ताम्रपत्र से किंडल तक

हालिया एक प्रश्न पढ़ा कि अठारहवीं सदी के पूर्व की लिखी किताबें भारत में मूल रूप में नहीं मिलती। इसलिए विश्वसनीयता पर संदेह होता है। पहले ताम्र-पत्र, शिलाओं पर ही लेखन होता था। जब काग़ज और मुद्रण आया, तो छपने लगी। अब वो चाहे वेद व्यास हों या बाणभट्ट, मूल लिखी कॉपी आपको नहीं मिल पाई, तो इसमें उनका दोष […]

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