रोगों की जड़ मन में होती है

पिछले तीन-चार दिनों से गाड़ी चलाने में परेशानी हो रही थी। लग रहा था कि पिछले पहिए में हवा का दबाव काफ़ी कम हो गया है। इसके चलते महसूस हो रहा था कि गाड़ी चलते वक़्त लहरा रही है। मन में चिंता भी लगी थी कि कम हवा के चलते कहीं नया टायर ख़राब न हो जाए या ट्यूब कट न जाए।संयोग कह लें या आलस्य, इस बीच हवा भरवा भी नहीं पाया। आख़िर, जब लगने लगा कि अब तो गाड़ी कुछ ज़्यादा ही लहरा रही है, तो झख मारकर मैकेनिक के पास गया। उसने हवा भरने से पहले पिछले पहिए में उसका दबाव जाँचा, अगले पहिए में भी जाँचा, फिर “दोनों चक्कों में हवा तो ठीक है” कहकर अगले वाहन की तरफ़ बढ़ गया।मैंने भी गाड़ी स्टार्ट की और अपनी राह हो लिया। अब न तो हवा कम लग रही थी, न गाड़ी लहरा रही थी। टायर-ट्यूब ख़राब होने की चिंता का तो सवाल ही नहीं उठता था।

अब वाहन चलाने का अनुभव बदल गया था, हालाँकि वाहन में कोई बदलाव नहीं हुआ था। तो आख़िर बदला क्या था?

मेरा मन, मेरे विचार, मेरी सोच। पहले आशंका सता रही थी, इसलिए गड़बड़ी के सारे लक्षण नज़र आ रहे थे। पर अब निश्चिंतता थी। डॉ. अबरार मुल्तानी (Abrar Multani) की पुस्तक “सोचिए और स्वस्थ रहिए” इसी सोच की बात करती है।

पहले रोगों को शारीरिक और मानसिक के खाँचों में बाँटा जाता था, लेकिन अब लगभग सभी रोग मनोदैहिक (Psychosomatic) माने जाते हैं। यानी खुजली से लेकर कैंसर तक, रोगों की जड़ मन में होती है।

इसीलिए, डॉ. मुल्तानी प्लूटो की इस बात को आदर्श मानते हैं कि डॉक्टर सबसे बड़ी भूल यह करता है कि वह मन का इलाज किए बग़ैर सिर्फ़ शरीर का इलाज करता है, जबकि मन और शरीर आपस में जुड़े हुए हैं और उनका अलग-अलग इलाज नहीं किया जाना चाहिए।

ज़ाहिर है, मस्तिष्क में रसायनों की गड़बड़ी का इलाज दवाओं के बल पर हो जाए, लेकिन मन तो अच्छे विचारों से ही चंगा हो सकता है। मन से ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, स्वार्थ, कुंठा, भय और निराशा जैसे भावों को हटाकर उसमें प्रेम, शांति, सहयोग, दान और आशा जैसे भावों को भरना ही एकमात्र उपाय है।

इन्हीं सबको समर्पित अलग-अलग अध्यायों में लेखक ने उपयोगी उद्धरणों और प्रेरक प्रसंगों के नगीने टाँके हैं। उन्होंने बड़े जतन से दुनियाभर की कई चर्चित किताबों के प्रासंगिक अंश भी सँजोए हैं। इन सबके साथ बतौर चिकित्सक डॉ. मुल्तानी के अनुभव सोने पर सुहागा की तरह हैं।


यह पुस्तक जिस तरह व्यवस्थित और योजनाबद्ध ढंग से रची गई है, वह मुझे शिव खेड़ा की लोकप्रिय पुस्तक “जीत आपकी” की याद दिलाती है, जिसने एक धमाके के साथ भारत में प्रेरणादायक पुस्तकों का बड़ा बाज़ार तैयार किया था।
इस सुगठन के चलते “सोचिए और स्वस्थ रहिए” का हर अध्याय अपने आप में परिपूर्ण है और यही वजह है कि यह उन चुनिंदा पुस्तकों में शामिल है, जिन्हें आप कहीं से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं और कभी भी, कितनी बार भी पढ़ सकते हैं। डॉ. मुल्तानी आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं और उनका पाला हर तरह के रोगी से पड़ता ही होगा। ऐसे में, किसी भी डॉक्टर के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होता है कि वह रोगियों को अपने उपचार के बारे में यक़ीन दिला सके और उन्हें उपचार लेने के लिए राज़ी कर सके। लेखक की यह कला किताब में भी नज़र आती है। जैसा कि उन्होंने लिखा है, पुनर्जन्म को न मानने वाले इस्लाम के अनुयायी एक रोगी के लिए उन्होंने इसकी नई व्याख्या की और उसे पुरानी बातों को भुलाकर आज से “नई ज़िंदगी” जीने को कहा। पुस्तक में उन्होंने मन के भीतर विचारों को सुधारने के साथ ही आस-पास के माहौल को बेहतर बनाने के सुझाव भी दिए हैं, क्योंकि हमारा मन सबसे ज़्यादा परिवेश से ही प्रभावित होता है। परिवेश, यानी मुख्यत: घर। यदि परिवार के सदस्यों से आपके संबंध अच्छे न हों, तो सारे संसार का साम्राज्य भी आपको ख़ुशी/ सेहत नहीं दे सकता। इसीलिए वे दवा देने वाले चिकित्सक से आगे बढ़कर “सलाहकार” की भूमिका में आते हैं और माता-पिता, बच्चों से अच्छे संबंधों के साथ-साथ सास-बहू के बीच निबाह के सूत्र भी देते हैं। उन्होंने अपने शरीर के अंगों से बात करने, उनसे प्रेम का इज़हार करने की सलाह भी दी है।“सोचिए और स्वस्थ रहिए” के 270 पृष्ठ बड़े इत्मीनान से यही सब बताते हैं। कहते हैं कि रोगी के लिए अच्छे विचार भी ज़रूरी हैं। इस लिहाज़ से “सोचिए और स्वस्थ रहिए” अपने आप में एक “अच्छी दवा” की तरह है।पुस्तक : सोचिए और स्वस्थ रहिए
लेखक : डॉ. अबरार मुल्तानी (Dr.Abrar Multani)
प्रकाशक : Manjul Publishing House
मूल्य : 195 रुपए

~Vivek Gupta Vicky

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