज

वह छोटा -सा

दम खींचता प्रेस -कार्यालय

सड़क के ठीक बाईं ओर

देश समाज और नयी कविता

हाशिये पर खड़े लोग

पिछड़े -दलित वर्ग

दिग्भ्रमित युवा

नरक को निकाल देश से,

देश को कैसे बनाना स्वर्ग

और हम सब स्वर्गवासी

कैसे बनेंगे

एक विराट् प्रश्न

परिचर्चा होती थी

विचार-मंथन,

रणनीति लेखन की

मीमांसा भी किसी सार्वजनिक भाषण की

होते थे सब चुप या मौन

जब बात आती थी राशन की

क्योंकि एक घंटी बजती थी

पेट में भी रह – रहकर

सामने बीच चौक पर जैसे घंटा-घर की सुई

खूब धुनते थे रुई

विचारों -वादों – आदर्शों की

बहुत चिंता थी सबको

देश के कल और परसों की

घंटी बजती थी

सड़क के ठीक बायीं ओर….

और वह साइकिल पुरानी जर्जर

उसने मुझे दी थी

मुस्कुराते हुए

शायद बोल नहीं पाए थे

” मैं आपको इससे अधिक दे ही क्या सकता हूँ ! ”

मेरी वे भरी-भरी आंखें

फिर भर आई हैं

बरसों बाद

और सच्चाई बताता हूँ अब

वह यह कि उस साइकिल में कोई घंटी ही नहीं थी

सारे पुर्जे इतने ढीले

फिर रास्ते इतने पथरीले

बाईं ओर

तेजी में झनर्-झनर्-झन्न-झन

पूरी साइकिल ही थी एक घंटी

है अभी-भी याद

बरसों बाद

आज वो साइकिल नहीं है

हमारे बीच

कबाड़खाने में बिक

कौड़ी के दाम

रीसाइक्लिंग के बाद

मगर मुझे होता यह एहसास

कि फिर यहीं कहीं चल रही है

सड़क के बायीं ओर

अभी भी सुनता हूँ

ट्रीन-ट्रीन ट्रीन-ट्रीन-ट्रन ….

आंखें भर आती हैं अभी भी

पानी से नहीं

धूल और धुएं से

पानी गायब है आँखों के कुएं से ।

22 /04/2018

वास्को दा गामा, गोवा ।

 

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