सड़क के बाईं ओर

  बहुत पहले एक वरिष्ठ मित्र ने मुझे एक पुरानी साइकिल दी थी ताकि मुझे उनके प्रेस कार्यालय तक आने में मुझे आसानी हो। उसका उपयोग, माफ करेंगे,  मैंने अर्थार्जन के उपक्रम में भी किया। बरसों बाद वे मुझे फेसबुक पर मिले हैं । अपनी भावना रोक नहीं पाया और एक कविता कर डाली, बता नहीं सकता कितना सफल हुआ […]

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गज़लों में : एक गजल: दिलीप कुमार दर्श

लगा महफिल अब गुल न खिलाओ गज़लों में । आज सड़कों से भी आंखें मिलाओ गज़लों में ।   अभी भी पीने का पानी नहीं मयस्सर जिनको उन्हें भी आह भर  पानी  पिलाओ गज़लों में ।   पेड़ है रोटियों का , छांह में  वे  हैं  भूखे  बैठे इसकी डालों को भी कोई हिलाओ गज़लों में ।   कुछ भी […]

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एक और निर्भया :कविता / By दिलीप कुमार दर्श

अब है बहुत जरूरी एक बार ठीक से सर्जरी मन की । मन वैयक्तिक या सामूहिक चेतन -अवचेतन मगर रुको इसके पहले बहुत -बहुत जरूरी है समझना -देखना ये ट्यूमर विक्षिप्तता,  हवस,  …… आदि नामों से कहां -कहां घात लगाकर बैठा है और फटता है अचानक पता चलता है एकाएक हुआ है …बलात्कार .. एक बच्ची का मासूम बच्ची पड़ी […]

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पहली बार : एक कविता

ये ……तंत्र है जो भी लगा लो इसके पहले प्रजा, लोक,  भीड़  …..वगैरह वगैरह वो इसके ठीक पीछे चलता है बिल्कुल डब्बे जैसे पीछे और रेल की इंजन आती है बाद में लेकिन चलती है आगे आगे धड़-धड़-धड़म-धुड़ुम-धड़ाम…….. इसे सपाटबयानी समझो या कि कविता कोई फर्क नहीं क्योंकि सच्चाई यही है और इसे कहने में सिर्फ कविता ही समर्थ है। […]

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