शब्दों की भी सीमाएँ हैं

शब्द बांध न सकें तुम्हें भाव लांघ न सकें तुम्हे कहने की पर आशायें है शब्दों की भी सीमायें हैं ।   सब भाव तुम्हारे चेहरे के निष्कपट से हैं सब झलक रहे आंखों के बीच तैरते से कुछ ख्वाब तुम्हारे छलक रहे कहने को मैं कह दूं इतना इस दुर्गम जीवन अरण्य में हम साथ तुम्हारे आये हैं शब्दों […]

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अखबार – एक कविता

आशावान हूं, सपनों में खुशियां अपार देख लेता हूं! बहुत खुश होता हूं कभी तो अखबार देख लेता हूं! क्या होता है अखबारों में? घपलों और घोटालों की खबरें ! बिजली पानी और निवालों की खबरें, स्याह चेहरे और सफेद रुमालों की खबरें, दो धर्मों के प्रेम में ज़हर घोलने वालों की खबरें, भ्रम नहीं पालता मगर दुनिया फिर भी […]

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सड़क के बाईं ओर

  बहुत पहले एक वरिष्ठ मित्र ने मुझे एक पुरानी साइकिल दी थी ताकि मुझे उनके प्रेस कार्यालय तक आने में मुझे आसानी हो। उसका उपयोग, माफ करेंगे,  मैंने अर्थार्जन के उपक्रम में भी किया। बरसों बाद वे मुझे फेसबुक पर मिले हैं । अपनी भावना रोक नहीं पाया और एक कविता कर डाली, बता नहीं सकता कितना सफल हुआ […]

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कविता:जिंदगी का सफर

चेहरे के भीतर क्या छुपा है? किसे पता देखने वाले को तो वह दीखता है जिसे हम दिखाना चाहते है। एक उन्मुक्त हंसी के भीतर कितनी उदासियों की भीड़ है इसे समझना आसान नहीँ है भीड़ को आखिर कौन समझ पाया है? लोग टूटे हुए हैं और सपनों को जोड़ना चाहते हैं गोयाकि चेहरा उदास है और आईने को हंसाना चाहते हैं! जिंदगी […]

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गज़लों में : एक गजल: दिलीप कुमार दर्श

लगा महफिल अब गुल न खिलाओ गज़लों में । आज सड़कों से भी आंखें मिलाओ गज़लों में ।   अभी भी पीने का पानी नहीं मयस्सर जिनको उन्हें भी आह भर  पानी  पिलाओ गज़लों में ।   पेड़ है रोटियों का , छांह में  वे  हैं  भूखे  बैठे इसकी डालों को भी कोई हिलाओ गज़लों में ।   कुछ भी […]

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