केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ५ – अंतिम)

– रीगन तेरा तानाशाही – नहीं चलेगी नहीं चलेगी – अमरीका तेरा तानाशाही – नहीं चलेगी नहीं चलेगी – शोम्राजबाद… – मुरदाबाद मुरदाबाद – सोरबाजनिक क्षेत्रों का निजीकरण पे – रोक लगाओ रोक लगाओ…… सुल्तान को कुछ पल्ले तो पड़ नहीं रहा था, तब भी वह भी चीख चीख कर नारे लगा रहा था। जब दादा नारे लगवा रहे होंतो […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ४)

अब देखो कैसा यूनिटी दिख रहा है – कॉमरेड मुखर्जी ने पुलकित होते हुए सुल्तान सिंग से कहा। सुलतान सिंग ने कहा- हां दादा, दिख तो रहा है। मैं येइच्च तो चाहता था। शाबास कॉमरेड, बहुत अच्छा काम किया तुमने। -कॉमरेड मुखर्जी ने सुल्तान की पीठ ठोकी। लेकिन एक बात बताओ दादा, ये लाल झंडा यूनिटी कैसे है ? – […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग ३)

– ये सब पैसे वालों को खडयंत्र हैं। -मुखर्जी दादा ने चारमिनार का कश खींचते हुए कहा। सुलतान सिंग सिलाई मशीन की पैडल धुके जा रहा था। किचकिच किचकिच करती हुई सुई धकाधक टांके लगाए जा रही थी। कपड़ा पीछे की ओर सरकता जा रहा था। सुलतान सिंग ने अचानक पैडल रोक कर, सुई का लीवर उठाया और कपड़ा अपनी […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग २)

न तो कभी जगतार अकेले दिखा, न बलबीर। जब भी दिखे साथ दिखे। साथ-साथ साइट जाते। साथ-साथ लौटते। यहां तक कि साथ-साथ दिशा मैदान भी हो आते। जगतार सिंह थे तो रिगर लेकिन थोड़े दुबले थे। उम्र 55 को पार कर गई थी। बलबीर सिंग 35-40 साल का हट्टा-कट्टा जवान। चौड़ा और कसा हुआ चेहरा। उस पर तनी हुई मूंछें। […]

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केवल कृष्ण का लघु उपन्यास – बोगदा (भाग १)

सुल्तान सिंग…ये नाम सुनकर आपने उसके बारे जैसी कल्पना की होगी, वह उसके ठीक उलट था. न तो उसकी कोई सल्तनत थी, और न डाकुओं जैसा कोई इलाका. न ही पहलवानों जैसी काया. पापड़ जैसा मुंह था उसका, लौकी जैसा शरीर. उस पर सफेद बनियान, जो पता नहीं कितनी पुरानी रही हो. पीली-सी और यहां-वहां फटी हुई भी. ढीला पाजामा. […]

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