Literature Life

स्लीप पैरालिसिस

मैं भूल जाउंगी कि मैंने क्या कुछ लिखा था तुम भी भूल जाना कि तुमने क्या पढ़ा । मैं बहुत दिनों के लिए मर गयी थी। मेरा दोबारा जन्म हुआ है। एक लंबे समय से नींद जाने कौन सी रंजिश निभा रही है।अंदर एक चुप्पा सा पसरा हुआ है।एकाध घंटे को आँख लग भी जाए तो सिहरन भर देने वाले […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ५ – अंतिम)

– रीगन तेरा तानाशाही – नहीं चलेगी नहीं चलेगी – अमरीका तेरा तानाशाही – नहीं चलेगी नहीं चलेगी – शोम्राजबाद… – मुरदाबाद मुरदाबाद – सोरबाजनिक क्षेत्रों का निजीकरण पे – रोक लगाओ रोक लगाओ…… सुल्तान को कुछ पल्ले तो पड़ नहीं रहा था, तब भी वह भी चीख चीख कर नारे लगा रहा था। जब दादा नारे लगवा रहे होंतो […]

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अपनी ख़लवत में भटकते हुए

देर रात ‘ग्रीन टी’ का प्याला लिए बालकनी में फालतू सा खड़े रहना जैसे अपने आप को खोजना। यूकिलिप्टस की विरल कतारों के पीछे ऊँचे पुल पर तेज़ी से गुज़रती हुई आख़िरी मेट्रो रेल एक चमचमाती तूल -तवील लक़ीर सी दिखती है। इतनी रात भी खाक़ उड़ाती गर्म हवा खुली बाँहों और चेहरे पर थपेड़ों की तरह पड़ रही है। […]

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शब्दों की भी सीमाएँ हैं

शब्द बांध न सकें तुम्हें भाव लांघ न सकें तुम्हे कहने की पर आशायें है शब्दों की भी सीमायें हैं ।   सब भाव तुम्हारे चेहरे के निष्कपट से हैं सब झलक रहे आंखों के बीच तैरते से कुछ ख्वाब तुम्हारे छलक रहे कहने को मैं कह दूं इतना इस दुर्गम जीवन अरण्य में हम साथ तुम्हारे आये हैं शब्दों […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ४)

अब देखो कैसा यूनिटी दिख रहा है – कॉमरेड मुखर्जी ने पुलकित होते हुए सुल्तान सिंग से कहा। सुलतान सिंग ने कहा- हां दादा, दिख तो रहा है। मैं येइच्च तो चाहता था। शाबास कॉमरेड, बहुत अच्छा काम किया तुमने। -कॉमरेड मुखर्जी ने सुल्तान की पीठ ठोकी। लेकिन एक बात बताओ दादा, ये लाल झंडा यूनिटी कैसे है ? – […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ३)

– ये सब पैसे वालों को खडयंत्र हैं। -मुखर्जी दादा ने चारमिनार का कश खींचते हुए कहा। सुलतान सिंग सिलाई मशीन की पैडल धुके जा रहा था। किचकिच किचकिच करती हुई सुई धकाधक टांके लगाए जा रही थी। कपड़ा पीछे की ओर सरकता जा रहा था। सुलतान सिंग ने अचानक पैडल रोक कर, सुई का लीवर उठाया और कपड़ा अपनी […]

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क्या आप भूत-प्रेत में विश्वास करते हैं?

“डू यू बिलीव इन घोस्ट्स?” मेरी सहकर्मी एंजेला ने मुझसे पूछा। “वाय?” मुझे उसके इस आकस्मिक प्रश्न पर थोड़ा आश्चर्य हुआ। अचानक यह भूत-प्रेतों का प्रसंग कहाँ से निकल आया। “घोस्ट होते हैं” पास बैठे एक अन्य सहकर्मी स्टीव ने कहा। अब तो मेरा आश्चर्य और भी बढ़ा। अंग्रेज़ों के बारे में मेरी धारणा यही थी कि वे वैज्ञानिक मानसिकता […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग २)

न तो कभी जगतार अकेले दिखा, न बलबीर। जब भी दिखे साथ दिखे। साथ-साथ साइट जाते। साथ-साथ लौटते। यहां तक कि साथ-साथ दिशा मैदान भी हो आते। जगतार सिंह थे तो रिगर लेकिन थोड़े दुबले थे। उम्र 55 को पार कर गई थी। बलबीर सिंग 35-40 साल का हट्टा-कट्टा जवान। चौड़ा और कसा हुआ चेहरा। उस पर तनी हुई मूंछें। […]

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कहानी – आक् थू

उसकी आंखें याद आती हैं। गरमी के दिन थे। आंखें चौंधिया देने वाली धूप। सड़कें सूनीं थीं। मैं मेन गेट से बाहर निकल रहा था और वह भीतर आ रही थी। हरी सलवार में। पीली चुनरी सिर पर। मुझे देखा तो मुस्कुरा कर सिर हिलाया। लगा जैसे धूप में बिजली कौंध गई हो। तेज रौशनी के कारण मेरी मिंची हुई […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग १)

सुल्तान सिंग…ये नाम सुनकर आपने उसके बारे जैसी कल्पना की होगी, वह उसके ठीक उलट था. न तो उसकी कोई सल्तनत थी, और न डाकुओं जैसा कोई इलाका. न ही पहलवानों जैसी काया. पापड़ जैसा मुंह था उसका, लौकी जैसा शरीर. उस पर सफेद बनियान, जो पता नहीं कितनी पुरानी रही हो. पीली-सी और यहां-वहां फटी हुई भी. ढीला पाजामा. […]

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