करी कथा – अंग्रेज़ी ज़ुबान पर हिन्दुस्तानी ज़ायका

वह लन्दन में मेरी पहली शाम थी। हौलबोर्न इलाके के जिस सर्विस अपार्टमेंट में मैं ठहरा था उसमें हमारी कम्पनी के कई और लोग भी ठहरे हुए थे। पहले ही दिन उन सबसे अच्छी मित्रता हो गई। शाम ढलते ही हमने निर्णय किया कि उस रात हम पश्चिमी खाना न खाकर हिंदुस्तानी खाना ही खायेंगे। एयरफ्रांस की फ्लाइट में मिले बेज़ायकेदार खाने से जिस तरह मुंह का स्वाद बिगड़ा था, मैं कोई रिस्क भी नहीं लेना चाहता था। सभी साथी मिलकर किसी अच्छे इंडियन करी रेस्टोरेंट की तलाश में निकल पड़े।

लन्दन में इंडियन रेस्टोरेंट ढूँढना मुश्किल नहीं है। तकरीबन हर दूसरी या तीसरी सड़क पर एक हिंदुस्तानी रेस्टोरेंट मिल ही जाता है। थोड़ी दूर चल कर ग्रेट क्वीन स्ट्रीट पहुँचते ही हमारी नज़र ‘भट्टी इंडियन क्विज़ीन’ पर पड़ी। भट्टी नाम ने ही घर की पंजाबी रसोई की याद ताज़ा कर दी। भूख ज़ोरों से लगी थी और पंजाबी रसोई का ख़याल आते ही मुंह में पानी भी अच्छा-खासा भर आया। हम लपक कर रेस्टोरेंट के भीतर घुसे।

रेस्टोरेंट के मालिक, भट्टी साहब लगभग पचास वर्ष के काफी सज्जन से दिखने वाले सिख पुरुष थे। उन्होने पंजाबी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया। जब हमने उन्हे यह बताया कि हम हाल-फिलहाल में ही भारत से आए हुए हैं तो उनकी आत्मीयता और भी बढ़ गई। हमारी बात-चीत भी फॉर्मल से इनफॉर्मल हो गई और एक छोटा सा मज़ाक भी उन्होने मेरी इकहरी काया पर कर डाला। बात-चीत के दौरान जब हमने उन्हे यह बताया कि हम किसी आईटी प्रॉजेक्ट पर लन्दन आए हुए हैं और कुछ महीने यहाँ ठहरने वाले हैं तो उन्होने तुरंत ही एक अधिकारपूर्ण सलाह दे डाली, “लन्दन बहुत महंगा शहर है। आज तो ठीक है मगर कल से खुद ही खाना बनाने का इंतज़ाम कर लो। इस तरह होटलों में खाकर अपना पैसा बर्बाद मत करो” (वैसे ब्रिटेन में रेस्टोरेंट को होटल नहीं कहा जाता। रेस्टोरेन्ट को होटल कहने की परंपरा शायद भारतीय उपमहाद्वीप में ही है) । भट्टी साहब की इस सलाह पर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। शोले फिल्म का वह डायलॉग याद आ गया कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या? मगर कुछ समय ब्रिटेन में रहने के बाद यह महसूस हुआ कि भट्टी साहब कोई अपवाद नहीं थे। ग्राहकों को उचित सलाह देना ब्रिटिश बिज़नेस एथिक्स का एक अंग है। यह अलग बात है कि भट्टी साहब की सलाह में भारतीय आत्मीयता और अधिकार भी मिले हुए थे।

रेस्टोरेन्ट के भीतर माहौल खुशनुमा था। एक ओर भारतीय व्यंजनों की सुगंध हवा में बिखरी हुई थी और दूसरी ओर वाइन या ठंडी बियर के गिलास थामे एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले बैठे कई प्रेमी-युगल माहौल को थोड़ा सा रूमानी भी बना रहे थे। उसी वक्त मैने गौर किया कि बॅकग्राउंड में जगजीत सिंह की गाई यह ग़ज़ल भी बज रही थी, ‘झूम के जब रिंदों ने पिला दी, शेख़ ने चुपके-चुपके दुआ दी’। लम्बे सफर की थकान उतारने के लिये जैसा वातावरण सोच रखा था, वैसा ही मौजूद था, ‘जैसा था ख्वाब वैसी थी ताबीर हू-ब-हू’।

वेटर ने लाकर सामने मेनूकार्ड रखे और मैं झटपट एक मेनूकार्ड उठाकर उसमें अपनी पसंदीदा डिशें ढूंढने लगा। मगर उसमें लिखी कई डिशों के नामों ने मुझे उलझन में डाल दिया। बाल्टी, जालफ्रेज़ी, विंडलू, फ़ाल, धनसक जैसे व्यंजनों के नाम मैने पंजाब तो क्या उत्तर या मध्य भारत में कहीं नहीं सुने थे। मैने अंदाज़ लगाया कि वे शायद भारत के उन हिस्सों से होंगे जहाँ जाने का अवसर मुझे तब तक नहीं मिला था। मेनूकार्ड की डिशों में जो डिशें मुझे ठीकठाक लगीं उनमें एक थी, ‘चिकन टिक्का मसाला’। अंदाज़ लगाना आसान था कि वह ‘चिकन टिक्का’ को तीखे मसालों में मिला कर बनाई गई कोई डिश होगी। हालांकि कुछ समय बाद पता चला कि ‘चिकन टिक्का मसाला’ ब्रिटेन में ईज़ाद की गई एक थोड़ी माइल्ड और क्रीमी डिश थी जिसे कुछ सालों बाद सन 2001 में ब्रिटेन की नेशनल डिश भी घोषित किया गया था।

खैर खाना लज़ीज़ था और ठंडी किंगफिशर बियर के साथ हमने उसका लुत्फ भी खूब लिया। साथ ही आसपास बैठे गोरे व्यक्तियों को मसालेदार भारतीय व्यंजनों को चटकारे मार कर खाते देख ब्रिटेन की ‘करी कल्चर’ में उत्सुकता भी काफी बढ़ी।

भारतीय भोजन का ब्रिटेन पर असर तभी होने लगा था जब अंग्रेज़ों ने भारत में पहला कदम रखा। ठंडे और रूखे पश्चिमी युरोप से आए अंग्रेज़ों को भारतीय संस्कृति की चमक बहुत भाई। फिर चाहे वे रंग-बिरंगे चटकीले कपड़े हों या मसालेदार चटखरे व्यंजन, सभी कुछ भारतीय उन्हें लुभाने लगा। प्रसिद्ध लेखक विलियम डारलिम्पल ने अपने उपन्यास ‘वाइट मुग़ल’ में बड़ी खूसूरती से वर्णन किया है कि किस आतुरता से 18 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज़ मुलाज़िम भारतीयता अपनाने लगे थे। उनमें से कुछ तो इतने भारतीय हो गए कि वे अपने ही देश इंग्लैंड को विदेश या विलायत कहने लगे। यही विलायत बाद में जाकर विलायती और फिर ब्लाइटी हो कर ब्रिटेन और इंग्लैंड के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला एक पॉपुलर स्लॅंग बन गया। भारत से ब्रिटेन लौटने वाला ब्रिटिश सिपाही कहता ‘आई एम बॅक टू ब्लाइटी’ (मैं वापस ब्लाइटी या विदेश आ चुका हूँ). आज भी जब कोई अंग्रेज़ विदेश होकर वापस इंग्लैंड लौटता है यही कहता है, ‘बॅक टू ब्लाइटी’।

खैर वापस 18 वीं शताब्दी में चलें। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज़ मुलाज़िम जब ब्रिटेन लौटते तो अपने साथ भारतीय रंगों की चमक और मसालों की महक लेकर लौटते। हालांकि पश्चिमी देशों का एशियाई मसालों से परिचय कई सदियों पहले ही हो चुका था। कहते हैं कि एशिया के ढेरों मसाले तो युरोप के वे ईसाई योद्धा ला चुके थे जो अरब और तुर्क मुसलमानों के खिलाफ क्रुसेड लड़ने गए थे। फिर भी ब्रिटेन में भारतीय खाने की लोकप्रियता उन्हीं अंग्रेज़ों ने बढ़ाई जो ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करके ब्रिटेन लौटे थे। भारतीय भोजन की लोकप्रियता ब्रिटेन में कुछ ऐसी बढ़ी कि ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया तक ने अपने महल में कुछ ऐसे रसोईए रखे जो स्वयं उनके लिये रोज़ भारतीय व्यंजन बनाते, जिन्हे वे बड़े चाव से खातीं और अपने मेहमानों को भी खिलातीं। उन दिनों जिस दावत में हिंदुस्तानी करी न होती उसे अधूरा ही माना जाता।

ईस्ट इंडिया कंपनी के ही दो कर्मचारियों के पुत्र थे विलियम मेकपीस थॅकरे। विलियम कलकत्ता में पैदा हुए थे और भारतीय भोजन से उन्हे खास लगाव था। विलियम के प्रसिद्ध उपन्यास ‘वॅनिटी फेयर‘ में हिन्दुस्तानी करी से जुड़ा एक मज़ेदार दृश्य है। उपन्यास की नायिका एमीलिया सॅड्ली के पिता मिस्टर सॅड्ली उपन्यास की खलनायिका रेबेका शार्प का किसी दावत में भारतीय करी से परिचय कराते हैं,

“लीजिये मिस शार्प हिन्दुस्तानी करी चखकर देखिये”

रेबेका ने उससे पहले कभी करी नहीं चखी थी।

“कैसी लगी? क्या यह उतनी ही लाजवाब है जितनी और सभी भारतीय चीज़ें होती हैं?” मि. सॅड्ली ने हंसते हुए पूछा।

“ओह एक्सलॅंट” रेबेका ने मुश्किल से कहा। उसका मुंह करी के तेज़ मसालों से जल रहा था।

“इसके साथ थोड़ी चिली (मिर्च) ट्राइ करिये” मि. सॅड्ली ने मज़ा लेते हुए हुए कहा।

“चिली!! ऑफ कोर्स” चिली नाम से रेबेका ने सोचा कि वह कोई चिल या ठंडा करने वाली चीज़ होगी, और लपकते हुए एक पूरी हरी मिर्च अपने मुंह में डाल ली।

1809 में भारतीय व्यवसाई दीन मोहम्मद ने ‘हिन्दुस्तानी कॉफी हाउस’ नाम से लन्दन में ब्रिटेन का पहला भारतीय रेस्टोरेंट खोला जहां भारतीय व्यंजनों के साथ ही हुक्का गुड़गुड़ाने का भी पूरा इंतज़ाम था। मगर भारतीय खाने की लोकप्रियता और हुक्के की मौजूदगी के बावज़ूद यह रेस्टोरेंट नहीं चला और तीन वर्षों के अंदर ही दीन मोहम्मद ने बॅंकरप्सी का आवेदन दे डाला। वजह थी इंग्लेंड की कड़क ठंड। कड़क ठंड की वजह से उन दिनों इंग्लैंड में ‘ईट आउट’ का वैसा कल्चर नहीं था जैसा कि आजकल है।

19वीं और 20वीं शताब्दी में भी हिन्दुस्तानी करी ब्रिटेन में लोकप्रिय बनी रही। मगर जिस तरह आज हम ब्रिटेन की गली-गली में इंडियन रेस्टोरेंट और हर ज़ुबान पर चिकन टिक्का या विंडलू जैसे नाम सुनते हैं वह 1971 तक न हुआ था। 1971 के भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश बनने के दौरान एक बड़ी तादाद में बांग्लादेशी शरणार्थी ब्रिटेन आए। उनमें से अधिकांश लन्दन के ईस्ट एंड इलाके में बसे और वहीं से उन्होने छोटे-छोटे इंडियन रेस्टोरेंट खोलने का सिलसिला शुरू किया। आज भी ब्रिटेन के लगभग 70% इंडियन रेस्टोरेंट बांग्लादेशियों के ही हैं।

इसके बाद तो भारतीय करी जैसे ब्रिटिश संस्कृति का एक अभिन्न अंग ही बन गई। इतना ही नहीं करी संस्कृति और करी उद्योग में ब्रिटेन ने अपनी खुद की अलग पहचान भी बना ली। मज़े की बात यह कि विश्व के कुछ हिस्सों में तो करी को भारतीय नहीं बल्कि ब्रिटिश व्यंजन समझा जाता है। विश्व के विभिन्न देशों में जो करी डिशें बड़े बड़े होटलों के मेनूकार्ड में दिखाई देती हैं उनमें से कई डिशें तो ब्रिटेन में ईज़ाद की हुई हैं, जैसे कि बाल्टी, जालफ्रेजी, चिकन टिक्का मसाला और फाल। बाल्टी डिश ब्रिटिश पाकिस्तानियों द्वारा ईजाद की हुई है. यह कुछ-कुछ कड़ाही डिश जैसी होती है और तेज़ आंच पर बनाई जाती है। कहते हैं कि इसका नाम बाल्टी इसलिए पड़ा कि जिस बर्तन में यह परोसी जाती थी वह बकेट या बाल्टी जैसा दिखता था। एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसका नाम उत्तरी पाकिस्तान के इलाके बाल्टिस्तान के नाम पर पड़ा है।

जालफ्रेज़ी बंगालियों की ईज़ाद की हुई डिश है। यह हरी मिर्च और पेपर यानि शिमला मिर्च मिलाकर बनाई जाने वाली तीखी डिश है। इसका नाम ‘जालफ्रेज़ी’ दो शब्दों से मिलकर बना है, बंगाली शब्द ‘झाल’ जिसका अर्थ होता है तीखा और उर्दू शब्द ‘परहेज़’। यानि कि ऐसी तीखी डिश जिससे परहेज़ ही किया जाए तो बेहतर है। हालांकि अब जालफ्रेज़ी ब्रिटेन की सबसे पॉपुलर डिश बन चुकी है। पिछले डेढ़ दशकों में जिस तरह अंग्रेज़ों की रूचि ‘चिकन टिक्का मसाला’ जैसी थोड़ी माइल्ड और क्रीमी डिश से जालफ्रेज़ी जैसी तीखी डिश की ओर बढ़ी है उससे पता चलता है कि अंगेज़ी जिव्हा को अब तीखे स्वाद की आदत हो चुकी है।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि अंग्रेज़ों को तीखे व्यंजन पहले पसंद नहीं थे। विंडलू और फाल जैसी बेहद तीखी डिशें ब्रिटेन में काफी पॉपुलर रही हैं। विंडलू गोवा की डिश है जो सिरका, लाल मिर्च और लहसुन मिलाकर बनाई जाती है। यह डिश पुर्तगालियों द्वारा गोवा लाई गई थी। यह करी खासतौर पर उन युवा छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय है जो शाम को पबों में ठंडी-ठंडी बियर पीने के बाद कोई तीखा व्यंजन खाना पसंद करते हैं। कुछ समय पहले ब्रिटेन में किये गए एक सर्वे में पुरुषों से पूछा गया कि ठंडी बियर के बाद वे क्या अधिक पसंद करेंगे, ‘ए हॉट वुमन’ या ‘ए हॉट करी’? अधिकांश का उत्तर था, ‘ए हॉट करी’!!

खैर विंडलू की लोकप्रियता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि फ्रांस में हुए 1998 के फुटबॉल वर्ल्डकप के लिये इंग्लैंड का वर्ल्डकप सौंग विंडलू पर आधारित था। प्रसिद्ध ब्रिटिश बैंड ‘फैट लेस’ द्वारा बनाया गया यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि 1998 में यूके सिंगल्स चार्ट में यह दूसरी पायदान तक पहुंच गया। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं-

“मी एंड मी मम एंड मी डैड एंड मी ग्रैन,

वी आर ऑफ टू वॉटरलू,

मी एंड मी मम एंड मी डैड एंड मी ग्रैन,

एंड ए बकेट ऑफ विंडलू,

विंडलू, विंडलू, नाह, नाह, नाह…

विंडलू, विंडलू, वी ऑल लाइक विंडलू,

वी आर इंग्लेंड एंड वी आर गोना स्कोर वन मोर दैन यू”

वॉटरलू वह जगह है जहाँ इंग्लैंड ने फ्राँसीसी योद्धा नेपोलियन के खिलाफ वॉटरलू की प्रसिद्ध ऐतिहासिक लड़ाई जीती थी। यानि इस गीत का थीम यह है कि विंडलू की बकेट लिये हम वॉटरलू की लड़ाई की तरह ही फ्रांस की ओर विजय यात्रा पर निकले हैं।

‘फाल’ शायद विश्व की हॉटेस्ट करी है, जिसकी ईज़ाद ब्रिटेन के बर्मिंघम शहर में हुई है। ब्रिटेन के कुछ रेस्टोरेंट तो इतनी हॉट फाल बनाते हैं कि यह शर्त रखी जाती है, जो भी फाल की पूरी प्लेट खत्म कर देगा उससे करी का पैसा नहीं लिया जाएगा। पिछले साल अमेरिका के मॅनहेटेन इलाके में ब्रिटिश थीम पर बने एक रेस्टोरेंट ने विश्व की सबसे हॉट फाल करी बनाई। यह करी आसाम की ‘भूत नागा जोलोकिया’ मिर्च से बनाई गई जिसका इस्तेमाल आंसूगैस बनाने में होता है। कहते हैं कि इस करी को बनाते समय शेफ ने गैसमास्क पहना हुआ था और इसे खाने वाले ग्राहक उल्टी करते हुए और चीखते हुए पाए गए। उनमें से दो को तो अम्बुलेंस में डालकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा। यह करी आज भी ‘ब्रिकलेन करी हाउस’ नामक इस रेस्टोरेंट में उपलब्ध है। इस करी के साथ यह शर्त भी है कि जो भी करी की पूरी प्लेट खत्म करेगा उसे एक फ्री बियर दी जाएगी और उसका नाम रेस्टोरेंट के ‘फाल ऑफ फेम’ में दर्ज़ किया जाएगा। यदि आप एक भारतीय होने के नाते ‘भूत जोलोकिया’ जैसी मिर्च को चख सकने की सहनशक्ति रखते हैं तो मॅनहेटेन जाएँ और ‘फाल ऑफ फेम’ में अपना नाम दर्ज़ कराएं। वैसे खबर है कि ब्रिटेन में भूत जोलोकिया को मात देने वाली मिर्च पैदा कर ली गई है जिसका नाम है, ‘इन्फिनिटी’। अब देखें इन्फिनिटी से बनी करी कब बाज़ार में आती है।

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