लेखन में गुलशन नंदा होना

लेखक मित्र सुधीर मौर्य से विगत दिनों हुई बातचीत में गुलशन नंदा जी का जिक्र निकल आया। मैं अक्सर सोचता हूँ कि नंदा जी जैसी ऊँचाई छू पाना भूत, भविष्य और वर्तमान में भी संभव नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहा रहा हूँ? कारण यह है कि गुलशन नंदा जी के लेखकीय दौर में ही उनके नाम से नकली और […]

Read more

स्लीप पैरालिसिस

मैं भूल जाउंगी कि मैंने क्या कुछ लिखा था तुम भी भूल जाना कि तुमने क्या पढ़ा । मैं बहुत दिनों के लिए मर गयी थी। मेरा दोबारा जन्म हुआ है। एक लंबे समय से नींद जाने कौन सी रंजिश निभा रही है।अंदर एक चुप्पा सा पसरा हुआ है।एकाध घंटे को आँख लग भी जाए तो सिहरन भर देने वाले […]

Read more

अपनी ख़लवत में भटकते हुए

देर रात ‘ग्रीन टी’ का प्याला लिए बालकनी में फालतू सा खड़े रहना जैसे अपने आप को खोजना। यूकिलिप्टस की विरल कतारों के पीछे ऊँचे पुल पर तेज़ी से गुज़रती हुई आख़िरी मेट्रो रेल एक चमचमाती तूल -तवील लक़ीर सी दिखती है। इतनी रात भी खाक़ उड़ाती गर्म हवा खुली बाँहों और चेहरे पर थपेड़ों की तरह पड़ रही है। […]

Read more

मंटो के जन्मदिन पर उनके अफ़साने पर एक छोटी सी रपट

आज मेरे सबसे प्यारे अफ़साने निगार सादत हसन मंटो का जन्मदिन है. मैंने उर्दू में उनकी कहानियाँ पढ़कर कहानी लिखना सीखी है. मंटो अपने ज़माने से आगे थे, जिसकी सज़ा मरते दम तक उन्हें मिलती रही. दक्षिणी एशिया के वे सबसे महान कहानीकारों में एक हैं. अगर नये लेखकों को मौक़ा मिले तो मंटो के अफ़साने ज़रूर पढ़ें. मंटो की […]

Read more

मिसेज़ सिंह का स्मार्टफोन

मिसेज सिंह आजकल रौनक-ए-बज़्म हैं,उनके चेहरे का नूर गज़ब का है/ उनकी बढ़ती उम्र मानो थम सी गई है/ लोगबाग उनकी बढ़ती उम्र और चढ़ते जादू का सीक्रेट पूछते हैं तो वो मुस्कराकर रह जाती है/ उनके वय की महिलाएं जहां बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी हांफ रही हैं वे सब शुगर और बीपी जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं वहीं […]

Read more

क्यों प्रेम की शुरुआत पुरुष करते हैं और उसे निभाती महिलाएँ हैं?

डॉ. अबरार मुल्तानी कृत ‘क्यों प्रेम की शुरुआत पुरुष करते हैं और उसे निभाती महिलाएँ हैं? : स्त्री-पुरुष संबंधो को मधुर बनाने वाली पुस्तक’ का एक विहंगावलोकन।   “खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार । जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार ।।” पुस्तक की प्रेरणा पवित्र कुरआन की ये पंक्तियाँ हैं : ‘पति-पत्नी इक-दूजे के लिबास हैं […]

Read more

कथा संरचना: कथावाचक (नैरेटर) की भूमिका

अक्सर पहली पंक्ति से ही स्पष्ट हो जाता है कि कथावाचक है कौन? अमूमन लेखक स्वयं ही कथावाचक होते हैं। यही सुलभ भी है। पर लेखक कथा में हों, यह आवश्यक नहीं। अगर लेखक कथा में होते भी हैं, तो उनकी भूमिका नायक की तरह लगभग नहीं होती। वो तटस्थ रूप से कथा कहते रहते हैं, पात्रों से बतियाते हैं […]

Read more

स्वागत करें प्रवीण झा का

‘भूतों के देश में’ के मायावी लेखक डॉ प्रवीण झा अब ‘लिटरेचर लाइफ’ में भी निरंतर अपने शब्दों के इंद्रजाल बुन रहे हैं. किंडल रीडिंग को प्रोत्साहन देने वाले प्रवीण झा हिंदी और अंग्रेज़ी, दोनों ही भाषाओँ पर सामान अधिकार रखते हैं और हम हिंदी के लेखकों के बीच नॉर्वेजियन भाषा पर तो एकाधिकार ही रखते हैं. आइए स्वागत करें, प्रवीण […]

Read more

वर्ष 2017 – 18 में प्रकाशित सर्वाधिक पसंद पुस्तकें

लिटरेचर लाइफ की ओर से हमने फेसबुक पर पाठकों से कहा था कि वे वर्ष 2017-18 में प्रकाशित हुई हिंदी की किताबों में से अपनी पसंद की पाँच किताबें बताएँ, सबसे अधिक पसंद आने वाली किताब से क्रम आरंभ करते हुए. पाठकों के द्वारा दी गई सूचियों से हमने अपना अल्गोरिदम इस्तेमाल कर वर्ष 2017-18 में प्रकाशित सर्वाधिक पसंद की जाने […]

Read more

आविष्कार

ये लेख मैंने खासतौर पर literature.life के लिए लिखा है। कृपया सभी महानुभवी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें। ..कि मैंने १०००० तीर में दो निशाने पे लगाये या पाँच??? ???☺☺   कल रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। दिमाग किसी उलझन में भटक रहा था। मैंने सोचा…   आबादी कितनी बढ़ रही है। हवा में कितना […]

Read more
1 2 3 4