डार्क नाइट – मीरा पार्ट 2

होली प्यार और रंगों का त्योहार

हम हिन्दुस्तानियों की बहुत सारी खूबियों मैं एक खूबी ये है कि हम घर से कितनी भी दूर रहे, मगर अपना त्योहार मनाना नहीं भूलते और  बात अगर होली जैसे त्योहार की हो तो क्या कहने .

पिछले कुछ सालो से ‘काम’ अपने नोट्टिंग हिल वाले बंगले पे होली का आयोजन करता था.

‘तुम्हे पता है काम मुझे होली का त्योहार बचपन से ही पसंद नहीं है.’ मीरा ने चाय की सिप लेते हुए कहा .

‘हम्म..’ अपने मोबाइल फोन मैं आँख गड़ाए हुए काम ने जबाब दिया .

‘मैं तुमसे कुछ कह रही हूँ, और तुम हो की फ़ोन पे लगे हो.’ मीरा ने खीज कर कहा .

‘अरे –अरे गुस्सा मत करो, कुछ लोगो को इनवाइट कर रहा था होली पे आने को, लो अब रख दिया फोन….तो तुम क्या कह रही थी, तुम्हे होली जैसा त्यौहार पसंद नहीं है, इसका मतलब ये हुआ कि तुम्हें अब तक प्यार नहीं हुआ है?’

‘होली और प्यार का क्या संबंध?’ मीरा ने कहा .

‘होली और प्यार का बहुत पुराना संबंध है, भगवान कृष्ण के काल से.’

‘वो कैसे?’

‘पूतना द्वार जहरीला दूध पिलाने के कारण जब कृष्ण का शरीर नीला पड़ गया तब वो एक दिन परेशान होकर अपनी माँ यशोदा के पास गए और कहा ये गोरी राधा और उसकी सखिया अब मुझसे प्यार नहीं करेगी, क्योंकि मेरा रंग नीला है और उनका गोरा. तब उनकी माँ ने उनसे कहा तुम्हें जो भी रंग पसंद है उससे राधा का चेहरा रंग दो, फिर देखो.’

‘अच्छा तो इसलिए तुम सभी अंग्रजो को रंग कर अपने रंग में मिला लेते हो?’ हँसते हुए मीरा ने कहा .

‘हाँ कुछ –कुछ ऐसा ही समझो.’

‘बातें बहुत हो गयी चलो अब कुछ काम कर लिया जाए ,कुछ देर में लोग आने वाले ही होंगे.’

लान में कलर के डब्बों को सजाते हुए मीरा ने पूछा, ‘काम तुमने ये बताया ही नहीं तुम्हे कौन सा रंग पसंद है?’

‘नीला.’

‘नीला ही क्यों?’

‘क्योंकि ये आत्मा और प्यार दोनों का रंग है.’

— रत्नाकर मिश्र

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