कथा-संरचना: शैली-१

‘Genre’ कहिए, विधा या अंग कहिए, एक कथा या पुस्तक को ख़ास शैली में रख कर तो देखना ही होता है। आज अगर अमेज़न पर लिस्ट देखेंगे तो हिंदी की अधिकतर किताबें Literature —->Fiction या short stories में होगी। इसके अतिरिक्त भी हैं, जैसे बाल-साहित्य, आध्यात्म, यात्रा-संस्मरण, अकादमिक, इतिहास इत्यादि। पर कई पारंपरिक अंग जैसे निबंधकार लेखक और पाठक अब […]

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कथा संरचना: कथावाचक (नैरेटर) की भूमिका

अक्सर पहली पंक्ति से ही स्पष्ट हो जाता है कि कथावाचक है कौन? अमूमन लेखक स्वयं ही कथावाचक होते हैं। यही सुलभ भी है। पर लेखक कथा में हों, यह आवश्यक नहीं। अगर लेखक कथा में होते भी हैं, तो उनकी भूमिका नायक की तरह लगभग नहीं होती। वो तटस्थ रूप से कथा कहते रहते हैं, पात्रों से बतियाते हैं […]

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कथा संरचना: पहली पंक्ति का महत्त्व

किसी भी उपन्यास, कथा या फ़ेसबुक पोस्ट का पहला वाक्य एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज के समय में पहला वाक्य पढ़ कर ही लोग रचना जाँच लेते हैं, पर यह पहले भी था। शातिर प्रकाशक भी यह खूब समझते हैं। गर आप किताब लिखने बैठे, और पहले वाक्य को बार–बार काट कर ठीक कर रहे हैं, तो उस उपन्यास का […]

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ताम्रपत्र से किंडल तक

हालिया एक प्रश्न पढ़ा कि अठारहवीं सदी के पूर्व की लिखी किताबें भारत में मूल रूप में नहीं मिलती। इसलिए विश्वसनीयता पर संदेह होता है। पहले ताम्र-पत्र, शिलाओं पर ही लेखन होता था। जब काग़ज और मुद्रण आया, तो छपने लगी। अब वो चाहे वेद व्यास हों या बाणभट्ट, मूल लिखी कॉपी आपको नहीं मिल पाई, तो इसमें उनका दोष […]

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