कविता:जिंदगी का सफर

चेहरे के भीतर क्या छुपा है?
किसे पता
देखने वाले को तो वह दीखता है
जिसे हम दिखाना चाहते है।
एक उन्मुक्त हंसी के भीतर
कितनी उदासियों की भीड़ है
इसे समझना आसान नहीँ है
भीड़ को आखिर कौन समझ पाया है?
लोग टूटे हुए हैं
और सपनों को जोड़ना चाहते हैं
गोयाकि चेहरा उदास है
और आईने को हंसाना चाहते हैं!
जिंदगी एक मुस्कान है
अगर होंठ चाहे तो
जिंदगी एक आँसू है
अगर आँख चाहे तो
जिंदगी दो शब्दों  का सफर है
हंसना और रोना
जब हंस लिए तो आधा सफर
जब रो लिये तो आधा सफर
इस तरह रोज ये जिंदगी सफर में रहती है!
@पवन कुमार वैष्णव
  चिकारड़ा,चितौड़गढ़
राजस्थान,mb 7568950638

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