मैंने इरॉटिक रोमांस क्यों लिखा?

डार्क नाइट लिखते समय मन में कई संशय और भय थे. पहली बात तो यह कि इरॉटिक विधा की मेरी स्वयं की जानकारी सीमित थी और दूसरी बात यह कि इसे पोर्न कहकर नकारा या दुत्कारा न जाए. मगर फिर भी मन में इस विधा पर लिखने की एक बलवती इच्छा थी. उसका सबसे बड़ा कारण मेरा अपना यह मत है कि साधारण मनुष्य के जीवन के नैराश्य और कुंठाओं के मूल में बहुत हद तक उसकी इरॉटिक इच्छाओं की अपूर्ति या अतृप्ति ही है. हालाँकि मेरा यह मानना भी है कि जीवन का वास्तविक आनंद ऐन्द्रिक सुख के परे ही है और उस अतीन्द्रीय सौन्दर्य, प्रेम और आनंद की प्राप्ति को ही मैंने जीवन का मूल उद्देश्य बताया है, मगर किसी साधारण मनुष्य के लिए उस अतीन्द्रीय आनंद की स्थाई अनुभूति साधारण काम नहीं है. उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिलताओं से परिपूर्ण है. इसका भी पूरा ज़िक्र उपन्यास में है.

अब वापस आते हैं इरॉटिका पर. एक व्यापक भ्रम जो हम भारतीयों में है कि पश्चिमी समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध काफी इरॉटिक होते हैं और इरोटिक संबंधों में लिप्तता ही पश्चिमी समाज की सबसे बड़ी समस्या है. जबकि वास्तविकता इससे बहुत अलग है. हालाँकि यौन संबंधों के मामले में पश्चिमी समाज भारतीय समाज से बहुत अधिक खुला हुआ है मगर यहाँ भी अधिकांश स्त्री-पुरुष एक दूसरे की यौन इच्छाओं को समझने में असमर्थ ही हैं और इनसे उपजी कुंठा यहाँ के समाज की भी बहुत बड़ी समस्या है. पुरुषों के लिए तो फिर भी अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए साधन और सुविधाएँ सदियों से रही हैं और आज भी हैं. पश्चिमी समाज में जिस तरह जगह-जगह सेक्स पार्लर, स्ट्रिप क्लब और खासकर इन दिनों बीडीएसएम रिसॉर्ट दिखते हैं वे प्रमाण हैं कि यहाँ का पुरुष अपने संबंधों में किस हद तक अतृप्त है. नारी की एक बड़ी समस्या यह है कि न तो उसके लिए इस तरह की अधिक सुविधाएँ हैं और न ही उसकी इन सुविधाओं में बहुत अधिक रुचि. हालाँकि नारी मन को समझने में अपनी असमर्थता स्टीफन हाकिंग भी जता गए हैं, मगर जितना मैंने नारी मन को समझा है उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि अधिकांश नारियाँ अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति अपने प्रेम सम्बन्ध के दायरे में ही चाहती हैं. बड़ी समस्या है उसके प्रेमी का उसकी इच्छाओं को न समझना या फिर उनके प्रति उदासीनता. डार्क नाइट के आरम्भ में ही मैं लिखा है, ‘अब कामदेव अनंग हैं और रति अतृप्त’. नारी की इस अतृप्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ जैसे उपन्यास की अपार सफलता. एक ऐसा उपन्यास जिसकी न तो ढंग की भाषा-शैली है और न ही कोई कसा हुआ प्लाट, मगर वह सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर रहा है तो सिर्फ इस कारण कि वह नारियों की यौन कुंठाओं को तृप्त करता है.

नारी-पुरुष सम्बन्ध की एक बड़ी समस्या यह भी है कि हर सम्बन्ध की तरह यह सम्बन्ध भी बहुआयामी होता है. सेक्स और रोमांस उस सम्बन्ध का मात्र एक आयाम हैं, और दूसरे आयामों से उनका द्वंद्व भी होता रहता है. नारी जो खूबियाँ अपने प्रेमी में देखती है वही बातें पति में कमियाँ बनकर दिखने लगती हैं. पुरुष अपनी प्रेमिका की जिन अदाओं पर लट्टू होता है, पत्नी की उन्हीं अदाओं को वह घर के बाहर देखना पसंद नहीं करता. स्त्री और पुरुष जब तक इन आयामों और उनके पारस्परिक द्वंद्व को अच्छी तरह न समझें उनके सम्बन्ध भी इन आयामों के टकराव से आहत होते रहेंगे.

मगर इन सबमें इरॉटिका की क्या भूमिका है? इन दिनों किये गए कई वैज्ञानिक अध्यनों से यह बात सामने आ रही है कि इरोटिका को लिखते और पढ़ते दोनों ही समय लेखक और पाठक अपनी और अपने साथी की यौन इच्छाओं के प्रति अधिक जागरूक होते हैं. इरॉटिका, पोर्न से इस मामले में बहुत अलग है कि पोर्न का उद्देश्य मात्र यौन उत्तेजना पैदा करना होता है और उसका प्रभाव भी क्षणिक ही होता है जबकि इरॉटिका में यौन उत्तेजना के साथ ही भावनाओं और संवेदनाओं का एक लम्बा सफ़र होता है और उसका प्रभाव भी दूरगामी होता है. इरॉटिका भी किसी अन्य फैंटसी की ही तरह मनुष्य के लिए न सिर्फ जीवन की कठोर सच्चाइयों से राहत का एक इन्द्रधनुषी व्योम रचता है बल्कि आशाओं और संभावनाओं का एक नया आकाश भी तानता है. इरॉटिका को पोर्न कहकर नकारना उन आशाओं और संभावनाओं के आकाश को नकारना है.

2 comments

  • rsbharti

    अगर स्त्री या पुरुष की काम भावनाओं की तृप्ति नहीं हो पाती है तो यह बाद घातक सिद्ध होता है. इससे ज़िंदगी अंधकार की ओर धंसती चली जाती है. डार्क नाईट जैसी अभी और उपन्यासों और कहानियों की ज़रूरत है. कई वजहों से लोगों की काम-इच्छा समय पर पूरी नहीं होती है, जिसकी वजह से ज़िंदगी नैराश्य की तरफ बढ़ती चली जाती है.

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