हिंदी में सोचता हूँ, हिन्दी में लिखता हूँ। जो कुछ भी नियति या प्रकृति लिखवा देती है लिख देता हूँ - मतलब मैं तो माध्यम हूँ, मात्र कलम का एक परिष्कृत स्वरूप हूँ, वस्तुतः लिखता तो कोई और ही है।

गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन – 2

‘गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन’ पर सत्य भाई की बात मुझे लगता है अधूरी रह गयी। हिन्दी का एक दुर्भाग्य यह है कि धीरे-धीरे वादों से जुड़े आलोचक हिन्दी साहित्य की दशा-दिशा तय करने लगे। प्रेमचन्द, रेणु, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, शिवानी, आचार्य चतुरसेन, नरेन्द्र कोहली (रामकथा तक) को आप कहाँ रखेंगे? क्या इनका […]

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साहित्यिक पत्रिका के लिए रचनाएँ आमंत्रित हैं

साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘पर्तों की पड़ताल के लिए सभी विधाओं में रचनायें आमंत्रित हैं। रचनायें आप sulabhagnihotri.kan@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। रचना के साथ अपना चित्र, संक्षिप्त परिचय, डाक का पूरा पता और मोबाइल नं0 अवश्य भेजें। यदि उचित समझें तो पत्रिका की सदस्यता लेकर सहयोग करें। अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें – सुलभ अग्निहोत्री 9839610807

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