हिन्दी लेखक शोषित वर्ग में क्यों आता है?

हिन्दी लेखक सच ही शोषित वर्ग में आता है … पर इसके लिए वह स्वयं दोषी है। कारण देखिए –
जिस पल कोई लेखक अपनी किताब लेकर बाजार में आ जाता है, वह बाजार का हिस्सा बन जाता है। बाजार अपने नियमों से चलता है, वह इस बात से प्रभावित नहीं होता कि यह बंदा खुद को साहित्यकार कहता है महज इसीलिए इसे सम्मानित मानकर स्पेशल ट्रीटमेंट दिया जाए।
हिन्दी का लेखक बाजार के इन नियमों की अनदेखी करता है। जिन्होंने इन नियमों की अनदेखी नहीं की, बाजार ने भी उनका शोषण नहीं किया। मैंने अपनी पोस्ट गंभीर साहित्य बनाम लोकप्रिय साहित्य में ऐसे सफल लेखकों की एक छोटी सी लिस्ट भी दी थी।
आज हिन्दी में तीन तरह के साहित्यकार हैं –
वे जो अपने को महान साहित्यकार मानते हैं। उनकी अधिकांश रचनाओं के प्रकाशित, प्रशंसित और पुरस्कृत होने के बाद समालोचक उनके अर्थों का प्रतिपादन करता है। लेखक ऐसी कृति के उद्देश्य और उसके अर्थ के विषय में चिंता नहीं करता। पाठक ऐसी कृति की ओर नजर उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं करता। इनकी कृतियों की प्रशंसा इनके चेले-चापड़ करते हैं या तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजाता हूँ की तर्ज पर समानधर्मा-समानकर्मा साहित्यकार करते हैं।
इस किस्म के साहित्यकारों को सफल माना जा सकता है। इन्हें आप कतई शोषित वर्ग में नहीं रख सकते। इन्हें प्रशंसा भी मिलती है, पुरस्कार भी मिलते हैं और रॉयल्टी भी मिलती है। ये जुगाड़ से पाठ्यपुस्तकों में घुस जाते हैं और मोटा माल पीटते हैं। इनमें जो गैर साहित्यकार किस्म के लेखक होते हैं वे कॉलेजों में पढ़ाये जाने वाले सैकड़ों किस्म के विषयों पर पाठ्य-पुस्तकें, शॉट-नोट्स और कुंजियाँ लिखते हैं और अक्सर अपने वर्ग के साहित्यकार किस्म के लेखकों से भी ज्यादा माल पीट लेते हैं।
2. दूसरी किस्म उन लेखकों की है, जिन्हें खामखां ये मुगालता हो जाता है कि वे भी लेखक हैं। इनमें कवियों की तादाद मुझे लगता है नब्बे फीसदी से ज्यादा है, उसमें भी तीन चौथाई के लगभग ग़ज़लकार हैं। इन्हें ग़ज़ल की अलिफ-बे नहीं पता होती पर दिन भर भैंस की तरह ग़ज़ल की जुगाली करते हैं। कुछ मेरे जैसे सिरफिरे किस्म के लोग इन्हें समझाने की कोशिश करते रहते हैं कि भइया ग़ज़ल के कुछ नियम कायदे होते हैं और उन्हें समझना तुम्हारे बूते से बाहर है, तुम आराम से नई कविता लिखो। नई कविता फ्रीस्टाइल विधा है, उसमें जैसे चाहो हाथ-पैर फेंको कुछ भी कायदे के बाहर नहीं माना जाता … पर ये ऐसी सलाहों को कान पर बैठी मक्खी जितना भी भाव नहीं देते। कुत्ते भूंकते रहते हैं, हाथी मस्त झूमता अपनी राह चला जाता है। इस प्रकार के ग़ज़लकारों के बाप की टेंट में अगर दम होता है तो ये आराम से उसके दम पे दस-बीस संकलन छपवा कर कवियों में अपना शुमार करवाने की जुगत भिड़ाने लगते हैं।
सोशल मीडिया ने ऐसे साहित्यकारों के लिए उम्दा खाद का काम करती है। जैसे कभी सुरेन्द्र शर्मा हाथ में माइक थाम कर मात्र इतना ही कहते थे – ‘मैं बोल्यो’ … और पब्लिक दस मिनट तक बेसाख्ता हँसती रहती थी और बाद वह हँसी थमने के बाद शर्मा जी कहते थे- ‘लो बोलो, इसमें भला हँसने की कौन सी बात थी !’ उसी तरह ये फेसबुक या व्हाट्सऐप पर कुछ भी चेंप देते हैं और इनके प्रशंसक लाइक्स की बाढ़ ला देते हैं। इन्होंने सुरेन्द्र शर्मा को नहीं सुना होता इसलिए बेचारे बाद में यह नहीं कहते कि भला इसमें लाइक करने की कौन सी बात थी ! ये बस दनादन आभार किए चले जाते हैं। इनमें भी अगर कोई कवयित्री होती है (इनमें सौ में सौ यह नहीं जानतीं कि कवियत्री नहीं कवयित्री होता है, इसलिए ये अपने को कवियत्रियों में ही शुमार करती हैं।) तो उसका झाँक भर देना ही लाइक्स की बाढ़ लाने के लिए काफी से भी बहुत ज्यादा होता है।
इनमें से कभी-कभी कोई-कोई गद्य में हाथ आजमाने लगता है। वो इस्टोरी टाइप कुछ लिख डालता है। प्रकाशकों के लिए ये बड़ी मुफीद किस्म की वैराइटी होती है। वे इनसे जो चाहे लिखवा कर मार्केट में फेंक देते हैं और अपने मार्केटिंग टेलेंट के जरिये कुछ न कुछ बेच ही डालते हैं। न ये जानते हैं कि स्टोरी क्या बला होती है, कथानक किसे कहते हैं, चरित्र-चित्रण किस चिड़िया का नाम है और नही प्रकाशक चाहता है कि ये इन बातों को जानें। ये अगर ये सब बातें जान जायेंगे तो अपने को बड़ा लेखक मान बैठेंगे और ज्यादा उजरत मांगने लगेंगे। बिना ये सब जाने वे इतने से ही खुश होते हैं कि उनके नाम के आगे किताबों की लिस्ट जुड़ती जा रही है।
भइया मेरे इस किस्म के लेखक का यदि शोषण होता भी है तो वह उतना नहीं होता जितनी रेड़ ये हिन्दी की पीटते हैं। इन्हें तो और भी कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
3. तीसरी किस्म में फिर दो किस्में होती हैं।
3 (1) वे जो भाग्य से अथवा अपनी तेजस्वी मेधा के बूते यह समझ जाते हैं कि हम भी मार्केट का एक हिस्सा हैं और हमें मार्केट के नियमों के अनुसार ही चलना है। ये अगर बहुत अच्छा नहीं भी लिखते हैं तो भी इनका शोषण संभव नहीं है।
3 (2) यह वह किस्म है जो बाजार को समझ नहीं पाती। इसके कई कारण हो सकते हैं –
— कई बार ये लोग आलसी होते हैं, इसलिए बाजार की मारामारी इन्हें रास नहीं आती। ये जब मन हुआ तो लिख डाला, नहीं हुआ तो नहीं लिखा।
— कई बार ये इस सोच को प्रधानता देते हैं कि अगर हजार, दस हजार, लाख लोग हमें लेखक की तौर पर नहीं जानेंगे तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। जितने कम लोग जानेंगे उतनी ही स्वतंत्रता स्वच्छंद रहेगी। ये सही मायनों में प्रिंसेज डायना के अंजाम से सबक सीखे हुए होते हैं। आलसी ये भी होते हैं।
— तीसरे वे होते हैं जो साहित्य को साधना समझने की भूल कर बैठते हैं। अपनी इसी भूल के चलते ये लिखते रहते हैं … बस लिखते रहते हैं। कभी-कभी तो बहुत अच्छा लिखने के बावजूद भी कोई नहीं जानता कि ये भी लिखते हैं। मेरा पड़ताल का नतीजा यह है कि इनमें डॉक्टरों (दवाई वाले) की संख्या सबसे ज्यादा होती है। परिषदीय स्कूलों के अध्यापक दूसरे नम्बर पर होते हैं। कभी अगर कोई खोजी किस्म का प्रकाशक इन्हें सूँघ लेता है तो ये हिन्दी साहित्य की सही मायनों में बड़ी सेवा कर डालते हैं पर अब ऐसे खोजी प्रकाशक दुर्लभ प्रजाति हो गयी है।
अब भाई, इस किस्म को शोषित कैसे कह सकते हैं। जिसने बाजार को घास ही नहीं डाली उसे भला बाजार कीमत कैसे दे सकता है ?
3 (3) यह वाकई में शोषित वर्ग है। यह बाजार में आना चाहता है पर बाजार के कायदे नहीं जानता। इसे खुद को बेचने की कला नहीं आती। न तो इसके या इसके बाप की टेंट में बूता होता है और न ही इसमें लिखने के अलावा और किसी बात की कोई खास समझ होती है। एक और दो नम्बर के लेखकों/साहित्यकारों के पापों की सजा यही बेचारा वर्ग भुगतता है। यह कभी-कभार जोड़-तोड़ करके जिंदगी में एक-दो किताबें छपवा लेता है और उनका एक हिस्सा दोस्तों में बाट देता है। शेष बची किताबों को बाद में इसके बच्चे रद्दी में बेच देते हैं। इसके मरने के बाद अगर किसी को इसकी काबिलियत की जानकारी होती भी है और वह इसे मरणोपरांत कोई सम्मान देना भी चाहता है तो अक्सर इसकी औलादों के पास इसकी कोई डायरी-वायरी नहीं निकलती। (उसे तो वे पहले ही कबाड़ी को दे चुके होते हैं अथवा कूड़े में फेंक चुके होते हैं।)
अब इसके लिये आप चाहे कितना भी रो-गा लीजिए, इसका कोई भला कर पायेंगे ऐसा मुझे नहीं लगता।

नोट –
1. अपवाद हर जगह होते हैं, इस शाश्वत सत्य को सदैव ध्यान में रखा जाए।
2. हिन्दी का ऊपर लिखे किसी भी वर्ग का लेखक हो, वह यह मानता है कि लेखक मात्र वही है, बाकी सारे तो घसखुद्दे हैं। (नं0 – 1 इसमें सबसे प्रधान होता है) इसलिए वह किसी दूसरे लेखक को पढ़ना अपनी तौहीन समझता है। वह खुद ही किताबें नहीं खरीदता (कई बार इनमें मेरे जैसे भी होते हैं, जिनकी औकात ही नहीं होती, पर वे मौका मिलते ही इधर-उधर से जुगाड़ कर लेते हैं, अब किंडल ने थोड़ी सी औकात बना दी है।) अब भइया तुम खुद किताब खरीद नहीं सकते और ढोल पीटते हो कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं।

सुलभ अग्निहोत्री

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *