गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन – 2

‘गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन’ पर सत्य भाई की बात मुझे लगता है अधूरी रह गयी। हिन्दी का एक दुर्भाग्य यह है कि धीरे-धीरे वादों से जुड़े आलोचक हिन्दी साहित्य की दशा-दिशा तय करने लगे। प्रेमचन्द, रेणु, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, शिवानी, आचार्य चतुरसेन, नरेन्द्र कोहली (रामकथा तक) को आप कहाँ रखेंगे? क्या इनका […]

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गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन

गंभीर लेखन बनाम लोकप्रिय लेखन? यह बड़ा ही मसालेदार विषय है जो आज की बात नहीं है। इसमें दो पक्ष उलझते हैं और निष्पक्ष मजा लेते हैं। यह तब से प्रचलन में हैं जब से मुद्रित लेखन बाजार में आने लगे। है क्या यह और अंतर क्या है? एक वाक़ये से कहने का प्रयास करता हूँ। राजकुमारी सालिंगा और कुँवर […]

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