हिंदी लेखक – रूपए की नहीं, डॉलर की सोचिए

साहित्यिक क्रांतियाँ और मापदंडों से अलग अपनी राह बनाना वैश्विक है। जहाँ-जहाँ प्रकाशकों और साहित्यकारों की गोलबंदी हुई, या किसी आर्थिक कारण से साहित्य थम गया, या बाहरी कारणों से समस्या हुई, वहाँ साहित्य ने अपनी नई राह चुनी है। अक्सर ऐसे साहित्य की शुरूआत कुछ बिंदास युवाओं ने होठों में सिगरेट दबाए और धुआँ उड़ाते ही की। जैसे स्थापना का मखौल उड़ा रहे हों। वो खुल कर ‘वन-टू-वन’ लड़ते, और वो तो जरूर नहीं करते जो अब तक चल रहा होता। उनकी निंदा होती, तो वो हँस कर उल्टा चिहुक चिढ़ाते। क्रांति का आलम तो इस कदर था कि जहाँ मोटी किताबों का रिवाज़ था, वहाँ किसी ने मात्र एक पंक्ति का उपन्यास लिखा और पुरस्कार भी जीत लिया। और वो भी एक थके-हारे युवा पत्रकार ने जो दारू के ठेके में पड़ा रहता था।

पर इससे पॉज़िटिव क्या हुआ?

अगर लैटिन अमरीका के ‘बूम’ लेखकों की बात करें, तो उन्होंने स्थापना को चुनौती दी और लैटिन साहित्य के ज़रिये लैटिन अमरीका को विश्व-पटल पर ले आए। यूरोप ठंडा पड़ गया था, और असल हलचल अमरीका में ही थी। ऐसे में जब यूरोप के बाज़ार में लैटिन अमरीका से कुछ युवाओं का साहित्य पहली बार आया, उसने धूम मचा दी। इतना ही नहीं, अनुवाद करवाने शुरू किए। साहित्य को छोटे देशों से उठा कर सबके सामने लाए। वो साहित्य ‘टॉप-क्लास’ भले न हो, पर नया था। खिलंदड़ था। क्रांतिकारी था। स्थापित मानकों से अलग था। और बाज़ार में नि:संकोच बेचा जा रहा था। नए तरीकों से। गर देश में न बिके, तो विदेश में।

जब तक आप साहित्य अनुवाद नहीं करते, वो देश से बाहर नहीं पहुँचती। अब हिंदी को देश से बाहर ही पहुँचना है। क्या लिखते हैं, यह जरूरी नहीं। बाहर की जनता के लिए भारत किसी भी रूप में रोचक ही है। वो एक इनसाइडर कहानी कहता है। और यह अलग होता है जब अरविंद अडिगा लंदन से लिखते हैं, और मूल हिंदी से अंग्रेज़ी में अनूदित होता है। उन्हें यह लगता है कि यह कोई देश से असल ‘स्टफ़’ भेज रहा है।

और यही भविष्य है। रूपए की नहीं, डॉलर की सोचिए।

प्रवीण झा

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