गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन – 2

‘गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन’ पर सत्य भाई की बात मुझे लगता है अधूरी रह गयी।
हिन्दी का एक दुर्भाग्य यह है कि धीरे-धीरे वादों से जुड़े आलोचक हिन्दी साहित्य की दशा-दिशा तय करने लगे।
प्रेमचन्द, रेणु, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, शिवानी, आचार्य चतुरसेन, नरेन्द्र कोहली (रामकथा तक) को आप कहाँ रखेंगे? क्या इनका लेखन गंभीर नहीं हैं अथवा लोकप्रिय नहीं हैं। और भी बहुत सारे नाम हैं।
गैर हिंदी लेखकों में जिन्हें हिन्दी वालों ने भी खूब पढ़ा – शरत, बिमल मित्र, शिवाजी सावंत, के.एम. मुंशी … इनका लेखन गंभीर नहीं हैं अथवा लोकप्रिय नहीं हैं? दोनों प्रकार के लेखन में दो बातें हैं जो अंतर पैदा करती हैं।

पहली – तथाकथित हिन्दी के कर्णधारों, मेरा आशय प्राध्यापक वर्ग से है, ने यह मान लिया कि अब पढ़ना उसका काम नहीं है … उसे बस पढ़ाना है। पढ़ना भी है तो उन्हीं पुस्तकों को जो लाइब्रेरी में उपलब्ध हैं। अब लाइब्रेरियों में किताबें जुगाड़ से ही पहुंचती हैं …. दाम तीन गुने रखो और सब जगह कमीशन बांट दो। यह काम राजपाल एंड संस, राजकमल, वाणी आदि-आदि प्रकाशन बड़ी सफलता से करते रहे। इनके लिए किताब के पाठकों तक पहुंचने से अधिक महत्वपूर्ण था किताबों का लाइब्रेरियों में पहुंचना। अब क्यों कि ये किताबें तथाकथित विश्वविद्यालयों के विद्वान गंभीर प्राध्यापक पाठकों द्वारा पढ़ी गयीं तो इनके लेखक भी विद्वान और गंभीर अपने आप साबित हो गये। इन प्रकाशनों द्वारा छापी गयीं और बड़े-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित और आलोचकों द्वारा सराही गयी पुस्तकों में 95 फीसदी पुस्तकों के नाम भी पाठक नहीं जानता। …. दूसरी ओर कम कीमत में पढ़ने की सामग्री बेचने वाले प्रकाशकों ने किताबें पाठकों तक पहुंचाने को लक्ष्य किया। लाइब्रेरियों से उन्होंने कोई सरोकार ही नहीं रखा इसलिए ये बिकीं तो खूब पर इनके लेखक गंभीर नहीं माने गए। इनमें अधिकांश गंभीर थे भी नहीं।
वे अपने मन से नहीं प्रकाशक के ऑर्डर पर उपन्यास लिखते थे। अधिकांश के कॉपीराइट प्रकाशक के पास ही होते थे। मतलब उपन्यास सिर्फ प्रोडक्ट होते थे और उपन्यासकार एक तरह से उनका मन्थली पेड कर्मचारी होता था जो उनके लिए मुंशीगीरी करने की तर्ज पर लिखता था।

बीच-बीच में अच्छे प्रयास भी हुए, कभी नागरी प्रचारिणी सभा ने तो कभी हिन्द पॉकेट बुक्स ने ऐसी किताबों को सस्ते दामों पर पाठकों को उपलब्ध कराया। (हिन्द पॉकेट बुक्स ने अक्सर संक्षिप्त संस्करण निकाले)। और भी प्रकाशक रहे जिन्होंने गंभीर साहित्य को भी लोकप्रिय बनाने का काम किया।
… यहाँ एक प्रश्न उठता है कि भारत में ही हिन्दी से इतर – बंगला, मराठी, गुजराती, तमिल, मलयालम आदि के गंभीर लेखक भी लोकप्रिय आखिर क्यों हो गए। हिन्दी के ही गंभीर लेखक के साथ ऐसी विडंबना क्यों हुई कि वह लोकप्रिय नहीं हो पाया ? मुझे तो एक ही उत्तर समझ में आता है कि उपरोक्त प्रकाशकों और विश्वविद्यालयीय विद्वानों के भंवर में फंसकर हिन्दी का गंभीर लेखक भी विद्वान हो गया। उसी तरह जैसे अधकचरे नई कविता के कवि थे।(मैं अज्ञेय, धूमिल, भवानी भाई, बाबा नागार्जुन आदि की बात नहीं कर रहा) उसने उपन्यासों में भी ज्ञान का सागर परोसना शुरू कर दिया … अब पाठक ज्ञानी नहीं था इसलिए ये लोकप्रिय नहीं हो सके। प्राध्यापक ज्ञानी थे, प्रकाशक ज्ञानी थे इसलिए ये छपते रहे और लाइब्रेरियों में डंप होते रहे।
जो गंभीर लेखक स्वयं को इस विडंबना से बचा ले गए वे लोकप्रिय भी हो गये। गुनाहों का देवता से लेकर मुसाफिर कैफे तक ऐसे उपन्यासों की लम्बी लिस्ट है। (मेरे ख्याल से मुसाफिर कैफे दिल्ली दरबार से बाद की है, अगर पहले की हो तो उसकी जगह दिल्ली दरबार को रख सकते हैं- वैसे यह हकीकत है कि मुझे दिल्ली दरबार से मुसाफिर कैफे ज्यादा अच्छी लगी।)

अब आइये दूसरे कारण पर गौर करें। लोकप्रिय साहित्य, जिसे किसी ने लुगदी साहित्य कहा तो किसी ने घासलेटी साहित्य की संज्ञा दी, के प्रकाशक का वाकई साहित्य से कोई लेना देना नहीं था। उन्हें लेखक की भी परवाह नहीं थी। उसे हिन्दी की भी परवाह नहीं थी उसे बस विज्ञापन के जरिए अपना माल बेचना था। जो काम बी ग्रेड फिल्में कर रही थीं वही काम कम पैसों में यह कर रहा था। वह कम कीमत में पाठक को थोड़ी देर के लिए कभी रूमानी तो कभी कामुक तो कभी मायावी संसार में मजेदार सैर कराना चाहता था। वह पाठक को चिन्तन करने के लिए कोई मसाला नहीं देना चाहता था, वह तो पाठक को चिन्ता से मुक्त करना चाहता था – बस इसीलिए उसे सस्ता मनोरंजन परोस रहा था। अधिक डिटेल में नहीं जाऊँगा वरना बहुत लम्बा हो जाएगा – और फिर पाठक जी (सुरेन्द्र मोहन पाठक) अपनी आत्मकथा में क्या कहेंगे। इतना फिर भी कहूंगा कि इस लोकप्रिय साहित्य के पाठक वर्ग में अधिकांश समाज के निचले पायदान पर बैठे आदमी था या फिर किशोर और किशोरियां। इन प्रकाशकों ने वल्गर, वाहियात जला देने लायक साहित्य भी खूब छापा। चोरी चकारी भी खूब की …. बहरहाल।
इस लोकप्रिय साहित्य को सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाने का श्रेय एकमात्र सुरेन्द्र मोहन पाठक को जाता है। वेदप्रकाश शर्मा ने भी इसमें योगदान दिया। पाठक जी ने जब से गाइड पॉकेट बुक्स के लिए जेम्स हेडली चेज के उपन्यासों का अनुवाद किया, उनका लहजा ही बदल गया। कला तो उन्हें ईश्वर ने दी ही थी, बात कहने का निराला अंदाज था ही। वे बार-बार अपने उपन्यासों के बीच में पाठकों को सोचने का मसाला भी देते रहे। उनके पाठक वर्ग में समाज के सम्मानित वर्ग का तबका भी बेड़ी तेजी से शामिल हुआ। और इसीके सदके, राग दरबारी के प्रसिद्ध लेखक, ज्ञानपीठ से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल ने भी जासूसी उपन्यास लिखने की हिम्मत कर डाली।
लोकप्रिय लेखन को सम्मान दिलाने का काम बहुत पहले गुलशन नन्दा ने भी किया था, किन्तु वे उन उपन्यासों का कलेवर नहीं बदल पाए। उपन्यास उसी लुगदी कागज पर ही छपते रहे, और लुगदी साहित्य कहलाते रहे। पाठक जी के पाठकों ने शोर मचाकर, खुशी से अधिक कीमत देने की हामी भरके प्रकाशक को पाठक जी के उपन्यास बढ़िया कागज पर अच्छे कलेवर में छापने को विवश किया। पाठक जी के अनेक उपन्यास आराम से गंभीर साहित्य में रखे जा सकते हैं पर शर्त तो वही है कि उसके लिए उन्हें लाइब्रेरियों में किताबें डंप करने वाले प्रकाशकों के पास छपना पड़ेगा जिसके लिए वे कभी राजी नहीं होंगे।

One comment

  • rsbharti

    पाठक जी को वैसे भी पढ़ने वालों की कमी नहीं है. मैंने आजतक लोकप्रिय और गंभीर साहित्य के बीच फ़र्क नहीं समझा है. जो साहित्य लोगों बोरिंग और पकाऊ नहीं लगे, वही दरअसल असली साहित्य है.

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