A passionate writer.

राइटर्स ब्लॉक को कैसे तोड़ें?

जब समरसिद्धा लिखने बैठा तो न तो कोई कहानी थी और न कोई रूपरेखा। तब तो मैं खुद को लेखक भी नहीं समझता था। उपन्यास तो बहुत दूर तब तक तो कोई लघुकथा भी नहीं लिखी थी। मगर बचपन से ही जब छोटी छोटी पॉकेट बुक पढ़ता था एक हसरत सी थी कि बड़ा होकर एक उपन्यास लिखूँगा जिसमें फंतासी […]

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करी कथा – अंग्रेज़ी ज़ुबान पर हिन्दुस्तानी ज़ायका

वह लन्दन में मेरी पहली शाम थी। हौलबोर्न इलाके के जिस सर्विस अपार्टमेंट में मैं ठहरा था उसमें हमारी कम्पनी के कई और लोग भी ठहरे हुए थे। पहले ही दिन उन सबसे अच्छी मित्रता हो गई। शाम ढलते ही हमने निर्णय किया कि उस रात हम पश्चिमी खाना न खाकर हिंदुस्तानी खाना ही खायेंगे। एयरफ्रांस की फ्लाइट में मिले […]

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इरॉटिक टैबू क्यों है?

इरॉटिक पर जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ ब्रिटिश लेखिका शर्ली कॉनरैन का उपन्यास लेस बरबस याद आ जाता है. लेस को मैंने कई बार पढ़ा है. यह एक ट्रेंड सेटर उपन्यास रहा है. शर्ली कॉनरैन ने लेस को किशोर छात्राओं के लिए एक सेक्स इंस्ट्रक्शन मैन्युअल के रूप में लिखना शुरू किया था मगर अंत में उसने एक उपन्यास […]

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इरॉटिका, इरॉटिक रोमांस और पोर्न में अंतर क्या है?

जब मैंने ‘डार्क नाइट’ लिखना शुरू किया और लोगों से कहा कि वह एक इरॉटिक रोमांस होगा तो कई भौहें नृत्य करने लगीं। कई किस्म के प्रश्न उठे, क्या वह एक और फिफ्टी शेड्स टाइप का उपन्यास होगा से लेकर क्या वह मस्तराम या सविता भाभी जैसा होगा? लोग आमतौर पर इरॉटिक रोमांस, इरॉटिका और पोर्न के बीच अंतर नहीं […]

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मैंने इरॉटिक रोमांस क्यों लिखा?

डार्क नाइट लिखते समय मन में कई संशय और भय थे. पहली बात तो यह कि इरॉटिक विधा की मेरी स्वयं की जानकारी सीमित थी और दूसरी बात यह कि इसे पोर्न कहकर नकारा या दुत्कारा न जाए. मगर फिर भी मन में इस विधा पर लिखने की एक बलवती इच्छा थी. उसका सबसे बड़ा कारण मेरा अपना यह मत […]

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अंग्रेज़ – पियक्कड़, व्यभिचारी, पर बड़े शिष्टाचारी

अगस्त का महीना था और मौसम गर्म था। हालांकि भारतीय गर्मियों की तुलना में वह शायद वसंत ऋतु का मौसम ही लगे, मगर कड़क सर्दी के आदी अंग्रेज़ों के लिये वह गर्मी ही थी। इंग्लॅन्ड में उन दिनो गर्मियों का मौसम वैसे भी उतना गर्म नहीं हुआ करता था जितना आजकल होने लगा है। शायद यह ग्लोबल वॉरमिंग का ही […]

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अंग्रेज़ी मुल्क में कितना रोमांस है?

जब कभी भारत और ब्रिटेन की तुलना हो तो एक मज़ेदार बात कही जाती है, ‘इन ब्रिटेन यू कैन किस इन पब्लिक बट कैन नॉट पिस इन पब्लिक, इन इंडिया यू कैन पिस इन पब्लिक बट कैन नॉट किस इन पब्लिक’. वैसे मात्र एस्थेटिक्स के स्तर पर देखा जाए तो चुम्बन का दृश्य काफ़ी मनोहर और आकषर्क होता है और […]

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रूह को छूने वाला संगीत

लन्दन से बर्मिंघम आए हुए कुछ दिन ही हुए थे। बर्मिंघम में मेरे एक अंग्रेज़ साथी एडम भारतीय संगीत में थोड़ी बहुत रुचि रखते थे। पण्डित रविशंकर को उन्होने सुन रखा था। आशा जी के कुछ एल्बम भी उन्होने सुने थे। एक दिन बातचीत में मैने उनसे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का ज़िक्र किया। मैने उनसे कहा कि आप ज़ाकिर हुसैन […]

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व्यंग की चुनौतियाँ क्या हैं?

जनवरी के महीने में दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले में था। वहाँ किसी साहित्यिक चर्चा में व्यंग की चुनौतियों पर विमर्श हो रहा था। मुझे भी अपने विचार रखने का अवसर मिला। व्यंग की तमाम चुनौतियों के बीच जो सबसे बड़ी चुनौती मुझे नज़र आती है वह है उसके कटाक्ष के प्रति सहिष्णुता या सहनशीलता की कमी। व्यंग चुभता है, […]

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मन के कैनवास पर मौसम की रचनाएँ

इन दिनों ब्रिटेन कड़कती सर्दी और भीषण बर्फबारी की चपेट में है। उस पर एमा (अटलांटिक महासागर से उठने वाला तूफ़ान) का क्रोध कहर बरपा रहा है। जीवन अस्त-व्यस्त हो रखा है, लोग-बाग घरों में दुबके पड़े हैं और आधे ब्रिटेन में यातायात ठप्प पड़ा हुआ है। जो लोग हिमपात से पहले या हिमपात के बावजूद सड़कों पर अपने वाहन […]

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