विश्व पुस्तक दिवस पर ज़िंदगी ५०-५० की समीक्षा

उपन्यास ज़िंदगी ५०-५० की समीक्षा

राकेश शंकर भारती,

द्नेप्रोपेत्रोव्स्क, यूक्रेन

तारीख़- २३-०४-२०१८

विश्व पुस्तक दिवस पर ज़िंदगी ५०-५० की समीक्षा आपके सामने पेश है

दो हफ़्ते पहले मैंने अमेज़न पर भगवंत अनमोल जी के उपन्यास, ज़िंदगी ५०-५० ऑनलाइन ख़रीदकर किंडल पर पढ़ा। अपने पारिवारिक झमेले और दोनों छोटे बच्चों से समय निकाल आख़िर तक यह उपन्यास पढ़ डाला। मुझे इस उपन्यास की जिद्दत (नयापन) ने इस तरह से अपने काबू में कर लिया कि मैं इस दुनिया के मायावी मेले से अनजान होकर टॉयलेट में भी बैठकर ज़िंदगी ५०-५० पढ़ा। इस उपन्यास के प्लाट या फिर कथानक की सहजता भी पाठकों को आख़िर तक जकड़कर रखती है। मेरे मुताबिक़ इस उपन्यास में तीन subplot या फिर उपकथानक हैं। लोकप्रिय युवा लेखक भगवंत अनमोल जी ने इन तीनों उपकथानकों बड़ी ही चतुराई और कुशलता से आपस में गुथने का काम किया है। यह उपन्यास तीन मरहले में अपना मुक़ाम हासिल करता है। लेखक के पैत्रिक गाँव से होते हुए, बंगलौर और फिर मुँबई में अपने मुक़ाम तक पहुँच जाता है। subplot या उपकथानकों को आपस में जोड़ना भी एक बहुत बड़ी कला और सघन सोच-विचार का काम है। अगर sub-plot उपन्यास में plot से आपस में कुशलतापूर्वक नहीं जुड़े हो तो उपन्यास पढ़ने का मज़ा ही फीका हो जाता है और पाठक बीच में उपन्यास को छोड़कर फ़रार हो जाते हैं। कई बार से मेरे साथ भी ऐसा ही हो रहा था। मैं कई उपन्यासों को आख़िर तक नहीं पढ़ सका। कई बार नये लेखकों के उपन्यास में वही पुरानी घिसीपिटी बातों की भी व्याख्या रहती है तो उपन्यास को बीच में ही छोड़ना पड़ता है। लेकिन ज़िंदगी ५०-५० पढ़ते समय मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कई बरसों से जिस जिद्दत (नयापन) की तलाश मुझे उपन्यास में थी, वह मुझे ज़िंदगी ५०-५० में बहुत अनोखी तरह से देखने को मिली।

भगवंत अनमोल जी ने ख़ुद अपनी ज़िंदगी को ही इस उपन्यास में एक किरदार के रूप में पेश करके बड़ा ही पुण्य का काम किया है। समाज के उस उपेक्षित वर्ग के दुःख-दर्द और मानवीय संवेदना को अपने उपन्यास में उकेरने का काम किया है, जिसके बारे में इक्कीसवीं सदी में भी लोग सोचना तक नहीं चाहते हैं। अपने धार्मिक ग्रंथों, भगवद् गीता, रामायण में भी किन्नरों की ख़ूब चर्चा है और किन्नरों ने समाज की संरचना में भी बहुत बड़ी भूमिका निभायी है, फिर भी समाज उन्हें वह इज़्ज़त नहीं दे सका, जिसके वे हक़दार हैं। आज भी किन्नरों को अमानवीय बर्ताव और सामाजिक अवहेलना का सामना करना पड़ता है। भले ही हमारे देश के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किन्नरों को तीसरे लिंग या थर्ड जेंडर की श्रेणी में डाल दिया है, अलबत्ता उन्हें अभी भी इस समाज में समान अधिकार और सम्मान पाने के लिए बहुत बड़ा संघर्ष करना है। किन्नरों की दुर्दशा के लिए हमारे समाज के दकियानूसी ख्यालात और मानसिक संकीर्णता बहुत बड़े ज़िम्मेवार हैं। ऐसे समय में ज़िंदगी ५०-५० जैसे उपन्यास का जन्म लेना किन्नर समाज में बहुत बड़ी क्रांति ला सकता है, जिससे कि वे इस समाज की मुख्यधारा और अपने परिवार के मान-मर्यादा के साथ जी सके।

भगवंत अनमोल जी ने ख़ुद इस उपन्यास में एक किन्नर के बड़े भाई और एक किन्नर के बाप के रूप में किरदार अदा करके इस दकियानूसी ख्यालात वाले समाज के सामने अपने साहस का परिचय दिया है और इस उपन्यास में लेखक की दरियादिली और उदारता भी ख़ूब देखने को मिलती है। जो लार-प्यार, सम्मान-आदर और मनोबल हर्षा को जीते जी नसीब नहीं हो सका, लेखक ने वो लार-प्यार, सम्मान-आदर अपने किन्नर संतान सूर्या को दिलाने में कामयाब हुए हैं। भले ही उन्होंने अपने प्यार को क़ुरबानी देकर किया हो। इस उपन्यास में एक किन्नर की दरियादिली और उदारता भी ख़ूब देखने को मिलती है। जिस हर्षा को बचपन से अपने बाप का प्यार नसीब नहीं हुआ, विकृत लिंग के साथ पैदा होने के चलते इतनी बड़ी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से होकर गुज़रना पड़ा, वही हर्षा अपने बाप को दुःख में नहीं देखना चाहता है। अपने बाप को इज़्ज़त दिलाने और ख़ानदानी ज़मीन को बचाने के अथक प्रयास करता है। यहाँ तक अपना जिस्म भी बेचता है, फिर भी यह समाज एक किन्नर की संवेदना से अछूता रह गया। यह उपन्यास यह भी दिखलाता है कि एक किन्नर से उदार इस समाज में कोई नहीं हो सकता है। भगवान किसी में कुछ कमी देते हैं तो कुछ खूबियाँ भी देते हैं। मैं भगवान से एक ही प्रार्थना करता हूँ कि हर्षा को जन्नत में सबसे अव्वल मुक़ाम हासिल हो, क्योंकि वह इसके क़ाबिल है।

लेखक ने अपनी आँखों से अपने किन्नर भाई की दुर्दशा महसूस की है, देखी है। इस समाज और परिवार की बेरुख़ी के सामने वह अपने भाई को समाज में वह इज़्ज़त और हक़ नहीं दिला सके। जब उसका किन्नर बेटा पैदा हुआ तो हर्षा की तरह सूर्या को वो दिन नहीं देखने पड़े। लेखक ने एक बाप के रूप में भी अपनी दरियादिली का ख़ूब परिचय दिया है। अगर भगवंत अनमोल जी के इस उपन्यास को समाज अपने मानसिक पटल पर ढाल ले तो आने वाले दिनों में किन्नरों को उस बदहाली और अनदेखी से नहीं गुज़रने पड़ेंगे। यूरोप के देशों की तरह ही हमारे देश में भी किन्नर बगैर किसी भेदभाव के समाज में ख़ुशिहाली के साथ ज़िंदगी बसर कर सकेंगे।

इस उपन्यास में दूसरा पक्ष अनाया की चर्चा ठीक से नहीं हो सकी। इस पक्ष पर सोच-विचार करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि आज भी हमारा समाज धर्म, जात, प्रांतवाद के बंधन में बंधा हुआ है, जिसकी वजह से भगवंत अनमोल जी को वह क़ुदरती मुहब्बत नसीब नहीं हो सकी या फिर लेखक ने अपने प्यार को पाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी या फिर अपने माता-पिता से जिद्दो-जिहद नहीं किया। अपने प्यार के प्रति जिद्दो-जिहद करने में नाकामयाब होने के पीछे भी एक तर्क है। लेखक का छोटा भाई हर्षा किन्नर है, जिसकी वजह से उसके माता-पिता को इस क्रूर समाज के सामने बहुत संघर्ष करना पड़ा, अपमान सहना पड़ा या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि एक अज्ञानता और अनदेखी की वजह से लेखक के पिता अपने किन्नर बेटा को जन्म देकर अपने आप में घुटन महसूस कर रहे थे। इक्कीसवीं सदी में अब इस समाज को सोचना चाहिए कि किन्नर के रूप में पैदा होना कोई गुनाह नहीं है या कोई समस्या है ही नहीं। उन्हें भी उसी भगवान ने बनाया है, जिस भगवान ने आपको को बनाया है।

उपन्यास की भाषा-शैली भी काफी लचीली है और ज़ुबान और जुमलों में भी आर्द्रता ख़ूब देखने को मिलती है, जिससे उपन्यास और भी दिलचस्प बन जाता है। व्याकरण को लेकर उपन्यास में छोटी-मोटी खामियाँ हैं, जो कि हर उपन्यास में होती हैं। यह काम तो खैर संपादक का है। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले वर्षों में इस समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग, किन्नरों में जागरूकता लाने में यह उपन्यास मील का पत्थर साबित होगा।

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