मन के कैनवास पर मौसम की रचनाएँ

इन दिनों ब्रिटेन कड़कती सर्दी और भीषण बर्फबारी की चपेट में है। उस पर एमा (अटलांटिक महासागर से उठने वाला तूफ़ान) का क्रोध कहर बरपा रहा है। जीवन अस्त-व्यस्त हो रखा है, लोग-बाग घरों में दुबके पड़े हैं और आधे ब्रिटेन में यातायात ठप्प पड़ा हुआ है। जो लोग हिमपात से पहले या हिमपात के बावजूद सड़कों पर अपने वाहन उतार लाए थे वे रास्तों में अटके पड़े हैं। गाड़ियों के इंधन खत्म हो रहे हैं, हीटर बंद पड़े हैं, सवारियाँ ठिठुर रही हैं और कुछ गर्भवती औरतें कड़कती सर्दी में वाहनों के भीतर बच्चे भी जन रही हैं। मनुष्य कितना भी उन्नत और शक्तिशाली हो जाए, प्रकृति के आगे बौना ही रहता है। मगर जो प्रकृति की सत्ता को स्वीकार लें वे उसके बिगड़े मिज़ाज का भी खूब आनंद लेते हैं। इस भीषण हिमपात में भी ऐसे उत्साही लोगों की कमी नहीं है जो स्नोबोर्डिंग या स्कीइंग करके काम पर निकल रहे हैं। यूरोपीय लोग हम भारतीयों की तुलना में कहीं अधिक एडवेंचरपसंद होते हैं। इसके लिए शायद हमारे और इनके इतिहास के बीच का फ़र्क ज़िम्मेदार है। जब हम समुद्र और नदियों के तट पर उन्नत सभ्यताएँ बसा रहे थे तब ये बर्फीले पहाड़ों और जंगलों में भटक रहे थे।

वर्ष 2000 में मैं ब्रिटेन आया था। उस वर्ष मैंने जीवन में पहली बार हिमपात देखा था। रुई के फोहों सी आसमान से टपकती बर्फ, ऐसा लग रहा था मानो चाँद पर बैठी सूत कातती बुढ़िया अचानक से रुई धुनने बैठ गई हो। चारों ओर बर्फ की सफेद चादर सी बिछी दिखाई दे रही थी। समझ नहीं आ रहा था कि उसे निहारूँ, उसपर कविता करूँ या दो वर्ष के बेटे की उँगली थाम उस सफेद चादर को रौंदते हुए उसपर जाकर स्नोमैन का पुतला बनाऊँ। जीत आखिर बेटे की ही हुई। कवि हृदय पीछे रह गया। बर्फीली रात में चाँदनी, बर्फ की चादर से टकराकर खूब चमकती है। रात देर तक आँगन में बैठकर उस रौशनी को निहारता रहा। आँगन में एक आलूबुखारे का पेड़ भी था, जिस पर लाल आलूबुखारे लदे रहते। बैठे-बैठे कुछ शब्द इन पंक्तियों में बैठ गए –

सर्द रात में बर्फ के बिस्तर पर,

लोटती बेलिबास चाँदनी है।

छुपके पत्तियों में एक आलूचा,

शर्म से लाल हुआ जाता है।

मगर बर्फीली रातों से यह रोमांस चंद रोज़ ही रहा। फिर बर्फबारी से पैदा हुई दिक्कतें तंग करने लगीं। उसपर कुछ दिनों में ही सफेद बर्फ का हुस्न मुरझाकर ब्लैक आइस में बदल गया। फुटपाथ फिसलन भरे हो गए। हनीमून खत्म हुआ, किच-किच शुरू हुई। पहले पहल जो हिमपात रोमांस जगा रहा था वही कुछ दिनों में अवसाद पैदा करने लगा। मौसम का इंसान के मिज़ाज पर असर उसके अनुभवों के अनुरूप बदलता रहता है और अक्सर इन अनुभवों को तराशने कई पुराने अनुभवों के स्पर्श और प्रहार भी चले आते हैं। किसी एक शाम का अनुभव कई पुरानी शामों के अनुभवों से बना होता है। किसी एक बारिश की पहचान किसी पुरानी मुलाकात, किसी गीत या कविता की कोई पंक्ति या किसी फिल्म के किसी दृश्य की यादों में ढल जाती है। हमारे लिए मौसम का अनुभव काफी हद तक तो उन लेखकों, गीतकारों और कलाकारों द्वारा रचा जाता है जो मौसम के किसी क्षणिक असर को लोकमानस में स्थाई रूप से दर्ज़ कर जाते हैं। मौसम हमारे लिए सिर्फ वही मौसम नहीं होता जो प्रकृति हमारे बाहर रचती है, बल्कि वह भी होता है जो हम अपने भीतर अपनी यादों और अनुभवों के कैनवास पर रचते हैं।

विश्व की हर भाषा के साहित्य की तरह ही अंग्रेज़ी साहित्य में भी मनुष्य के भीतर रचे इस मौसम को बाहरी मौसम के मानवीयकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया है। अंग्रेज़ी साहित्य में इस मानवीयकरण को ‘पथेटिक फैलसी’ कहा जाता है। हालाँकि यहाँ पथेटिक का अर्थ दीन या दयनीय न होकर ‘किसी अन्य में भावनाएँ डालना’ है, जैसे कि ‘मौसम में मानवीय भावनाएँ डालना’।

प्रसिद्ध ब्रिटिश उपन्यासकर एमिली ब्रांटी का उपन्यास ‘वदरिंग हाइट्स’ पथेटिक फैलसियों से भरा हुआ है। उपन्यास का नाम स्वयं ही एक पथेटिक फैलसी का उदाहरण है। वदरिंग का अर्थ होता है, प्रचंड गर्जना के साथ बहना (हवा या तूफ़ान का)। ‘वदरिंग हाइट्स’ में मौसम के उग्र और उत्तेजित रूप को वहाँ के निवासियों के उग्र स्वभाव को दर्शाने में प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। उपन्यास में कई ऐसे प्रसंग हैं जहाँ घटनाओं के वृत्तांत मौसम के बिगड़े मिज़ाज के प्रतीकों के ज़रिये दिए गए हैं।

अंग्रेज़ों का मौसम से लगाव बहुत गहरा है। उनका शायद ही कोई दिन मौसम पर चर्चा किए बिना गुज़रता होगा। ब्रिटेन के साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास को अंग्रेज़ों के मौसम के बारे में बदलते ख़याल और नज़रिये के ज़रिये कहा जा सकता है। सदियों से लेखकों, कवियों और चित्रकारों ने ब्रिटेन के मौसम और यहाँ की आबोहवा को कितने अलग-अलग नज़रिये से देखा है और कितने अलग-अलग ढंग से महसूस किया है उसका पूरा ब्यौरा 2015 में आई एलेक्सांड्रा हैरिस की किताब ‘वेदरलैंड : राइटर्स एंड आर्टिस्ट्स अंडर इंग्लिश स्काइज़’ में मिलता है। इस पुस्तक में हैरिस ब्रिटेन के पिछले 1100 वर्षों के साहित्यिक इतिहास का विश्लेषण करते हुए बताती हैं कि लगभग एक से मौसम और एक सी आबोहवा को अलग-अलग काल के लेखकों और कवियों ने कितने अलग-अलग ढंग से अनुभव किया है और उसका कितनी अलग-अलग संज्ञाओं और प्रतीकों में वर्णन किया है। हैरिस, एंग्लो-सैक्सन दौर में लिखे महाकाव्य ‘द वान्डरर’ (11वीं शताब्दी) से उदाहरण लेते हुए लिखती हैं कि एंग्लो-सैक्सन साहित्य, कठोर सर्द मौसम में निर्वासन में बीत रहे एकाकी और असुरक्षित जीवन का ही अधिक चित्रण करता है। उस दौर के कवि बाहरी प्रकृति में भी अपने भीतर की उदासी और एकाकीपन की झलक ही देखते हैं। यदि वे प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन भी करते हैं तो उसमें किसी जवाहर या मणिरत्न की तरह चमकते बर्फ के टुकड़े का ही ज़िक्र होता है। यदि सूर्य का ज़िक्र होता भी है तो उसे ‘कैंडल ऑफ़ स्काई’ (आकाश के दिये) की संज्ञा दी जाती है, एक पिघलती मोमबत्ती की दुर्बल लौ के रूप में। हैरिस लिखती हैं कि ब्रिटेन की गर्मियाँ शायद उन दिनों भी उतनी ही गर्म होती हों जितनी कि आज होती हैं, मगर एंग्लो-सैक्सन साहित्य में उनका कोई ज़िक्र नहीं मिलता।

ब्रिटिश साहित्य में मध्ययुगीन काल बसंती हवाओं के गर्म झोंके लेकर आता है। कोंपलों, कलियों और कोयल के गीत इसी दौर में लिखे गए। 17वीं शताब्दी के साहित्य में शायद ही कहीं वर्षा या भीगे मौसम का ज़िक्र मिलता है। 19वीं शताब्दी का विक्टोरियन युग अंग्रेज़ी साहित्य का एक नया युग लेकर आता है। वर्षा, घने बादल और धुंधले और उदास मौसम का, जिसे ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप लगी फैक्ट्रियों की चिमनियों से उठता धुआँ और भी मलिन और उदास बनाता है। हैरिस वर्जिनिया वुल्फ़ के उपन्यास ‘ऑर्लैंडो’ के एक दृश्य का ज़िक्र करती हैं – 18वीं शताब्दी की अंतिम रात को उपन्यास की नायिका लन्दन के अपने घर की खिड़की से बाहर झाँकती है जहाँ उसे शीतल, स्वच्छ और निर्मल हवा में शहर के आलीशान गुम्बदों का भव्य दृश्य दिखाई देता है। बाहर शांति और निरभ्रता है। मगर अचानक ही उसे एक त्वरित अवसाद सा आता दिखाई देता है। कुछ ही क्षणों में उग्र मेघों का कोलाहल पूरे शहर को घेर लेता है। चारों तरफ अँधेरा, चारों ओर भ्रम और दुविधा। 18वीं शताब्दी समाप्त होती है, 19वीं शताब्दी आरम्भ होती है।

हैरिस लिखती हैं कि थर्मामीटर और उसका तापमान हर किसी के लिए एक ही होता है मगर मौसम का अनुभव तापमान के अंक जैसा स्थिर नहीं होता, वह अलग-अलग समय में अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होता है। समय के साथ हमारी परिस्थितियाँ भी बदलती हैं। मौसम इन बदली परिस्थितियों से नए संबंध बनाता है और वे संबंध हममें मौसम के नए अनुभव पैदा करते हैं।

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